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छोटे आकार का उल्कापिंड गिरेगा पृथ्वी पर

  • बड़े खतरे की कोई उम्मीद भी नहीं

  • पिछले सप्ताह भी निकट से गुजरा एक

  • उल्कापिंडों में भी छिपा है जीवन का राज

  • उल्कापिंड का खतरा सच साबित होगा अगले नवंबर माह में

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः छोटे आकार के एक उल्कापिंड के पृथ्वी पर गिरने की घटना अगले नवंबर माह

में सच साबित होने जा रही है। वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक यह उल्कापिंड गिरने की

तिथि भी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के ठीक एक दिन पहले ही आंकी गयी है। कोरोना की

वजह से हैरान और परेशान दुनिया के लिए उल्कापिंड का गिरना एक और आफत है। वैसे

आकार में काफी छोटा होने की वजह से इससे किसी बड़े नुकसान की कोई आशंका नहीं है।

नासा के वैज्ञानिक इस छोटे आकार के उल्कापिंड पर नजर रख रहे हैं। उनकी गणना के

मुताबिक यह आगामी 2 नवंबर को पृथ्वी पर गिर सकता है। लेकिन फिलहाल काफी दूर

होने की वजह से इसकी दिशा और गति में फेरबदल होने से यह अनुमान गलत भी हो

सकता है। वैसे याद रहे कि आगमी 3 नवंबर को अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव होना

निर्धारित है।

जिस उल्कापिंड के पृथ्वी से आ टकराने की बात कही गयी है, उसका नाम एस्ट्रोयड

2018वीपी 1 है। यह करीब साढ़े छह फीट व्यास का है। आकार में छोटा होने की वजह से ही

इसके पृथ्वी पर आ गिरने की आशंका जतायी गयी है। वर्तमान गणना के मुताबिक इसे

पृथ्वी के बहुत करीब से गुजर जाना है। लेकिन इतने छोटे आकार के किसी भी पिंड पर

पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण काम करने की स्थिति में वह दिशा बदलकर पृथ्वी की तरफ

आयेगा, इसकी आशंका अधिक है। इसके बारे में खगोल वैज्ञानिकों ने बताया कि सबसे

पहले इसे वर्ष 2018 में देखा गया था। पालामोर खगोल केंद्र के वैज्ञानिकों ने इस छोटे से

आकार के उल्कापिंड को पहली बार देखा था।

छोटे आकार के उल्कापिंड की 2018 में पहली बार देखा गया

उसके बाद से ही इसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। अब नासा का एलान है कि

इसके पृथ्वी पर गिरने से भी कोई खास बड़ा हादसा होने की कोई उम्मीद नहीं है। दूसरी

तरफ नासा से इतर वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर वाकई यह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से

खिंचा चला आता है तो पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही इसमें आग लग जाएगी।

बहुत अधिक संभावना है कि पृथ्वी पर इसके गिरने के पहले ही यह घर्षण की वजह से

जलकर राख हो जाए।

वैसे इसी गणना के बीच यह भी बता दिया गया है कि एक और उल्कापिंड इसी बीच

सितंबर माह में पृथ्वी के करीब से गुजरने वाला है। यह पृथ्वी से चांद के मुकाबले कम दूरी

से गुजरेगा लेकिन उसके पृथ्वी की तरफ आने की उम्मीद नहीं है।

अभी पिछले दिनों एक एसयूवी के आकार का उल्कापिंड भी पृथ्वी के लगभग कान के

बगल से गुजर गया है। यह दक्षिण भारत महासागर के 2950 किलोमीटर की ऊंचाई से

पिछले सप्ताह गुजरा है। इसके गुजर जाने के बाद इसे पहली बार देखने का श्रेय दो

भारतीय युवाओं को दिया गया है। आइआइटी मुंबई के छात्र कुणाल देशमुख और कीर्ति

शर्मा ने इसे सबसे पहले देखा था। नासा ने बाद में स्वीकार कर लिया है कि इसपर ध्यान

देने में उनसे चूक हुई थी। इसी वजह से बिल्कुल करीब आने तक नासा को इसके बारे में

कोई भनक तक नहीं मिली थी क्योंकि उस तरफ नासा के वैज्ञानिकों ने ध्यान ही नहीं

दिया था। मुंबई के इंजीनियरिंग के छात्रों ने इसके लिए कैलिफोर्निया के जेडटीएफ

रोबोटिक पद्धति का लाभ लिया था।

नासा को पछाड़ दिया मुंबई के दो इंजीनियरिंग छात्रों ने

इनदिनों उल्कापिंडों पर शोध का दायरा इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि अनेक विधा के

वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे है। यह वैज्ञानिक आकलन है कि एक छोटे गेंद के आकार

का उल्कापिंड भी इस सौरमंडल में पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के बारे में काफी नयी

जानकारी दे सकता है। इस शोध को अंटार्कटिका से गति मिली है। वहां जापान और

बेल्जियम क शोध दल ने गॉल्फ की गेंद के आकार का एक उल्कापिंड खोज निकाला था।

इसका नाम आसूका 12236 है। अब उस पर हुए शोध से अनेक नये तथ्यों की जानकारी

मिली है। इसी वजह से उल्कापिंडों के सहारे पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के सुराग

तलाशने का काम तेज हो गया है।


 

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