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आसमान के चमकते सफेद धब्बे दरअसल ब्लैक होल हैं देखें वीडियो

  • जर्मनी के वैज्ञानिकों ने नया निष्कर्ष निकाला

  • आसमान में खुली आंखों से भी देख सकते हैं इन्हें

  • यह पानी के भंवर जैसी स्थिति का ही बड़ा रुप है

  • रेडियो एंटैना से रेडियो संकेतों का भी विश्लेषण हुआ

राष्ट्रीय खबर

रांचीः आसमान के चमकते सफेद धब्बों के समूहों को हम अक्सर ही देखा करते हैं। अगर

आसमान साफ हो पूरे आसमान में हमें ऐसे छोटे छोटे चमकते धब्बे नजर आते हैं। इससे

पहले यह वैज्ञानिक धारणा थी कि यह चमकते धब्बे दरअसल सुदूर महाकाश के तारें हैं।

पहली बार यह धारणा बदल रही है। एक नये शोध के तहत वैज्ञानिक बता रहे हैं कि

आसमान में टिमटिमाते यह छोटे छोटे चमकीले धब्बे दरअसल ब्लैक होल हैं।

इस एनिमेशन फिल्म से समझिये महाकाश को

उसके आस पास से हो रहे गैसों के उत्सर्जन की वजह से वे इस तरह से टिमटिमाते रहे हैं।

यह चमकीला हिस्सा, जो हमें अपनी खुली आंखों से नजर आता है, वह ब्लैक होल का

बाहरी हिस्सा है, जहां आस पास के तारे टूटकर विखंडित होने की वजह से रोशनी बिखेरते

रहते हैं। इस नई वैज्ञानिक सोच से अब यह माना जा सकता है कि ब्लैक होल नजर नहीं

आने के बाद भी उनका बाहरी हिस्सा हर किसी को खुली आंखों से और खुले आसमान में

साफ साफ नजर आता रहता है।


अंतरिक्ष विज्ञान की कुछ रोचक खबरों को यहां पढ़ें


जर्मनी के हैमबर्ग विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने काफी लंबे अनुसंधान के बाद यह

निष्कर्ष निकाला है। इस शोध से संबंधित वैज्ञानिक शोध प्रबंध प्रकाशित भी किया गया

है। इसे तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों ने वर्षों तक निरंतर परिश्रम किया है। सुदूर अंतरिक्ष

से मिल रहे रेडियो संकेतों और अन्य आंकड़ों का विश्लेषण करना कोई आसान काम नहीं

था। हर आंकड़े को अलग अलग विश्लेषित करने के बाद तमाम आंकड़ों को समग्र तौर पर

विश्लेषित किया गया है। इस काम को पूरा करने के लिए वैज्ञानिकों के एक बहुत बड़े दल

ने आसमान पर नजर आने वाले छोटे छोटे चमकीले हिस्सों के 25 हजार समूहों का एक

मैप भी तैयार किया है।

आसमान के चमकते इलाकों का गहन विश्लेषण हुआ है

आसमान के चमकते सफेद धब्बे का हर कुछ रिकार्ड करने के बाद उनका विश्लेषण किया

गया है। इस शोध के बारे में हैमबर्ग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक फ्रांसिसको डी गैसपेरिन

ने बताया कि हर आंकड़े का अलग अलग विश्लेषण करने में भी वर्षों लगे हैं। टेलीस्कोप के

आंकड़ों की बात करें तो इनके लिए जितने टेलीस्कोप इस्तेमाल हुए हैं वे आकार में यूरोप

के बराबर भी हो सकते हैं। इस निष्कर्ष की जानकारी देते हुए वैज्ञानिक दल ने फिर से इस

बात को दोहराया है कि ब्लैक होल का अपना गुरुत्वाकर्षण इतना प्रचंड होता है कि उनका

पता ही नहीं चल पाता है। सिर्फ वे जब आस पास के तारों को अपनी तरफ खिंचते हैं तो


अंतरिक्ष विज्ञान आधारित कुछ उपयोग सूचनाएं यहां जान लें


टूटने के क्रम में यह तारे ही अपने अंदर के गैस और सुक्ष्म कणों का ढेर सारा हिस्सा

अंतरिक्ष में छोड़ते रहते हैं। यही गर्म गैस और सुक्ष्म कण टूटकर बिखरने के दौरान जो

रोशनी पैदा करते हैं उसे हम अब तक टिमटिमाते हुए तारे समझते आये हैं। इसे आसान

तरीके समझाते हुए वैज्ञानिकों ने बताया है कि जब किसी नाली के अंदर प्रवेश करता हुआ

ढेर सारा पानी होता है तो वहां एक घुर्णन सा बनता है। आम तौर पर हम खास तौर पर

पहाड़ी नदियों में इसे भंवर के तौर पर देखते आये हैं।

यह पानी के भंवर जैसी स्थिति है, जिसे हम देखते हैं

सुदूर अंतरिक्ष में भी ब्लैक होल को नाली का प्रवेश द्वार समझते हुए इस बात को समझा

जा सकता है कि जो तारे अंदर प्रवेश कर रहे होते हैं, वे जब चारों तरफ तेजी से चक्कर

काटते हुए टूटते हैं तो ऐसा ही भंवर बनता है। एक बार उस महाकाश के भंवर के अंदर जाने

वाले का फिर कुछ बता नहीं चल पाता है। इस बात से यह समझा जा सकता है कि उनके

केंद्र में ही ब्लैक होल है, जिसे हम वाकई नहीं देख पाते हैं।

वैज्ञानिकों ने उन तमाम इलाकों से मिल रहे रेडियो संकेतों का एक एक कर अध्ययन

किया है। इसके लिए बीस हजार रेडियो एंटेना काम में लाये गये हैं। यह सारे रेडियो एंटेना

पूरे यूरोप के 52 अलग अलग स्थानों पर स्थापित हैं। आसमान के जिस हिस्से की जांच

की गयी है वह उत्तरी छोर के आसमान का एक छोटा सा हिस्सा है। इसी छोटे से हिस्से के

25 हजार ऐसे टिमटिमाते इलाकों की एक एक कर पहचान की गयी है। उसके बाद ही

वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि आसमान के चमकते सफेद धब्बे दरअसल ब्लैक होल

हैं, जिन्हें हम इससे पहले तारा समझते आये थे।


कुछ अनजाने वैज्ञानिक तथ्यों को भी जान लें इनसे

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