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आत्मनिर्भर भारत की तरफ कदम बढ़ा चुके हैं स्वदेशी वैज्ञानिक

  • मोदी की अपील के पहले से काम प्रारंभ

  • दुनिया की प्रतिस्पर्धा में स्टार्टअप भी शामिल

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी मान लिया भारत का लोहा

  • कोरोना वैक्सिन बनाने का काम आठ शहरों में 14 केंद्रों पर

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः आत्मनिर्भर भारत का नया नारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया है।

उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में इसका उल्लेख करते हुए कहा था कि अब अकेले

वायरस ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया है। अब इस संकट से हुए आर्थिक नुकसान

की भरपाई करते हुए आगे बढ़ने का सबसे मजबूत रास्ता देश की आत्मनिर्भरता से संभव

है। प्रधानमंत्री ने इसे आर्थिक मोर्चे पर छाये संकट के संदर्भ में देशवासियों को बताया था।

लेकिन भारतीय वैज्ञानिक इस आत्मनिर्भरता को पहले ही समझ चुके थे। देश का

वैज्ञानिक मस्तिष्क यह अच्छी तरह समझ रहा है कि विकास संबंधी तमाम परियोजनाओं

में अब दूसरों पर निर्भर रहना भारत के लिए कतई फायदेमंद नहीं है। इसलिए वर्तमान

वैश्विक संकट कोरोना से निपटने के लिए भारतीय वैज्ञानिक इसी आत्मनिर्भर भारत की

तरफ कदम बढ़ाते हुए युद्ध स्तर पर दिनरात काम कर रहे हैं।

अभी की सार्वजनिक सूचना के मुताबिक देश के आठ शहरों के 14 अनुसंधान केंद्रों में

कोरोना वायरस का वैक्सिन तैयार करने का काम दिन रात चल रहा है। वैसे यह अच्छी

बात है कि इस कोरोना संकट ने पूरी दुनिया को यह जानने का अवसर दे दिया कि दुनिया

में सबसे बड़ा वैक्सिन निर्माता दरअसल भारत ही है। विभिन्न किस्म की बीमारियों के

लिए वैक्सिन बनाकर दुनिया के 150 देशों को इसे उपलब्ध कराने वाला अकेला देश

भारतवर्ष ही है। आत्मनिर्भर भारत की दिशा में यह भारत की वैश्विक पहचान है।

आत्मनिर्भर भारत देश को वैश्विक तौर पर स्थापित कर देगा

वैक्सिन बनाने की सबसे बड़ी फैक्ट्री भी भारत में है। वरना इससे पूर्व विकसित देशों की

बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यापार कौशल की बदौलत भारतीय क्षमता को पर्दे के पीछे

रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अब भारत की बात करें तो जिन 14 अनुसंधान केंद्रों में

यह काम चल रहा है उनमें से एक में अब ट्रायल जैसी परिस्थिति बनी है। चार अन्य

अनुसंधान केंद्रों में भी यह काम काफी आगे बढ़ चुका है। केंद्र सरकार को इन तमाम केंद्रों

में चल रहे शोध और उसके निष्कर्षों की पूरी जानकारी है। वर्तमान में यह रिपोर्ट दैनिक

स्तर पर भेजी जा रही है। साथ ही एक दूसरे से यह शोध निष्कर्ष सांझा भी किया जा रहा

है। प्रधानमंत्री केयर फंड ने खास तौर पर वैक्सिन निर्माण के लिए एक सौ करोड़ के कोष

का आवंटन किया है। लेकिन सरकारी एजेंसियां इस बात पर मौन हैं कि यह एक सौ करोड़

सभी 14 अनुसंधान केंद्रों के लिए हैं अथवा नहीं। वैसे यह संकेत मिले हैं कि शोध संबंधी

तमाम परियोजनाओं में अगर जरूरत पड़ी तो अन्य योजनाओं के तहत भी धन उपलब्ध

कराया जाएगा ताकि किसी भी स्तर पर आत्मनिर्भर भारत अभियान के साथ साथ अपना

देश अन्य गरीब देशों को भी सस्ते दर पर कोरोना का वैक्सिन उपलब्ध करा सके।

वैक्सिन निर्माण में सबसे आगे है भारतवर्ष

वैसे इन परियोजनाओं के बारे में रोचक स्थिति यह है कि 14 में से सात परियोजनाएं दो

शहरों में चल रही है। महाराष्ट्र के पुणे में चार और आंध्रप्रदेश के हैदराबाद में तीन शोध

कार्य चल रहे हैं। इसके अलावा अहमदाबाद, वेल्लोर, नईदिल्ली, इंदौर, तिरुअनंतपुरम

और मोहाली में भी वैक्सिन पर शोध चल रहा है। जानकारी के मुताबिक कुल मिलाकर

तीस अलग अलग परियोजनाएं सिर्फ इसी पर काम कर रही हैं। अलग अलग तरीके से

कोरोना को रोकने का यह प्रयास एक आत्मनिर्भर भारत की तरफ बढ़ा हुआ बड़ा कदम भी

साबित हो सकता है।

आत्मनिर्भर भारत योजना के अलावा भी छह भारतीय कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल

रहे अनुसंधान का हिस्सा हैं। अलग अलग तरीके से काम करने वाली वैक्सिन बनाने के

साथ साथ कोरोना को बचाव देने वाले स्पाइक प्रोटिन के आवरण को ध्वस्त करने की

दिशा में देश के वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। अच्छी बात यह भी है कि इस अंतर्राष्ट्रीय

चुनौती के मैदान में उतरने वाली भारतीय कंपनियों में कुछ स्टार्टअप परियोजनाएं भी हैं।

जो निश्चित तौर पर अपने आप में आत्मनिर्भर भारत अभियान के लिए एक बड़ी

उपलब्धि है।

आत्मनिर्भर भारत अभियान में दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि निजी क्षेत्र के

उद्यम भी इस राष्ट्रीय संकट में खुलकर मैदान में आये हैं। उन्होंने भी इस दिशा में पूरी

ताकत लगा दी है। इस पूरे घटनाक्रम से यह भी साबित हो गया है कि दुनिया भर में भारत

की पहचान एक प्रमुख दवा और वैक्सिन निर्माता के तौर पर पहुंची है। विश्व स्वास्थ्य 

संगठन ने भी भारत की इस भूमिका की सराहना की है।


 

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