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समुद्र के तट आगे बढ़कर इंसानी बस्ती के करीब आ रहे हैं







  • पर्यावरण के बिगड़ने के संकेत अब स्पष्ट हो चले हैं
  • भारत और चीन के इलाकों पर भी मंडराता खतरा
  • अनेक बड़े शहरों की आबादी भी विस्थापित होगी
  • यह खतरा कब आयेगा, इसकी गणना संभव नहीं
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः समुद्र के तट पर बसे लोग इस बात को महसूस कर पा रहे हैं कि समुद्र धीरे धीरे उनके करीब आता जा रहा है।

अक्सर ही बारिश अथवा तूफान के मौसम में जिस तरीके से समुद्र की लहरें इंसानी बस्तियों तक पहुंच रही हैं, उससे यह खतरा और बढ़ गया है।

पहले के मुकाबले इन परिस्थितियों में नुकसान भी अधिक होने लगे हैं।

यह सारा कुछ पर्यावरण के बिगड़ते जाने का संकेत है।

इसके बारे में पहले ही यह वैज्ञानिक अनुमान है कि जैसे जैसे हालात बिगड़ेंगे, समुद्र में जल स्तर बढ़ता जाएगा।

इसकी वजह से समुद्र के तट पर बसे अनेक शहर और गांव इसके अंदर डूब जाएंगे।

इस सदी के अंत तक इस समुद्री जल स्तर के खतरनाक ढंग से सात मीटर तक ऊंचा उठ जाने तक की आशंका व्यक्त की गयी है।

भारत और चीन जैसे देशों में जो इंसानी बस्तियां समुद्र तट के करीब हैं, वहां इसका एहसास ज्यादा प्रमुखता से हो रहा है।

मौसम बिगड़ने की स्थिति में ऐसे लोगों को बार बार अपना घर छोड़कर सुरक्षित क्षेत्र में भागना पड़ता है।

दूसरी तरफ समुद्री तूफान और लहर से घरों को होने वाले नुकसान का आयतन भी बढ़ गया है।

लेकिन असली खतरा अभी आना शेष है, ऐसा वैज्ञानिक मान रहे हैं।

वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक किसी मौसमी तूफान अथवा बवंडर नहीं सामान्य परिस्थिति में भी समुद्र का जल काफी अधिक हो जाने के बाद यह क्षेत्र सामान्य तरीके से ही समुद्र के अंदर समा जाएंगे।

समुद्र के तट के फैलने से कई शहरों में हर रोज खारा पानी

अमेरिका के कई शहर अभी से ही इसकी चपेट में आ चुके हैं।

इन शहरों में अक्सर ही समुद्र में ज्वार आने की स्थिति में समुद्री जीव जंतु घुस रहे हैं।

इसकी वजह से इन शहरों से आबादी भी तेजी से विस्थापित होती जा रही है।

इसमें बताया गया है कि अकेले भारतवर्ष में इसकी वजह से करीब पचास लाख लोगों को अपने घर से अलग जाना पड़ेगा क्योंकि उनके घर और खेत का इलाका समुद्र में डूब जाएगा।

पृथ्वी पर यह खतरा कब और कैसे आयेगा, इसकी गणना वर्तमान वैज्ञानिक

पद्धति में संभव नहीं होने के बाद भी वैज्ञानिकों को बिगड़ते हालात के आंकड़े

लगातार मिल रहे हैं। यह मौसम के बदलने का ही परिणाम है।

खास तौर पर उत्तरी ध्रुव जैसे इलाकों में जिस तेजी से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वह सबसे अधिक खतरे का विषय है।

वहां के ग्लेशियरों की स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि अनेक ग्लेशियर अंदर से पूरी तरह खोखले हो चुके हैं।

इस वजह से वे कभी भी अचानक समुद्र में समा सकते हैं।

विशाल बर्फखंड के अचानक समुद्र में आने से बर्फ पिघलने की गति बढ़ जाएगी।

इससे सूनामी भी पैदा होगी और यह जल दुनिया के सभी हिस्सों में क्रमवार तरीके से फैलता ही चला जाएगा।

उस स्थिति में जो इलाके समुद्री सतह के ज्यादा करीब होंगे, उनके डूब जाने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाएगी।

वैज्ञानिकों को भय है कि इस वजह से पूरी दुनिया में नये किस्म की आर्थिक समस्या भी उत्पन्न होगी।

सामूहिक विस्थापन से खड़ी होगी नई परेशानी

समुद्री तट से विस्थापित होने वाले लोग जहां जाएंगे वहां संतुलन बिगड़ेगा।

वैसे ही इस पूरी दुनिया में अभी रोटी और रोजगार को लेकर संघर्ष की स्थिति है।

ऐसे में किसी खास इलाके में जब अचानक आबादी बढ़ेगी तो यह सामाजिक संघर्ष और तेज होकर नये किस्म के विवाद को जन्म देगा।

इसकी वजह से देशों की भौगोलिक सीमाओँ के टूटने की संभावना से भी अब इंकार नहीं किया जा सकता है।

समुद्र पर यह खतरनाक असर कब और कैसे प्रारंभ होगा, इसकी गणना की पद्धति पूरी तरह विकसित नहीं हो पायी है।

लेकिन बदलते आंकड़ों की वजह से शोधकर्ता यह मान रहे है कि स्थितियां तेजी से बदलती चली जा रही है।

समुद्र के करीब बसी इंसानी बस्ती को ही सबसे पहले इसकी चपेट में आना है।

नजदीक बसी इंसानी बस्तियों को होगा पहला खतरा

गणना के मुताबिक सिर्फ गांव और कस्बे की इसकी चपेट में नहीं आयेंगे।

समुद्र का जलस्तर जब बढ़ेगा तो यह अनेक महानगरों तक को अपनी चपेट में ले लेगा।

दूसरी तरफ समुद्र के आकार के विस्तार की वजह से पूरी दुनिया में खेती की जमीन भी अचानक से कम हो जाएगी, जो एक नये किस्म के खाद्यान्न संकट को जन्म देगा।

नासा के शटल रडाल टोपोग्राफी मिशन के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद

वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि खतरा अनुमान से बढ़ा भी हो सकता है

क्योंकि अध्ययन में उन बहुमंजिली इमारतों में रहने वाले लाखों लोगों

की गणना अलग से नहीं की गयी है।

लेकिन समुद्र के जल स्तर के बढ़ने से यह सारी बहुमंजिली इमारते खारे पानी के प्रभाव में तेजी से नष्ट हो जाएंगी।

साथ ही जमीन पर समुद्र का जल होने की वजह से इन बहुमंजिली इमारतों में रहने वालों को भी वहां से हटना ही पड़ेगा।

यह निष्कर्ष स्कॉट कल्प और बेंजामिन स्ट्रास नामक वैज्ञानिकों का है।

इस बारे में नेचर कम्युनिकेशन पत्रिका में जानकारी प्रकाशित की गयी है।



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