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सोशल मीडिया ही अब भाजपा के गले की हड्डी बन गया है

  • साइबर सेल पर बहुत भारी पड़ गये हैं पढ़े लिखे किसान

  • बड़े चैनलों के मुकाबले सोशल मीडिया की पहुंच अधिक

  • हर बात का तर्कपूर्ण और मनोरंजक उत्तर भी देते हैं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः सोशल मीडिया कभी भाजपा के प्रचार तंत्र का सबसे कारगर हथियार हुआ करता

था। किसान आंदोलन के घटनाक्रम कुछ ऐसे बदले कि यही हथियार अब भाजपा को ही

काटने पर आमादा है।

वीडियो देखकर समझ लीजिए क्या है किसान आंदोलन के तेवर

किसान आंदोलन के मुद्दे पर बड़े चैनलों का रुख सरकार के समर्थन में होने के बाद भी

सोशल मीडिया उन सारे चैनलों के प्रचार अभियान पर पानी फेर रहा है। व्यापारिक स्तर

पर चैनलों की बातों को जोर शोर से प्रचारित करने की भरसक कोशिश तो हो रही है लेकिन

इसके बाद भी सोशल मीडिया में किसान आंदोलन का समर्थन अधिक हो चुका है। इस

किस्म के वीडियो और उसमें आने वाली प्रतिक्रियाओं को देखकर ऐसा पता चलता है कि

वर्तमान दौर के किसान न सिर्फ पढ़े लिखे है बल्कि कृषि कानूनों के संबंध में सरकार पर

इस किस्म की बहस के दौरान बहुत अधिक भारी पड़ चुके हैं। साथ ही देशज तरीके से

अपनी बात रखने वाले ऐसे लोग आम आदमी के पहुंच के दायरे में हैं। इसी वजह से यह

सोशल मीडिया अब भाजपा पर ही भारी है।

सोशल मीडिया ही चर्चा में ला गया किसान आंदोलन को

किसान आंदोलन के समर्थन में किसान नेताओं द्वारा अपनी बात रखे जाने का

सिलसिला प्रारंभ हुआ तो उन्हीं के बीच से दो ताऊ इतने लोकप्रिय हुए कि बड़े चैनलों तक

को मजबूरी में उनसे बात करनी पड़ी। ऐसा नहीं था कि चैनलों पर इसके लिए कोई दबाव

था। दरअसल इन चैनलों पर टीआरपी का दबाव कुछ ऐसा होता है कि वे भी इस बात को

अपने नियंत्रण कक्ष से समझते रहते हैं कि कौन सा विषय इनदिनों दर्शकों की पसंद का

विषय है। सोशल मीडिया में अपने अंदाज में बोलने वाले हरेंद्र ताऊ और बिल्लू ताऊ अब

भारतीय मीडिया के लिए परिचित नाम है। लेकिन सच यह भी है कि भाजपा की तरफ से

बयान देने वाले नेताओँ पर भी इन दो ताउओं का भय सवार हो चुका है। किसी बात पर

बयान देने के बाद अगर इन दोनों में से किसी ने उस बयान की काट कर दी तो नेता की

फजीहत हो रही है। कुछ इसी तरीके से दोनों ने अपने अपने तरीके से भाजपा के समर्थक

बाबा रामदेव को भी सार्वजनिक तौर पर निपटा ही दिया है। बीच में चैनलों के माध्यम से

बाबा रामदेव अपनी बात रखने आये तो थे लेकिन उसका यह प्रयास भी विफल हो गया

क्योंकि उनके तर्क और सरकार के पक्ष में बोली गयी बातें जनता के भेजे में नहीं गयी। यह

निर्विवाद सत्य है कि किसान आंदोलनों के मूल प्रभाव क्षेत्र में इंटरनेट की सेवा बंद करने

के बाद भी सरकार को इन बातों को रोकने में सफलता नहीं मिल पायी है। किसान

आंदोलन के दोनों ताऊ अब भाजपा के स्टार वक्ताओं के लिए भी भय के केंद्र बन चुके हैं।

कुछ बयान दिया और दोनों ताऊ में से किसी एक ने उसके खिलाफ जुबान खोली तो तय है

कि सोशल मीडिया में उस नेता की फजीहत हो जाएगी।

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