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एक मीटर तक ऊंचा उठ जायेगा समुद्री जल का स्तर इस सदी के अंत तक

  • अधिक तेजी से बदल रहा है समुद्रों का आकार

  • अनेक प्रसिद्ध इलाके भी पानी में डूब जाएंगे

  • भारत के तीनों महानगर भी चपेट में आयेंगे

  • ग्लेशियर अचानक गिरे और बड़ी तबाही होगी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः एक मीटर तक समुद्री जलस्तर के ऊपर उठने का मतलब समझते हैं। इसका सीधा

अर्थ है कि दुनिया के लाखों वर्ग किलोमीटर इलाके अचानक से समुद्र के अंदर चले जाएंगे।


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देश की बात करें तो देश के तीनों बड़े महानगरों, चैन्नई, मुंबई और कोलकाता का ढेर सारा

इलाका डूब जाएगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जिस गति से समुद्र का हाल बदल रहा

है, उससे इस सदी के अंत तक लोग इसे घटित होते हुए देख पायेंगे। वैसे चेतावनी इस बात

की भी है कि इस बीच अगर ग्लेशियरों का विशाल खंडों का समुद्र में लगातार गिरना प्रारंभ

हो गया तो यह जल स्तर छह मीटर तक ऊंचा उठ सकता है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक

इसे पृथ्वी के जीवन और खास तौर पर जमीनी जीवन के लिए बहुत बड़ा खतरा मान रहे

हैं। उनका आकलन है कि जिस गति से इसके बदलने की उम्मीद की गयी है, यह

घटनाक्रम उससे अधिक तेजी से घटित हो रहा है। इसी वजह से यह नया निष्कर्ष निकाला

गया है कि समुद्री जल स्तर पर एक मीटर तक ऊपर उठने का यह क्रम इसी सदी के अंत

तक देखने को मिल सकता है। इस एक मीटर के ऊंचे जल स्तर का असर पूरी पृथ्वी पर

पड़ेगा। वैज्ञानिक दल ने आम भाषा में इसे समझाने की कोशिश भी की है। उनके मुताबिक

जब समुद्र का जल स्तर पर ऊपर उठेगा तो समुद्र में जाकर मिलने वाले सारी नदियों पर

भी इसका प्रभाव पड़ेगा और उनका जलस्तर पर ऊपर उठने की वजह से समंदर से काफी

दूर स्थित वैसे इलाके में भी डूबने लगेंगे, जो इस एक मीटर की ऊंचाई के दायरे में आयेंगे।

साथ ही नदियों में उल्टी दिशा में भी बाढ़ जैसी नौबत आयेगी।

एक मीटर के समुद्री जलस्तर का प्रभाव दूर तक होगा

चूंकि जमीन सतह उबड़ खाबड़ है, इसलिए अभी से इस बात का सही आकलन नहीं किया

जा सका है कि समुद्र के जल स्तर के ऊपर उठने की स्थिति में दूर दराज के कौन से इलाके

इसकी चपेट में आ जाएंगे। वैसे यह तय है कि समुद्र के किनारे बसे सारे महानगर निश्चित

तौर पर इसकी चपेट में आयेंगे और इन महानगरों का ढेर सारा इलाका अंततः समुद्र के

अंदर ही चला जाएगा। दुनिया के कई प्रमुख पर्यटन स्थल बने प्रसिद्ध द्वीपों पर भी इसका

एक जैसा प्रभाव पड़ना भी तय है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर

दुनिया में कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका तो यह स्थिति और भी

खतरनाक और विनाशकारी साबित होने जा रही है। वैसे ही उत्तरी ध्रुव सहित कई इलाकों

में इसी प्रदूषण की वजह से ग्लेशियरों के पिघलने की गति बहुत तेज हो चुकी है। ऐसे में


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हजारों किलोमीटर के दायरे में फैले ग्लेशियर अगर अचानक समुद्र में फिसलकर आ गिरे

तो और तबाही आ सकती है। यूरोपियन जिओसाइंस यूनियन की पत्रिका में इस बारे में

एक विस्तारित लेख प्रकाशित किया गया है। इसमें सारे विषयों को एकजुट कर खतरे को

रेखांकित करने का काम किया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि इससे समुद्री

जीवन पर भी बहुत कुछ तब्दीली आ सकती है। इस शोध प्रबंध के मुख्य लेखक एसलाक

ग्रीनस्टेड हैं, जो यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगेन के नील बोर इंस्टिट्यूट के एसोसियेट

प्रोफेसर हैं। उन्होंने कहा वह भविष्य के बारे में कोई आकलन नहीं करना चाहते हैं लेकिन

यह स्थिति निश्चित तौर पर हमें सतर्क होने का संकेत देती है।

कार्बन डॉईऑक्साइड उत्सर्जन रोके बिना कोई फायदा नहीं

इस शोध में यह बताया गया है कि हर साल जो कार्बन डॉईऑक्साइड का उत्सर्जन हो रहा

है, उसे तेजी से कम करने की आवश्यकता है। इसी रास्ते पृथ्वी के तापमान को कमसे कम

एक डिग्री फारेनहाइट कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि इसमें सबसे

बड़ी अड़चन खुद इंसान हैं, जो अपने आचरणों से पूरी पृथ्वी को तबाह करने पर तुली हुई

हैं। दूसरी तरफ इस पूरी स्थिति पर अंटार्कटिका में जो कुछ हो रहा है, अगर उसमें तेजी

आयी तो सब कुछ मटियामेट हो सकता है। अंटार्कटिका के बारे में यह उल्लेख इसलिए

किया गया है क्योंकि वहां के कई ग्लेशियरों की स्थिति तेजी से बदल रही है। वहां के पाइन

द्वीप और थावेइट्स ग्लेशियर के हिस्से अगर टूटकर गिरने लगे तो समुद्री जलस्तर का

और तेजी से ऊपर उठने से इंकार नहीं किया जा सकता है। दूसरी तरफ सिंगापुर के

नैनीयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के प्रोफसर बेंजामिन होर्टन ने कहा कि इस शोध से

भविष्य के खतरों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी


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