वैज्ञानिकों ने  फेफड़े की कार्यपद्धति के आधार पर ईंधन बनाने की विधि खोजी

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  • पानी से बनेगा परिष्कृत ईंधन और गैस

  • सांस लेने और छोड़ने की पद्धति पर काम

  • परिष्कृत ईंधन से पर्यावरण को लाभ

  • नैनो पार्टिकल्स की मदद से होगा काम

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः वैज्ञानिकों ने इंसानों और अन्य जानवरों के फेफड़ों की क्रिया का अध्ययन कर एक मशीन तैयार करने का काम प्रारंभ किया है,

जो पानी पीने के बाद ईंधन और हाइड्रोजन गैस तैयार कर रहे।

वैसे भी पानी के अंदर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन होते हैं।

उनके विखंडन की प्रक्रिया आसान नहीं होती।

इसलिए इस विधि से हाईड्रोजन गैस तैयार करना अब तक किफायती साबित नहीं हो पाया है।

वैज्ञानिकों ने जो मशीन की डिजाइन तैयार की है, वह पानी अंदर लेने के बाद इसे ईंधन में तब्दील कर देता है।

इसके अंदर विद्युतीय उत्प्रेरक पदार्थ लगाये गये हैं।

इसके काम करने का तरीका किसी स्तनधारी जीव के फेफड़े के जैसा है।

आम तौर पर ऐसे प्राणी हवा से सांस में सिर्फ हवा ही लेते हैं।

फेफड़े के अंदर की वैज्ञानिक संरचना इस हवा को अंदर रक्त कोशिकाओं को अत्यंत परिष्कृत रुप में पहुंचा देती है।

फेफड़े के अंदर एक खास झिल्ली होती है, जो हवा को बुलबला बनकर खून तक पहुंचने से रोक देती है।

फिर वहां से शरीर को कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है,

वह इसी संरचना से होते हुए बाहर निकल जाती है। फेफड़े का काम कुछ इसी तरीके से चलता रहता है।

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसी फेफड़े की संरचना का अध्ययन कर मशीन बनायी है।

इसके काम करने का तरीका बिल्कुल फेफड़े के जैसा ही है।

इसमें सिर्फ पानी डाला जाता है, जो अंदर मौजूद संरचना में अपने आप ही परिष्कृत ईंधन और शुद्ध हाइड्रोजन गैस में तब्दील हो जाता है ।

स्तनधारी जीव के फेफड़े के अंदर एक अत्यंत पतली झिल्ली, जिसे अलभियोली कहा जाता है, इसी के जैसा मशीन के अंदर भी झिल्ली बनायी गयी है।

वैज्ञानिकों का दल दो समूह में बंटकर कर रहा है काम

यही झिल्ली पानी से हाईड्रोजन और ईंधन को अलग करती है।

मशीन के दूसरे छोर से उन्हें निकाला जाता है।

इस प्रक्रिया को सही तरीके से करने के लिए अंदर इलेक्ट्रोड लगाये गये हैं, जो पानी के अणुओं का विखंडन करते हैं।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक जुन ली कहते हैं कि इस विधि में सिर्फ उत्प्रेरक और इलेक्ट्रोलाइट प्रक्रिया की चुनौती को पार करना शेष है।

जब यह काम पूरा हो जाएगा तो दुनिया को नये किस्म का परिष्कृत ईंधन मिलने का रास्ता खुल जाएगा।

इस परिष्कृत ईंधन के इस्तेमाल से पर्यावरण को होने वाले नुकसान भी बंद हो जाएंगे।

इस काम के लिए वैज्ञानिक दो अलग अलग दलों में बंटकर काम कर रहे हैं।

एक दल पानी को अंदर ले जाकर विखंडित करने की जिम्मेदारी संभाल रहा है तो दूसरा दल इसके ईंधन और हाइड्रोजन को एक ही रास्ते से अलग अलग एकत्रित करने पर काम कर रहा है।

फेफड़े की तरह काम करने वाले इस संयंत्र में पानी के ऑक्सीकरण की प्रक्रिया अपनायी जा रही है।

इससे पानी के अणु विखंडित होकर हाइड्रोजन देते हैं और इसी प्रक्रिया में नये किस्म का परिष्कृत ईंधन भी पैदा होता है।

इस डिजाइन का प्रारंभिक स्वरुप उत्साहवर्धक रहा है।

इसी वजह से इस सोच पर मशीन को आगे विकसित किया जा रहा है।

इस काम के लिए वैज्ञानिक फिर से नैनो पार्टिकल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं।

ताकि गैस और ईंधन प्राप्त करने की प्रक्रिया और तेज गति से हासिल किया जा सके।

वैज्ञानिक यह मानकर चल रहे हैं कि कुछ और संशोधनों के बाद

इस मशीन के परिष्कृत स्वरुप का इस्तेमाल व्यापारिक तौर पर किया जा सकेगा।

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