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स्मार्ट फोन पर अधिक निर्भरता भी आपको डिप्रेशन में डालेगा







  • खुद को जांचकर समय रहते संभल जाइये
  • बच्चों पर पहले ही हो चुका है शोध
  • इस बार युवाओं में लक्षण की जांच हुई
  • अगर आप झल्ला जाते हैं तो सावधान होइये
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः स्मार्ट फोन ने निश्चित तौर पर हमारे जीवन के ढेर सारे कार्यों को आसन कर दिया है।

सबसे बड़ी बात है कि हम इससे निरंतर अपने लोगों के संपर्क में होने के साथ साथ

अन्य काम भी करते जाते हैं।

स्मार्ट फोन पास होने से दफ्तरी काम-काज के सूचना तकनीक आधारित काम भी अनावश्यक तरीके से लेट नहीं होते।

अपने चलते फिरते ही इस किस्म के काफी काम निपटा सकते हैं।

लेकिन अब वैज्ञानिक शोध स्मार्ट फोन पर अधिक निर्भरता को खतरे की निशानी मान रहा है।

अनुसंधान में पाया गया है कि स्मार्ट फोन में अधिक उलझे रहने की वजह से

आदमी धीरे धीरे अकेला होता चला जाता है।

इससे उनके दिमाग पर अवसाद के लक्षण पैदा होते हैं।

शोधकर्ताओं ने उस बीमारी की प्रारंभिक पहचान के निशान भी बताये हैं।

ऐसा इसलिए किया गया है ताकि लगातार स्मार्ट फोन के भरोसे अपना सब काम

जल्दी से जल्दी निपटाने की चाह रखने वाले अपने दिमाग पर पड़ने वाले प्रभाव को समय रहते समझ सकें।

वैज्ञानिक अनुसंधान में यह पाया गया है कि दरअसल स्मार्ट फोन पर

अधिक निर्भरता ही आदमी को लोगों और खास तौर पर समाज से काट देता है।

यह बात पहले ही प्रमाणित हो चुकी है कि बच्चों में स्मार्ट फोन का अधिक उपयोग उन्हें अवसाद से पीड़ित कर देता है।

अभी हाल ही में रांची में आयोजित नेत्र चिकित्सकों को एक सम्मेलन में बच्चों की आंखों के लिए भी स्मार्ट फोन को खतरनाक बताया गया है।

विशेषज्ञों ने कहा है कि यदि बच्चे की आंख को बीमारी से बचाये रखना है

तो उसे दिन में दो घंटे से अधिक मोबाइल के पास कतई नहीं रहने दें।

स्मार्ट फोन के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से हुआ शोध

अब बच्चों के बाद युवा पीढ़ी पर यह शोध हुआ है।

वर्तमान में युवा पीढ़ी की तरक्की में स्मार्ट फोन का अहम योगदान बन गया है।

अपने दफ्तर के सारे काम तेजी से निपटाने की चाह में वे इस पर अधिक आश्रित हैं।

इसी स्थिति को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इस शोध को आगे बढ़ाया था।

लगातार काम निपटाकर जीवन में तेजी से आगे निकलने की चाह में

जो मानसिक दबाव उभरता है, वही स्मार्ट फोन की वजह से युवाओं को अकेलेपन की तरफ धकेल देता है।

दरअसल और अधिक काम कर खुद को ज्यादा बेहतर साबित करने की चाह में

ऐसे युवा दोस्तों और समाज से जुड़ने को भी समय की बर्बादी मानने लगते हैं।

ऐसे लोगों को लगता है कि स्मार्ट फोन की बदौलत ज्यादा से ज्यादा काम निपटाना ही

उनके जीवन में ज्यादा काम आ सकता है।

यही से इस मानसिक बीमारी की शुरुआत होती है।

एरिजोआना विश्वविद्यालय के मैथ्यू लेपियरे और उनके दल ने यह शोध किया था।

इसके तहत 10 से 20 साल के युवाओं के बीच सर्वेक्षण किया गया था।

कुल 346 लोगों को इसके दायरे में लाया गया था।

तमाम किस्म के सवाल और लक्षणों की जांच करन के बाद ही वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है।

हर किस्म से जांच लेने के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि

हर काम के लिए स्मार्ट फोन की निर्भरता ही बीमारी को जन्म दे रही है।

वैज्ञानिकों ने इसके प्रारंभिक लक्षण भी स्पष्ट किये हैं

इसके कभी काम नहीं करने की स्थिति में अगर आप तुरंत ही झल्ला जाते हैं

तो आपको समझ लेना चाहिए कि स्मार्ट फोन आपके दिमाग पर प्रतिकूल असर डालने लगा है।

वैसी स्थिति में स्मार्ट फोन से दूर रहकर आपको अपने दोस्तों और समाज के बीच अधिक समय गुजराना चाहिए।

इस आभाषी दुनिया से बाहर वास्तविकता की दुनिया का अनुभव कुछ और होता है,

जो मनुष्य के एक सामाजिक प्राणी होने की वजह से निहायत जरूरी है।

इस शोध के निष्कर्ष को एडोलेसेंट हेल्थ नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

इसमें विस्तार से सारी बातों की जानकारी और निष्कर्षो के मानदंडों का भी खुलासा किया गया है।

काफी वैज्ञानिक तरीके से शोधकर्ताओं ने इस स्मार्ट फोन से पड़ने वाले मानसिक दुष्प्रभावों को रेखांकित किया है।

यह निष्कर्ष बताया गया है कि इसकी की बदौलत कोई काम नहीं होने अथवा इसके जरिए से बात नहीं होने की स्थिति में अगर आप झल्लाने लगते हैं

तो यह बीमारी की शुरुआत के लक्षण हैं।

इसी दौरान व्यक्ति खासकर युवाओं को संभल जाना चाहिए।

प्रारंभिक अवस्था में इसकी रोकथाम नहीं करने तथा मानसिकता को और बिगड़ने का मौका देने के बाद स्थिति और भी बिगड़ती चली जाती है।



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