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कंजूसी नहीं इसे समझदारी कह सकते हैं

कंजूसी शब्द को लेकर हम काफी पहले से ही एक अजीब नकारात्मक धारणा रखते आये

हैं। आम तौर पर दीपावली के मौके पर कंजूस नजर आने वाला हर शख्त भी अपने लिए

उदार बन जाता है। लेकिन इस बार का दीपावली बाजार दुर्गा पूजा के कारोबार से बेहतर

होने के बाद भी इसी कंजूसी के प्रदर्शित कर रहा है। ऐसे नहीं है कि सिर्फ ग्राहक ही कंजूस हैं

बल्कि दुकानदारों ने भी खुलकर अपने हाथ नहीं खोले हैं। दोनों तरफ की इस कंजूसी को

अगर हम कोरोना संकट से जोड़कर देखें यह अप्रत्याशित परिस्थितियों से उपजे संकट की

वजह से इसे समझदारी भरा फैसला माना जा सकता है। दरअसल इस बार के दीपावली

बाजार में संभल संभलकर चलने की यह प्रवृत्ति कोरोना संकट की उपज है। इसके लिए

हमें खास तौर पर कोरोना संकट के प्रारंभिक दिनों में मध्यम आय वर्ग के घरों के हाल को

भी समीक्षा में शामिल करना चाहिए। दरअसल जब लॉकडाउन लगा तो लोगों को शायद

इस बात का एहसास भी नहीं था कि संकट कितना गहरा है। लिहाजा लॉकडाउन के बिन

मांगे छुट्टी मानकर अधिकांश घरों में पिकनिक का माहौल रहा। यहां तक कि लोगों के घरों

में यूट्यूब पर देखकर नये नये पकवान बनाने का प्रयोग भी हुआ। जैसे जैसे दिन बीते

संकट का एहसास बढ़ता गया। तब तक घर का बजट भी बिगड़ चुका था क्योंकि दो महीने

का राशन भी घर में निठल्ला बैठे लोगों ने उड़ा दिया था। उसी संकट से यह समझदारी

उपजी है, जिसे हम बाजार में भी कंजूसी के तौर पर देख रहे हैं। रांची के बाजार पर भी गौर

करें तो बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर से लेकर आभूषणों के दुकान और फुटपाथ सभी स्थानों पर

यह बचत की प्रवृत्ति नजर आ रही है।

कंजूसी नहीं हमारी प्राचीन बचत की अर्थव्यवस्था भी है

यह प्राचीन भारतीय पारिवारिक अर्थव्यवस्था की ही देन है कि हम बचत की अर्थव्यवस्था

के आधार पर सारा काम करते हैं। इससे पहले भी वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में जब बड़े

बड़े अमेरिकी बैंक भी दीवालिया हो गये तो भारत इसके झटके को सहन कर पाया था।

लेकिन इस बार की परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न थी क्योंकि आर्थिक मंदी के दौर में भी

कारोबार बंद नहीं था। इस बार के कोरोना संकट ने तो कारोबार का पहिया ही रोक दिया

था। दीवाली के मौके पर सड़क और बाजार में लोगों की भीड़ देखने को मिल रही है और वह

इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहती हैं। हालांकि दुकान के बाहर की तस्वीर बिल्कुल

अलग है। चारों ओर भीड़ नजर आती है, पटरी पर सामान, कपड़े बेचे जा रहे हैं, कई दुकानें

खरीदारों को आकर्षित करने में लगी हुई हैं। ऐसा लगता है कि कारोबार में सुधार के संकेत

दिख रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ जगहों पर ही है क्योंकि उपभोक्ता बेहद सावधानी से बाहर

कदम बढ़ा रहे हैं और खुदरा विक्रेता इस मौके को भुनाना चाहते हैं। पिछले महीने भारतीय

खुदरा विक्रेताओं के संगठन ने एक अध्ययन में कहा था कि दीवाली के मौके पर मॉल या

खरीदारी के प्रमुख केंद्रों के मुकाबले शहर के प्रमुख सड़कों के बाजारों की खरीदारी में तेजी

आएगी। यह आकलन बिल्कुल सही साबित हो रहा है। वैसे यह सवाल प्रासंगिक है कि

अगर लोगों की कंजूसी इतनी प्रवल है तो गाड़ियों की इतनी अधिक बिक्री क्यों हो रही है।

अब लोग सार्वजनिक परिवहन से बचना चाहते हैं

अधिकांश गाड़ियों के शो रुम में गाड़ियों की बुकिंग पर तुरंत वाहन उपलब्ध नहीं हैं बल्कि

तीन महीने का समय दिया जा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोरोना संकट की वजह से

अब लोग सार्वजनिक परिवहनों का इस्तेमाल करने से कतरा रहे हैं। अपने जरूरी काम के

लिए शहर के बाहर जाने के लिए लोग अपने वाहनों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे उन्हें

कोरोना से बचाव का एहसास होता है। एक थोक कारोबारी के मुताबिक अप्रैल-मई में

लॉकडाउन के बाद कम से कम 25 फीसदी कारोबार ऐसे हैं जो फिर से शुरू नहीं हो पाए हैं।

वह कहते हैं, ‘बिक्री अब तक बहुत कम रही है और यह हममें से ज्यादातर के लिए 40-60

प्रतिशत तक है। खुदरा विक्रेताओं की तरफ से की जाने वाली मांग पिछले साल से कम हो

गई है। इसके अलावा इनमें से कई लोगों की अपने वाहनों तक पहुंच नहीं है और वे अपनी

दुकान चलाने में असमर्थ हैं। जिन बड़े मॉल में वाहन पार्किंग के लिए जगह खोजना पड़ता

था, वहां आसानी से खाली स्थान नजर आने से भी स्थिति का वास्तविक अंदाजा हो जाता

है। सड़कों पर जो भीड़ है वह अपनी जरूरत से बाहर कुछ भी नहीं खरीद रही है लेकिन

सड़कों पर मंडराते हुए कहां क्या कुछ नया है, उसके बारे में जानकारी हासिल कर रही है।

इसलिए हम मान सकते हैं कि यह कंजूसी दरअसल भविष्य के किसी ऐसे ही संकट से

बचाव का हथियार ही है।

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