मिट्टी का जीवाणु कई विषाणुओं को मार सकता है

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उत्तरी आयरलैंड की जमीन में नये बैक्टेरिया

प्रतिनिधि
नईदिल्लीः मिट्टी में पाया गया एक खास किस्म का बैक्टेरिया, उन विषाणुओं को मार सकता है, जो सामान्य तौर पर तैयार दवाइयों के असर से अब प्रभावित नहीं होते।

खास तौर पर एंटीबॉयोटिक दवाइयों के ज्यादा इस्तेमाल की वजह से अनेक विषाणु अब इसके असर का प्रतिरोधक तैयार कर चुके हैं।

अपने अंदर विषाणुओं ने वैसी शक्ति पैदा कर ली है, जिनपर एंटीबॉयोटिक दवाइयों का असर नहीं होता है। इस किस्म के विषाणु अब गंभीर चुनौती भी बनते जा रहे हैं।

इसी तरह टीवी के विषाणु भी लगातार शक्तिशाली हो गये हैं और पहले की दवाइयों का उनपर कोई असर नहीं होता है। बीमार मरीजों पर दवाइयों का कोई असर नहीं होने की वजह से वैज्ञानिक इसके विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।

उत्तरी आयरलैंड के इलाके में पाया गया बैक्टेरिया

इसी क्रम में उत्तरी आयरलैंड के फारमानाग इलाके की मिट्टी में इसका हल मिलने की उम्मीद बंधी है। जिस इलाके की मिट्टी में यह बैक्टेरिया पाया गया है, उसे बोहो द्वीप के नाम से भी जाना जाता है।

नये किस्म के बैक्टेरिया में कई किस्म के सुपरबग का प्रसार रोक देने की क्षमता देखी गयी है।

आम तौर पर सुपरबग वैसे विषाणुओं को कहा जाता है, जो सामान्य किस्म की दवाइयों से अब काबू में नहीं आते हैं।

इससे मरीज की हालत दिन ब दिन खराब होती चली जाती है। दरअसल वैज्ञानिको ने यहां की मिट्टी के गुणों का विश्लेषण प्रारंभ किया था।

कहा जाता है कि यहां के वातावरण में किसी भी बीमारी को ठीक कर देने की विशेषता है। इसी वजह से मिट्टी के विश्लेषण में यह पाया गया कि यहां की मिट्टी में क्षरीय गुण अधिक हैं।

घास के मैदान वाले इलाकों में मिट्टी का विश्लेषण हुआ तो इस नये किस्म के बैक्टेरिया का पता चला, जो अपने आप ही कई किस्म की बीमारियों को अपने संपर्क में आते ही समाप्त कर देता है।

इसी वजह से यहां की मिट्टी में रोग मार डालने की क्षमता की कहानी पहले से ही प्रचारित हुई है।

मिट्टी के इस बैक्टेरिया की संरचना थोड़ी भिन्न है

वैज्ञानिकों ने इस नये किस्म के बैक्टेरिया का नाम स्ट्रेप्टोमाइसीस एस माइरोफोरिया नाम दिया है। एक अंतर्राष्ट्रीय शोध प्रबंध में इसके गुणों की चर्चा की गयी है।

माइक्रोबॉयोलॉजी के विशेषज्ञों को इस बैक्टेरिया की जानकारी दी गयी है। प्रारंभिक खोज में यह पाया गया है कि इस बैक्टेरिया में छह में से चार दवा प्रतिरोधी विषाणुओं को मार डालने की क्षमता है। इसकी पहचान विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कर ली है।

जिन विषाणुओं पर यह बैक्टेरिया काम करता पाया गया है वे मुख्य तौर पर आम एंटीबॉयोटिक दवाइयों के प्रभाव से खुद को प्रतिरोधक बना चुके हैं।

शोध की जानकारी रखने वाले ब्रिटेन के स्वासीया मेडिसीन विश्वविद्यालय के प्रोफसर पॉल डाइसन ने कहा कि यह खोज अपने आप में चिकित्सा जगत में एक नई उपलब्धि है।

वरना वर्तमान में मरीजों पर प्रचलित दवाइयों का असर नहीं होने की असली वजह विषाणुओं में दवा प्रतिरोधक क्षमता का विकसित होना ही है।

इस बैक्टेरिया के गहन विश्लेषण से पता चला है कि आम बैक्टेरिया की तुलना में इसकी संरचना थोड़ी भिन्न है। इस वजह से वह किसी विषाणु को मार डालने की क्षमता रखता है।

शोध की जानकारी के बाद शोध दल के नेता गैरी क्वीन का मानना है कि इस नये किस्म की बैक्टेरिया से नई प्रजाति के दवाइयों के निर्माण में मदद मिलेगी।

इस नई प्रजाति की दवा उन मरीजों पर सामान्य ढंग से काम करेगी, जिनके अंदर मौजूद विषाणु अभी प्रचलित दवाइयों के असर से ऊपर उठ चुके हैं।

शोध दल इस बैक्टेरिया के आधार पर परिष्कृत और वैज्ञानिक तौर पर प्रामाणिक दवाई बनाने की विधि को पंजीबद्ध कर रहा है ताकि दवाई बनाने का काम आगे बढ़ाया जा सके।

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