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हब्बल टेलीस्कोप की आंखों से देखिये अंतरिक्ष के अजूबे स्थानों को




  • यहां के सौर मंडल घूमते हुए नजर आते हैं
  • जेम्स वेब टेलीस्कोप उसका स्थान लेगा
  • लगातार घूमते सौर मंडलों का समूह है
  • नदियों के प्रवाह की तरह दिख रहे तारे
राष्ट्रीय खबर

रांचीः हब्बल टेलीस्कोप शीघ्र ही बीते दिनों की बात हो जाएगी। उसके स्थान पर नया और अत्याधुनिक खगोल दूरबीन जेम्स वेब टेलीस्कोप को अंतरिक्ष में भेजा जा चुका है। यह नया टेलीस्कोप फिलहाल धरती से चार लाख मील की दूरी पर धीरे धीरे खुद को काम करने के लिए स्थापित कर रहा है।




इस बीच हब्बल टेलीस्कोप अपनी तरफ से एक नये इलाके का पता बताने में कामयाब हुआ है। इस इलाके पर खगोल वैज्ञानिकों की नजर गयी है।

देखने में यह सौरमंडलों का एक समूह है। जिसके बारे में प्रारंभिक अनुमान है कि इस इलाके में अनेक सौरमंडल एक साथ मौजूद हैं, जो सभी के सभी शायद अपनी धुरी पर चक्कर काट रहे हैं। बीते साल के अंतिम दिनों में हब्बल ने अपने नियंत्रण कक्ष तक यह चित्र भेजे हैं। नासा ने इस एनजीसी 3568 के इलाके के बारे में अपनी तरफ से जानकारी भी उपलब्ध करायी है।

हब्बल टेलीस्कोप की नजर पहली बार पड़ी

हब्बल टेलीस्कोप से मिली इन तस्वीरों के आधार पर यह बताया गया है कि अंतरिक्ष के इस इलाके में मौजूद सौरमंडलों में सुपरनोवा जैसी स्थिति भी है और वहां धूमकेतु भी हैं। यानी सभी में अपना अपना पूरा इलाका तारों, ग्रहों और धूमकेतु के साथ साथ कई ग्रहों के उपग्रहों वाला भी हो सकता है।




वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जेम्स वेब टेलीस्कोप के चालू होने के बाद अंतरिक्ष के इस इलाके के बारे में और अधिक जानकारी मिल पायेगी। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उसमें हब्बल टेलीस्कोप के मुकाबले अधिक शक्तिशाली लेंस लगे हुए हैं। वैसे इस इलाके पर नजरदारी के क्रम में वहां विस्फोट होने की भी जानकारी नियंत्रण कक्ष को मिली है।

यानी खगोल विज्ञान के लिहाज से यह एक अत्यंत सक्रिय इलाका है। जिसके बारे में लोगों को पहले अधिक जानकारी नहीं मिल पायी थी। प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक यह सौरजगत के मिल्की वे से करीब 57 मिलियन प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। इसी वजह से पहले इसकी जानकारी नहीं मिली थी।

गैस की चादरों के बीच नदी जैसे घूम रहे तारे

एनजीसी 3568 के बारे में यह अनुमान है कि यह सारा इलाका अपने ही गैसों की चादर से ढका हुआ है। इसका विश्लेषण करने वालों के मुताबिक घूमते हुए इलाकों में तारों का समूह किसी नदी के प्रवाह की शक्ल में नजर आता है। बीच बीच में उसमें तारों का विस्फोट भी होता हुआ दिख जाता है।

शायद इसी वजह से इनके चारों तरफ गैस की गुबार है। वर्ष 2008 के एक अध्ययन में ऐसी ही एक और इलाके का पता चला था। अब नये इलाके की जानकारी मिलने की वजह से यह भी माना जा रहा है कि दरअसल अब तक हमारा आधुनिक विज्ञान इस पूरे सौर जगत का पूरी तरह से पता नहीं लगा पाया है। इस नये इलाके के बारे में यह अनुमान भी लगाया गया है कि आपसी आकर्षण की वजह से यहां मौजूद तारे आपस में करीब आते हुए इस नदी के प्रवाह की शक्ल में घूम रहे हैं।



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