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आसमान से सौर ऊर्जा और रौशन होगी दुनिया

  • वैश्विक ऊर्जा उत्पादन के प्रदूषण से छुटकारा

  • वायुमंडल से बाहर मौसम का भी प्रभाव नहीं

  • अत्यंत हल्के और मजबूत किस्म के यंत्र होंगे

  • पृथ्वी को एक और फायदा पहुंचाने की कोशिश

राष्ट्रीय खबर

रांचीः आसमान से सौर ऊर्जा के जरिए पृथ्वी को ऊर्जा देने की नई कवायद पर काम होने

लगा है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि इस विधि से पूरी दुनिया की बिजली की

जरूरतों को पूरा किया जाना संभव होगा। सैद्धांतिक तौर पर विचार किये गये इस

परियोजना को वास्तव में लागू करने में ढेर सारी तकनीकी दिक्कतें हैं। लेकिन कुछ लोग

मानते हैं कि जिस तरीके से स्पेस एक्स के फॉल्कन रॉकेट की मदद से लगातार उपग्रह

भेजे जा रहे हैं, उसी पद्धति पर इस सौर ऊर्जा की छतरी को भी टुकड़ों में भेजकर अंतरिक्ष में

एक साथ जोड़ा जा सकता है। अंतरिक्ष में सौर ऊर्जा का उत्पादन इसकी बदौलत होने के

बाद वहां से पृथ्वी तक बिजली पहुंचाने का काम भी संभव होगा। वैज्ञानिक मानते हैं कि

इस पद्धति से पृथ्वी पर ऊर्जा उत्पादन की जरूरतों की वजह से हो रहा प्रदूषण भी काफी हद

तक कम होगा। वैसे सुनने में तो यह कोई साइंस फिक्शन फिल्म जैसा प्रतीत होता है

लेकिन अब वैज्ञानिक इस पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रहे हैं।

यह बता देना उचित होगा कि वर्ष 1920 में यानी अभी से एक सौ वर्ष पहले रुस के

वैज्ञानिक कॉनस्टांटिन ट्रिस्कीलोवस्की ने इस सिद्धांत को तैयार किया था। अब एक सौ

साल बाद उस सिद्धांत को अमल में लाने के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हुए हैं।

यूरोपीय स्पेस एजेंसी को भी इस सिद्धांत के जरिए ऊर्जा उत्पादन की संभावना की बात

समझ में आ गयी है। इस एजेंसी को लोगों का मानना है कि दुनिया में सौर ऊर्जा उत्पादन

पर मौसम और आसमान में छाये बादलों का भी प्रभाव पड़ता है। इन दोनों ही चुनौतियों

का अंतरिक्ष में कोई सरोकार नहीं होगा। वहां से उत्पादित होने वाली बिजली किसी खास

केंद्र तक निशाना बनाकर भेजी जा सकेगी।

आसमान से सौर ऊर्जा से पर्यावरण को भी फायदा होगा

आसमान से सौर ऊर्जा उत्पादन से हाल के दिनों में वैश्विक पर्यावरण संबंधी चुनौतियों का

भी समाधान होगा। वैसे कुछ लोगों को मानना है कि जिस तरीके से अंतर्राष्ट्रीय स्पेस

स्टेशन को अंतरिक्ष से इन्ही सौर ऊर्जा की मदद मिल रही है, उसकी तरीके से पृथ्वी को भी

निर्बाध बिजली मिलती रहेगी। इससे एक फायदा यह होगा कि यह बिजली उत्पादन पृथ्वी

के दिन रात के चक्र से कतई प्रभावित नहीं होगा। इस लिहाज से यह भी माना जा सकता है

कि यह औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने में कामयाब रहेगी। अनुमान है कि पृथ्वी के

वायुमंडल और भौगोलिक संरचना की वजह से जो सूर्य किरण लौट जाती हैं अथवा

परावर्तित होती है, वह परेशानी अंतरिक्ष में लगे सौर ऊर्जा के पैनलों में नहीं होगी। यह

चौबीसों घंटे सूर्य की रोशनी के संपर्क में रहेगा और वहां पूरी सौर ऊर्जा से उत्पादन चलता

रहेगा।

अब इस परिकल्पना के आधार पर आगे की संरचना के बारे में भी जानकारी हासिल कर लें

तो स्पष्ट है कि वैज्ञानिकों ने यह आकलन किया है कि 10 वर्ग किलोमीटर में फैले इस सौर

ऊर्जा केंद्र को स्थापित करना पड़ेगा। अंतरिक्ष में चूंकि स्थान का अभाव कतई नहीं है

इसलिए वहां किसी भी खास स्थान पर 14 सौ फुटबॉल मैदानों के बराबर इलाके में इस

आसमान से सौर ऊर्जा के उत्पादन के केंद्र को स्थापित करना पड़ेगा। यह बहुत अधिक

भारी न हो, उसके लिए हल्के धातुओं अथवा अन्य उपकरणों के इस्तेमाल की आवश्यकता

होगी। कुछ लोग मानते हैं कि चंद्रमा पर मिले पदार्थों से भी यह काम किया जा सकता है।

अभी की सोच के मुताबिक अनेक छोटे छोटे सैटेलाइटों के जरिए इसे टुकड़ों में अंतरिक्ष में

भेजने के बाद वहां इन्हें एक साथ जोड़ दिया जाए। वर्ष 2017 में कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट

ऑफ टेक्नोलॉजी ने इसका एक मॉडल भी तैयार किया था।

काफी हल्के लेकिन मजबूत पदार्थों से बनाना होगा इसे

वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किये गये इस मॉडल में प्रति वर्ग मीटर के उपकरणों का वजन मात्र

280 ग्राम था। इस किस्म के हल्के उपकरणों से ही सौर ऊर्जा केंद्र की स्थापना से यह काम

बेहतर तरीके से किया जा सकेगा। इसी तरह वैज्ञानिक लीवरपुल विश्वविद्यालय में चल

रहे हल्के सौर ऊर्जा सेलों के अनुसंधान पर भी नजर रखे हुए हैं। वहां जो सौर ऊर्जा सेल

बनाये जा रहे हैं, वे भी हल्के हैं और उन्हें मोड़ा भी जा सकता है। यहां शोध के अधीन चल

रहे सौर ऊर्जा सेलों की विशेषता यह भी है कि वे अंतरिक्ष के विकिरणों को झेल सकते हैं

और अधिक ऊर्जा उत्पादन कर सकते हैं। इस सोच पर अगर वाकई काम आगे बढ़ा तो हम

भविष्य में चांद पर भी ऐसे सौर ऊर्जा केंद्रों की स्थापना कर सकेंगे, जो हमारे सारे अंतरिक्ष

अभियानों के लिए दूसरे किस्म से मददगार साबित होंगे।

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