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छोटे आकार का पोर्टेबल कोविड टेस्ट किट बनाया वैज्ञानिकों ने

  • अब रोगियों तक पहुंचकर जांच करने की सुविधा

  • मात्र तीस मिनट में आयेगी जांच रिपोर्ट

  • छोटे आकार का यंत्र कहीं भी जाएगी

  • स्मार्ट फोन से जुड़कर काम करेगा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः वैज्ञानिकों ने छोटे आकार का कोविड टेस्ट किट तैयार कर लिया है। इससे हर

इलाके में जाकर कोविड की जांच के 30 मिनट के भीतर ही रिपोर्ट देना संभव होगा। इससे

जांच के लिए जरूरी इलाकों की पहचान कर संभावित संक्रमण के इलाकों की पहचान

करने में मदद मिलेगी। इस विधि की खास बात यह है कि इसे स्मार्ट फोन से जोड़कर ही

कोविड जांच रिपोर्ट हासिल की जा सकती है। इसका प्रोटोटाइप बनकर तैयार होने के बाद

उसे और बेहतर बनाया जा रहा है ताकि उसका व्यापक इस्तेमाल किया जा सके।

उल्लेखनीय है कि इस शोध में भी एक भारतवंशी वैज्ञानिक शामिल हैं। इस पोर्टेबल टेस्ट

किट को तैयार करने का असली मकसद रोगियों को जांच केंद्र तक आने के झंझट से

छुटकारा दिलाना है। इसके बदले जांच केंद्र को ही रोगियों के पास तक ले जाना है। जहां

कहीं अधिक रोगी पाये जाएंगे, उसकी त्वरित पहचान से इलाका वार संक्रमण को रोकने

की दिशा में कार्रवाई करना संभव होगा। कोविड की जांच की प्रक्रिया काफी जटिल और

अपारदर्शी होने की वजह से इस जांच के नाम पर भारत जैसे देशों में कई किस्म की

गड़बड़ियों की शिकायतें भी आयी थी। साथ ही जांच रिपोर्ट आने में देर होने की वजह से

जांच केंद्र और मरीज के परिजन दोनों पर अतिरिक्त दबाव भी था। नई विधि से इन दोनों

ही परेशानियों से मुक्ति मिल जाएगी।

छोटे आकार का यह टेस्ट किट इलिनोइस वि. वि. ने बनाया है

यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस के शोधकर्ताओं ने इस पर काम करते हुए जांच विधि का

प्रोटोटाइप तैयार कर लिया है। यह रैपिड कोविड 19 जांच का मॉलिक्यूलर टेस्ट है। इसमें

एक छोटे आकार का उपकरण लगा है जो स्मार्ट फोन से जुड़कर तीस मिनट के भीतर जांच

रिपोर्ट दे देता है। इस बारे में जो शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया है उसके मुताबिक इस

नई जांच विधि से खास तौर पर कोरोना जांच की दिशा में अभी जो विलंब और परेशानियां

हैं, उन्हें तुरंत ही दूर किया जा सकता है। अनेक देशों में मरीज और कोरोना जांच केंद्रों के

बीच की दूरी भी परेशानी और संक्रमण के फैलते जाने का कारण प्रमाणित हो चुकी हैं। अब

रोगी को उनके घर पर अगर जांच की सुविधा मिल जाएगी और तुरंत ही उसकी जांच

रिपोर्ट भी आ जाए तो संक्रमण किन इलाकों में अधिक हैं, उसकी पहचान का काम बहुत

आसान हो जाएगा। इस विश्वविद्यालय के उरबनाना कैम्पैन के प्रोफसर राशिद बशीर ने

कहा कि आंकड़ों को त्वरित गति से जांच के लिए भेजने और उन्हें दोबारा सूचना तकनीक

के जरिए हासिल करने से कमसे कम जांच के दौरान संक्रमण फैलने के खतरे को पूरी तरह

समाप्त किया जा सकेगा।

वर्तमान विधि से अलग है कोरोना जांच की यह विधि

वर्तमान में नाक अथवा गले से तरल अंश हासिल कर उसकी जांच की जाती है। इस नमूने

में मौजूद वायरस की पहचान करने में समय लगता है। दूसरी तरफ इस आरटी पीसीआर

विधि में कई दूसरे कारण भी होते हैं, जो जांच परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। इस

वजह से भी कई बार जांच रिपोर्ट सही नहीं आती है। इसके बदले यह पोर्टबल विधि तैयार

की गयी है। इस विधि का नाम एलएएमपी यानी लैंप रखा गया है। इस विधि में जांच के

लिए सिर्फ एक तापमान जरूरी होती है। इसे सिर्फ 65 डिग्री पर संचालित किया जाता है

और यह तापमान नियंत्रित रखने में कोई खास परेशानी भी नहीं है। शोध प्रबंध के प्रथम

लेखक अनुरुप गांगुली ने कहा कि तापमान को नियंत्रित करना आसान होने की वजह से

भी जांच पहले के मुकाबले और सरल विधि बन गयी है। इस विधि में जांच के नमूने में

वायरस को तापमान से गर्म कर तोड़ा जाता है। इसके टूटते ही अंदर सार्स कोव 2 के

वायरस हैं अथवा नहीं, उसकी पहचान हो जाती है। इस लिहाज से यह विधि कम समय में

कारगर और दूर दराज तक आसानी से पहुंच वाली बन गयी है।

इस विधि से होने वाली जांच के बारे में बताया गया है कि इसमें एक छोटे से उपकरण में

एक छोटा थ्री डी कार्टिज लगाया गया है। उसमें दो तरीके से आंकड़े भेजे जा सकते हैं। यह

आंकडे सीरिंज के माध्यम से उसके अंदर आते हैं। इनमें से एक जांच के लिए लाया गया

नमूना और दूसरा इस लैंप विधि के रसायन हैं। अंदर आने के बाद रासायनिक प्रक्रिया के

तहत इस कार्टिज से ही वह आंकड़ा बाहर आ जाता है, जो यह बता देता है कि जांच के लिए

लाये गये नमूने में कोरोना वायरस है अथवा नहीं।


 

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