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कोरोना चक्र तोड़ने का बेहतर और सार्थक प्रयोग

कोरोना चक्र तोड़े बिना इस रोग को फैलने से फिलहाल नहीं रोका जा सकता। दुनिया भर

में कोविड 19 के खिलाफ दवा बनाने पर अनुसंधान जारी है। लेकिन अब तक सिर्फ इसी

रोग को समाप्त करने की कोई दवा सामने नहीं आयी है। कई दवाओं के मिश्रण और रोगी

के अंदर की प्रतिरोधक क्षमता की मदद से ही लोग ठीक हो रहे हैं। इसलिए इस कोरोना

चक्र को तोड़े बिना फिलहाल इसे रोक पाना संभव नहीं है। भारत ने जनता कर्फ्यू के

माध्यम से इस कोरोना चक्र को तोड़ने का अच्छा प्रयोग किया है। लोगों से दूरी बनाकर

रहने के इन चौदह घंटों में हम भारत जैसे देश में करोड़ों लोगों को संक्रमण से बचा पा रहे

हैं, इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। गनीमत है कि यह रोग हवा के साथ

संक्रामक बनकर नहीं फैल रहा है। वरना स्थिति इससे भी अधिक गंभीर हो सकती थी।

सीधे संपर्क अथवा छींक अथवा खांसी के अति सुक्ष्म कणों से ही यह एक व्यक्ति से दूसरे

व्यक्ति तक पहुंच रहा है। यह स्पष्ट है कि यह रोग चीन से अन्य देशों से होते हुए भारत

आ पहुंचा है। विदेश से आने वालों को जो सावधानी अपने आप बरतनी चाहिए थी, वैसा

उनलोगों ने नहीं किया। नतीजा है कि पूरा देश अब इसकी मार झेल रहा है। संदिग्ध रोगी

भी अस्पतालों से भाग रहे हैं और जानकारी छिपाकर रहने की वजह से दूसरों तक इस

संक्रमण को पहुंचा रहे हैं।

कोरोना चक्र तोड़ना ही बचाव का आसान रास्ता

ऐसी स्थिति में जनता कर्फ्यू उस समस्या को सामयिक तौर पर रोक देने का एक कारगर

तरीका है। कोरोना चक्र को बीच में ही तोड़ देने के लिए उस अदृश्य शत्रु के हमला करने के

तौर तरीकों को बेहतर ढंग से समझा जाना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हम

घनी आबादी वाले देश हैं। 12 घंटे के जनता कर्फ्यू में एक दूसरे और संक्रमण वाले इलाकों

से दूर रहकर हम असंख्य विषाणुओं को स्वत: समाप्त कर सकते हैं, जो किन्हीं कारणों से

देश में आ चुके हैं। वैज्ञानिक परिभाषा के मुताबिक इसके विषाणु आम तौर पर हवा में तीन

घंटे, पीतल पर चार घंटे, किसी कार्डबोर्ड पर 24 घंटे तक जीवित रहते हैं। यह याद रखना

होगा कि यह विषाणु प्लास्टिक और स्टेनलेस स्टील पर 72 घंटे तक बचा रह सकता है

वशर्ते की तापमान कम हो। यह स्पष्ट हो गया है कि अधिक तापमान में इस प्रजाति के

विषाणु अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं। अनेक वैज्ञानिक शोध प्रबंधों का निष्कर्ष है कि

30 डिग्री (86 डिग्री फॉरेनहाइट) से ऊपर के तापमान में विषाणु कारगर नहीं रहते। वैसे भी

उनकी क्षमता 23 डिग्री तापमान से ऊपर अचेतावस्था की हो जाती है। इसलिए जिन

इलाकों का तापमान 23 डिग्री से ऊपर है, वहां की चिंता अपने आप ही समाप्त हो जाती है।

दूसरी तरफ घर और बाहर के जिन इलाकों में यह तापमान 23 डिग्री से नीचे हैं, वहां के बारे

में ख्याल रखने का सबसे आसान तरीका है कि उनसे दूर रहा जाए। विज्ञान इसका अंदाजा

लगा रहा है लेकिन यह कोई वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है। 

मौसम के बदलाव और नई दवा की खोज से उम्मीद

अत्यधिक कम तापमान के इलाकों में इसके वायरस नौ दिनों तक जीवित पाये गये हैं,

ऐसा वैज्ञानिकों का दावा है लेकिन अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए सावधानी और

दूसरों से दूर रहकर हम अपना और दूसरों का बचाव कर सकते हैं। यह इसलिए भी जरूरी है

क्योंकि कोरोना चक्र का कुप्रभाव भारत जैसे अधिक आबादी वाले देश में बहुत घातक

परिणाम दे सकता है। इन तमाम कारणों से यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने

जनता कर्फ्यू की जो अपील की है, वह बहुत सोच समझकर की गयी अपील है। इसके पीछे

वैज्ञानिक सोच है और इसके माध्यम से भारत पर हो चुके इस अदृश्य हमले के पचास

प्रतिशत को रोकने में हम कामयाब हो जाएगा। वैसे यह तय है कि अगले दो सप्ताह में

अगर फिर से इसका प्रकोप और बढ़ा जो यही विधि और अधिक समय तक आजमाकर भी

हम इस विषाणु से जीत सकते हैं। हम एक दूसरे से जितना कम संपर्क में रहेंगे, उतना ही

वायरस को फैलने से रोक लेंगे। आने वाले दिनों में जैसे जैसे तापमान बढ़ेगा, विषाणु की

मारक क्षमता समाप्त होती चली जाएगी। इस बीच विषाणु के मूल की पहचान कनाडा में

होने की वजह से यह उम्मीद भी की जा सकती है कि इसके लिए कोई दवा भी तैयार हो

जाए। तब तक कोरोना चक्र को आगे बढ़ने से रोकने के लिए यह तरीका कारगर है और

अगर आवश्यकता हो को पूर्व घोषणा कर इसे लगातार दो दिनों तक भी किया जाना

चाहिए ताकि अधिकाधिक लोगों तक इस संक्रमण के फैलने का कोरोना चक्र तोड़ा जा

सके। इससे अधिक आबादी वाला देश भारत कई तरीके से लाभान्वित होगा।


 

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