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देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी वोटों के मांग में




देख तेरे संसार की हालत इस वोट मांगने की वजह से क्या हो चुकी है। अब तो एक एक वोट खरीदने तक की बात होने लगी है। ऐसे में चकाचक कुर्ता झाड़कर लोगों के बीच हाथ जोड़कर जाने वालों को लगा कि मामला उलझ रहा है तो अब महात्मा गांधी तक को लपेट लिया।




पहले ही साफ कर दूं कि यह महात्मा गांधी के खिलाफ विषवमन सिर्फ इस मकसद से है ताकि फिर से लोग एक नाहक बहस में उलझकर फिर से हिंदू और मुसलमान की बात करने लगे। अइसे में फिर से बेरोजगार, महंगाई, पेट्रोल, कोरोना और भ्रष्टाचार का मामला किनारे लग जाएगा।

दरअसल इसे किसान आंदोलन के वक्त भी आजमाने की पुरजोर कोशिश हुई थी लेकिन हुक्का पीने वाले किसानों ने अपने दिमाग में धुआं देकर इसे न सिर्फ समझ लिया था बल्कि नाकामयाब भी कर दिया था। लेकिन अब तो चुनाव की बारी है। ऐसे में कुछ न कुछ तो बोलना ही पड़ेगा, जिससे मतलब सधता हो।

पहले जब शिव की आराधना करते एक महाराज की अचानक तारीफ होने लगी थी तो पीछे मुड़कर भी उस तारीफ को देख लिया जाना चाहिए। उसी समय से इस व्यक्ति को आगे बढ़ाने की कवायद प्रारंभ हो चुकी थी ताकि समय पर उसका इस्तेमाल किया जा सके।

सोशल मीडिया की बदौलत प्रसिद्धि पा चुके इस कालीचरण ने अचानक धर्म संसद में महात्मा गांधी को गाली क्या दे दी, बवाल हो गया। ऐसा होना स्वाभाविक था क्योंकि ऐसा हो, यही सोचकर ही बवाल खड़ा किया गया था।लेकिन किसान आंदोलन के समय से समझदार हो चुका आम पब्लिक ने समझदारी दिखाई और जिस लाभ के लिए ऐसा किया गया था, वह विफल हो गया।

कालीचरण की बातों पर ताली बजी यह हैरानी की बात है

अब तो कालीचरण को छत्तीसगढ़ पुलिस ने दर्ज प्राथमिकी के आधार पर गिरफ्तार भी कर लिया है। आगे क्या होगा, यह अदालत का मसला है। इसी बात पर फिल्म नास्तिक का यह गीत इतने दिनों बाद याद आ रहा है। इस गीत को लिखने के साथ साथ स्वर दिया था प्रसिद्ध कवि प्रदीप ने।

इसके संगीत निदेशक सी रामचंद्र थे। यह भी बताने वाली बात है कि हिंदी फिल्मों में विलेन के तौर पर ख्यातिप्राप्त अजीत ने इस फिल्म में नायक की भूमिका में अभिनय किया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान,
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान,
सूरज ना बदला, चाँद ना बदला, ना बदला रे आसमान,
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान,




आया समय बड़ा बेढंगा, आज आदमीं बना लफ़ंगा,
कहीं पे झगड़ा, कहीं पे दँगा,नाच रहा नर होकर नंगा,
छल और कपट के हाथोँ, अपना बेच रहा ईमान,
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान,

राम के भक्त,रहीम के बन्दे,रचते आज फरेब के फँदे,
कितने ये मक्क़ार ये अँधे, देख लिए इनके भी धँधे,
इन्हीं की काली करतूतों से हुआ ये मुल्क मशान,
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान,

जो हम आपस में ना झगड़ते, बने हुए क्यूँ खेल बिगड़ते,
काहे लाखो घर ये उजड़ते, क्यूँ ये बच्चे माँ से बिछड़ते,
फूट फूट कर क्यों रोते प्यारे बापू के प्राण,
कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान

देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान

आदमी कितना बदला है, इसे इस बात से भी समझ सकते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि सुधारने के लिए नरेंद्र मोदी को महात्मा गांधी और उनका सावरमती आश्रम याद आता है। लेकिन कालीचरण जैसे लोग जब ऐसी टिप्पणी कर देते हैं तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलते। यही चुनावी मजबूरी है।

किसान आंदोलन ने वह स्थिति बना दी है जिसमें पहली बार नरेंद्र मोदी भी मजबूर नजर आ रहे हैं। तय है कि उत्तरप्रदेश का किला बचाना जरूरी है। यह किला कमजोर हुआ तो देश भर में बहुत कुछ ऐसा होगा जो मोदी और अमित शाह की जोड़ी के लिए फायदे की बात नहीं होगी।

दूसरी तरफ पंजाब से अलग ही किस्म का सिग्नल आने लगा है। चंडीगढ़ नगर निगम में आम आदमी पार्टी की जीत अब दिल्ली मॉडल की कहानी को पूरे देश में फैला रही है। उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा का एक जैसा हाल है। तो भइया मान लीजिए की कालीचरण एक मोहरा है जिसे इसी काम की जिम्मेदारी दी गयी थी।

उसका नतीजा है कि अन्य जरूरी मुद्दों को छोड़कर लोग फिर से कालीचरण ने सही कहा या गलत कहा, इसी बहस में उलझ गये हैं। इससे आम जनता के जरूरी मुद्दे फिर से दरकिनार करने की प्रारंभिक कोशिश तो कामयाब हुई है। अब यह वोट में कितना तब्दील होगा, यह अभी से कह पाना कठिन है क्योंकि दूसरी तरफ मोर्चे पर नाराजगी लिये किसान डटे हुए हैं।



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