सौर ऊर्जा उत्पादन की दिशा में क्रांतिकारी उपलब्धि, नया फोटो इलेक्ट्रोड तैयार

सौर ऊर्जा उत्पादन की दिशा में क्रांतिकारी उपलब्धि
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  • 85 प्रतिशत रोशनी सोखने में सक्षम

  • 11 गुणा अधिक बिजली उत्पादन

  • आकार में छोटे पर काम बहुत ज्यादा

प्रतिनिधि
नईदिल्लीः सौर ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव शीघ्र सामने आ सकता है।



उन्नत किस्म के फोटो इलेक्ट्रोड के विकास से ऊर्जा की समस्या और कम हो सकती है।

वैज्ञानिकों ने यह इलेक्ट्रोड तैयार किया है।

इसकी विशेषता यह है कि यह अपने पास आने वाली 85 प्रतिशत रोशनी को बिजली में बदल सकता है।

बहुत ही छोटे आकार के ऐसे सेमीकन्डक्टर सामान्य प्रचलित सौर ऊर्जा उपकरणों के मुकाबले

11 गुणा अधिक बिजली पैदा कर सकते हैं।

इसके व्यापारिक इस्तेमाल से सौर ऊर्जा उपकरणों में लगने वाले सौर सेल की आकार भी कम हो जाएगी

और उनसे बिजली भी अधिक मिल पायेगी।

वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि दुनिया में ऊर्जा की मांग निरतंर बढ़ने वाली है।

इस ऊर्जा की जरूरत को पूरा करने के लिए प्रचलित तौर तरीकों से हो रहे पर्यावरण के नुकसान को भी

वे अच्छी तरह समझ रहे हैं।

इसलिए अब ऐसे वैज्ञानिक तरीकों को विकसित करने की दिशा में ज्यादा प्रयास हो रहे हैं

तो छोटे आकार के होने के बाद भी अधिक बिजली पैदा कर सकें।

साथ ही इनसे पर्यावरण को ताप विद्युत केंद्रों की तरह कोई नुकसान नहीं हो।

होकाइडयो विश्वविद्यालय की एक टीम ने प्रोफेसर हिराओकि मिसावा के नेतृत्व में इस पर काम किया है।

अनेक किस्म के प्रयोगों के गुजरने के बाद इनलोगों ने सोने की परत वाले नैनोकन्डक्टर तैयार किये हैं।

प्रारंभिक अवस्था में यह पाया गया कि सोने की परत का यह कन्डक्टर सूरज की रोशनी सोखने के बाद भी अपेक्षित बिजली का उत्पादन नहीं कर पा रहा है।

इसके बाद शोध दल ने इस सोने की परत और सोने के नैनो पार्टिकल के बीच

टाइटेनियम डाइऑक्साइड की एक फिल्म रखकर यह सफलता प्राप्त की।

दरअसल इस विधि में सोने की परत एक आइने की तरह प्रकाश को परावर्तित करती रही।

सौर ऊर्जा की यह तकनीक दुनिया में बदलाव ला सकती है

इससे ऊर्जा का उत्पादन सामान्य से बहुत अधिक बढ़ गया।

यह भी पाया गया कि इस विधि से सेमीकन्डक्टर अधिक बिजली भी सोख पा रहे हैं।

सोने के नैनोकंडक्टर और सोने की परत के बीच टाइटेनियम डाइऑक्साइड की परत से उनके बीच अधिक प्रतिक्रिया हुई, जिसके परिणाम स्वरुप सौर ऊर्जा सोखने तथा उसे बिजली में बदलने में गुणात्मक फायदा नजर आया।

प्रयोग सफल होने के बाद जब वैज्ञानिकों ने इसमें सोखी गयी सौर ऊर्जा का आकलन किया तो यह पाया कि इसमें 85 प्रतिशत सौर ऊर्जा को सोखा है तथा प्रचलित सौर पैनलों के मुकाबले 11 गुणा अधिक बिजली पैदा की है।

अब प्रयोग के सफल होने के बाद वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि इसके व्यापारिक उत्पादन से बिजली उत्पादन करने वाले सौर ऊर्जा संयंत्र आकार में बहुत छोटे हो जाएंगे, जिससे जगह की कमी की समस्या हल होगी।

साथ ही अधिक बिजली पैदा करने की क्षमता की वजह से ऐसे संयंत्र बेहतर तरीके से और बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये काम कर सकेंगे।

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