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सूर्य के निकला लाखों टन गर्म गैस गड़बड़ी पैदा करने की क्षमता रखता है

  • फिर से धरती पर आ रहे हैं सौर आंधियों के तूफान

  • लाखों मैट्रिन टन गर्म गैस बढ़ रहा है हमारी ओर

  • इसके बीच ही कभी कभार होता है विस्फोट

  • सूर्य में भी जारी है लॉकडाउन की प्रक्रिया

राष्ट्रीय खबर

रांचीः सूर्य से निकला गर्म गैस पृथ्वी की तरफ बढ़ रहा है। सूर्य में लॉकडाउन की

परिस्थिति पैदा होने के बाद से यह दूसरा अवसर है जब इस तरीके से गैसों का उत्सर्जन

हुआ है। इसके पहले भी एक ऐसी ही सौर आंधी आयी थी लेकिन धरती के वायुमंडल के

कवच ने उसे रोक लिया था। इसी वजह से हमें इसका आने का पता नहीं चल पाया था। इस

बार अगर यह कवच पूरी तरह काम नहीं कर पाया तो पृथ्वी में दूरसंचार और बिजली की

सेवा में बाधा उत्पन्न होना तय है। अब तक की गणना के मुताबिक सूर्य से निकला यह

बवंडर अमेरिका के इलाकों में अपना असर दिखा सकता है। 

नासा के वीडियो में समझिये इसके खतरे क्या हैं

वैज्ञानिकों ने इस बात को कुछ दिन पहले ही गौर किया था कि अपेक्षाकृत शांत पड़े सूर्य से

अचानक लपटें बाहर निकल रही हैं। इस तरीके से जब अचानक लपटें बाहर आती हैं तो वह

अंतरिक्ष में लाखों मील तक विस्फोट कर जाती हैं। इसी विस्फोट के बाद अत्यधिक गर्म

गैसों का फैलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस बार भी कुछ वैसा ही हो रहा है और गर्म

गैसों का यह बबंडर, जिसे सौर आंधी भी कहा जाता है पृथ्वी की तरफ बढ़ रहा है। इस बार

की आंधी को काफी अधिक शक्तिशाली समझा जा रहा है, जो अगर पृथ्वी तक पहुंच गया

तो विमान सेवा, बिजली के पावर ग्रिड, रेडियो प्रसारण और मोबाइल सेवा ठप हो सकती

है। दरअसल यह सौर आंधी तब तेज गति से आगे बढ़ती है तो वह अपने साथ सूर्य में

उत्पन्न चुंबकीय प्रभाव क्षेत्र को भी लेकर आगे बढ़ती है। इसी चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव में

आने की वजह से आधुनिक संचार व्यवस्था पूरी तरह बाधित हो सकता है।

सूर्य से निकला बवंडर तेज गति से आता है

साथ ही इन किरणों में जो रेडियो विकिरण होता है वह हवाई जहाज पर काफी ऊंचाई में

सफर करने वाले विमान चालकों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। हमलोगों को अपनी

आंखों से भले ही यह तूफान नजर नहीं आये सूर्य से निकला यह सौर तूफान लगातार

हमारे वैज्ञानिक उपकरणों को नजरों में बना हुआ है। वैज्ञानिकों द्वाार इसे निरंतर ही

देखा जा रहा है। विकिरण की चपेट में आने वाले विमान चालकों का असर तो वर्ष 2017 में

ही देखा गया था। जब ऐसी ही एक आंधी की चपेट में आने की वजह से कई विमान चालकों

को मोतियाबिंद हो गया था जबकि महिला पाइलटों में औसत से काफी अधिक गर्भपात

देखने को मिला था। ऐसी परिस्थितियां 1989, 2015 और 2017 में देखने को मिल चुकी है।

पहले भी चक्रवाती तूफान में ऐसा हो चुका है

2015 में एक भीषण चक्रबाती तूफान इरमा की वजह से कई इलाकों का रेडियो प्रसारण बंद

हो गया था। मार्च 1989 में जब सौर आंधी आयी थी तो क्यूबेक के इलाके में करीब नौ घंटे

तक बिजली नहीं थी। इस किस्म के प्राकृतिक हमलों से बचने के लिए भी वैज्ञानिकों में

समाधान तलाशने पर बात चल रही है। कुछ लोगों का सुझाव है कि बिजली संयंत्रों में गैर

चुंबकीय स्टील से बने ट्रांसफॉर्मरों का इस्तेमाल हो। साथ ही वहां ऐसे चुंबकीय दबाव

झेलने के अतिरिक्त उपाय किये जाएं। लेकिन अत्यधिक बड़े सौर आंधी में यह सभी बेकार

हो जाएंगे, यह भी तय है। मिशिगन विश्वविद्यालय ने इसके लिए एक मॉडल भी तैयार

किया है लेकिन उसकी परीक्षण अभी शेष है। इसलिए वैज्ञानिक सौर आंधी से बचाव की

पूर्व सूचना पर अधिक निर्भर हैं। अंतरिक्ष में स्थापित सैटेलाइट और पृथ्वी पर स्थापित

खगोल दूरबीन इन सौर आंधियों के बारे में ज्यादा बेहतर पूर्व सूचना देने के सक्षम साधन

पहले से मौजूद हैं। एहतियात के तौर पर अतिरिक्त उपकरणों को भी अमेरिका ने अपने

बिजली ग्रिडों में पहले से एकत्रित कर रखा है।

जब एक लाख मील की दूरी पर होंगे तभी संकेत मिल पायेगा

सैटेलाइटों को इस सुविधा से पहले ही जोड़ा गया है कि वे पृथ्वी से एक लाख मील की दूरी

पर स्थित सौर आंधी के आकार प्रकार के बारे में पूर्व चेतावनी दे सकते हैं। वैसे इस

चेतावनी के बाद धरती पर बचाव के लिए मात्र साठ से 90 मिनट का समय ही बच पायेगा

क्योंकि तूफान की गति भी काफी तेज है। इन तूफानों से दूसरा खतरा पृथ्वी के अंदर नये

किस्म के तूफानों के पैदा होने का भी है। सौर आंधियों के प्रभाव से पृथ्वी के वायुमंडल में

होने वाली हलचल से ऐसा संभव है। इसलिए किसी चक्रवाती तूफान के आने से पहले जो

तैयारियां की जाती हैं, वैसी तैयारियों अमेरिका में की गयी है। वर्तमान सौर आंधी की गति

से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यह आज ही पृथ्वी पर चोट कर भी सकता है। अगर

ऐसा हुआ तो उसकी गति और दिशा के आधार पर यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि

अमेरिका के अधिकांश हिस्से इसकी चपेट में आयेंगे।

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