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कोरोना की दूसरी लहर में भारतीय तैयारियों की कमजोरी उजागर

  • वैकल्पिक रणनीति का अभाव साफ नजर आता है

  • अनुशासनहीनता हमारी सबसे बड़ी परेशानी बनी है

  • देश को चुनावी व्यस्तता नहीं कारगर परिणाम चाहिए

  • आपात स्थिति की वैकल्पिक योजना बनाने पर विचार नहीं किया

राष्ट्रीय खबर

रांचीः कोरोना की दूसरी लहर आ चुकी है। कोरोना संक्रमितों का जो आंकड़ा पंद्रह हजार से

नीचे आ चुका था वह अब एक सप्ताह में फिर से तीन गुणा से अधिक बढ़कर 53,476 नये

मामले दर्ज किये गये जबकि मंगलवार को यह संख्या 40,715 सोमवार को 46,951,

रविवार को 43,846, शनिवार 40,953 और शुक्रवार को 39,726 दर्ज की गई थी। इस अवधि

में कोरोना वायरस से मरने वाले लोगों की संख्या 275 दर्ज की गई है। मंगलवार को यह

संख्या 199, सोमवार को 212, रविवार को 197, शनिवार को 188, शुक्रवार को 154,

गुरुवार को 172, बुधवार को 188, मंगलवार को 131 दर्ज की गई थी। इस बीच देश में अब

तक पांच करोड़ आठ लाख 41 हजार से अधिक लोगों का टीकाकरण किया जा चुका है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से गुरुवार सुबह जारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 24

घंटों के दौरान कोरोना संक्रमण के 53,476 नये मामले सामने आये हैं जिससे संक्रमितों की

संख्या एक करोड़ 17 लाख 34 हजार से अधिक हो गयी है। इससे स्पष्ट है कि चिकित्सीय

हिदायतों का सही तरीके से पालन नहीं करने की वजह से जनता ने खुद अपने लिए यह

परेशानी आमंत्रित की है। अगर सारे लोग कठोर अनुशासन में होते तो शायद देश को फिर

से ऐसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। इसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था फिर

से अव्यवस्थित होगी। लेकिन यह स्पष्ट है कि अभी देश के जो आर्थिक हालात हैं, वह

दोबारा लॉकडाउन करने की इजाजत नहीं देते। अगर फिर से यह लागू हुआ तो तय मानिये

कि देश का अधिकांश कारोबार पूरी तरह चौपट हो जाएगा।

कोरोना की दूसरी लहर का रोजगार से सीधा रिश्ता

इन सारी बातों की गंभीरता को इसलिए भी समझना होगा क्योंकि एक अंतर्राष्ट्रीय

सर्वेक्षण में इस बात का पता चला है कि पूरी दुनिया में इस कोरोना महामारी की वजह से

अनेक लोग गरीबी की रेखा से नीचे चले गये ह । इनमें से 57 प्रतिशत लोग अकेले

भारतवर्ष से हैं। इससे भी स्थिति को गंभीरता को लोग और केंद्र सरकार दोनों जितनी

जल्दी समझ लें उतनी ही भलाई है। लॉकडाउन से पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की

भूमिका एक कुशल राजनेता की रही है, इसमें कोई शक नहीं है। आप भले ही उनके ताली

और थाली बजाने की आलोचना करें लेकिन इन उपायों से उन्होने पूरे देश को कोरोना के

खिलाफ एक सूत्र में बांधने का काम तो किया था। लोगों को ऐसे सामान्य अभियानों से

जोड़कर वे देश को जागरुक बनाने में सफल रहे थे। जिसके बाद ही लॉकडाउन की घोषणा

की गयी थी। ऐसे लॉकडाउन दरअसल लोगों को अधिक संक्रमण से बचाने के साथ साथ

चिकित्सा एवं प्रशासनिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए समय लेने की सोच के साथ

किया जाता है। इस अवधि में अस्पतालों के सुविधा विस्तार का काम हम कर पाये हैं।

लेकिन आज क्या हालात है, इस पर गौर कर लेना चाहिए। देश में जो नये कोरोना के

मरीज पाये जा रहे हैं, उनकी आयु 18 से 50 साल के बीच की है। यानी वे दूसरों के मुकाबले

सड़कों पर अधिक जा रहे है । इनमें महिलाएं भी शामिल हैं, जिन्हें पार्टी में सज धजकर

जाना पसंद है। मास्क लगाने से उनके चेहरे की सुंदरता नहीं दिखेगी और उन्हें दूसरों से

बेहतर दिखना है वाली सोच पूरे देश को दोबारा गड्डे में डालने वाली है। कई बार मैं सोचता

हूं कि शायद हजार वर्षों से अधिक समय की गुलामी ने शायद हमें मानसिक तौर पर भी

कमजोर कर दिया है।

क्या लगातार गुलामी की वजह से हम डंडा के बिना नहीं समझते

इसलिए हम खुद के अनुशासन मे नहीं रह पाते और डंडे के भय से अनुशासित हो जाते हैं।

इस बात को समझना होगा कि इस बार का कोरोना संक्रमण अधिक घातक है और उसकी

चपेट में वे लोग आ रहे हैं, जो अपने परिवार के लिए रोटी कमाने वाले हैं। जिन अस्पतालों

में पिछले जनवरी माह में कोविड आइसीयू बंद कर दिये गये थे, वहां फिर से ऐसे कोविड

आईसीयू बेड तैयार किये गये हैं। विशेषज्ञों ने साफ कर दिया है कि यूके का कोरोना

संक्रमण अधिक पेचिदा है और वह पंजाब में ज्यादा फैल रहा है। इस वायरस को बी.1.1.7

कहा गया है। यह आर्थिक और रणनीतिक कौशल का एक हिस्सा होता है कि प्रत्येक

योजना का एक अथवा एक से अधिक विकल्प तैयार किया जाए। इस बार पहली बार

महसूस हो रहा है कि केंद्र सरकार ने इसकी कोई वैकल्पिक योजना तैयार नहीं की थी।

फिलहाल केंद्र सरकार चुनाव में अधिक व्यस्त है। सरकार के स्तर पर यह अब तक की

सबसे बड़ी लापरवाही है, जहां राष्ट्र कल्याण की तुलना में राजनीति को अधिक

प्राथमिकता दी जा रही हो।

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