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बच्चों की देखभाल पर भी है उपकरण वैज्ञानिकों की नजर

  • स्मार्ट डायपर खुद ही बदलने का संकेत देगा

  • गीलेपन की वजह से बीमार पड़ते हैं बच्चे

  • अभिभावकों को भी समय पर जानकारी होगी

  • अधिक आयु के लोगों को भी लाभ देने की कोशिश

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बच्चों की देखभाल कोई आसान काम नहीं है। अगर बच्चे

छोटे हों तो यह काम और भी कठिन और जिम्मेदारियों वाला हो जाता

है। इस जिम्मेदारी पर वैज्ञानिकों की नजर गयी थी। उसके आधार पर

ही छोटी उम्र के बच्चों के लिए स्मार्ट किस्म का डायपर तैयार किया

गया है। आम तौर पर छोटे बच्चों की मानसिक दशा और सेहत

बिगड़ने का एक कारण डायपर भी होता है। कई बार डायपर गीला होने

की वजह से बच्चे न सिर्फ चिढ़चिढ़े हो जाते हैं बल्कि कई बार इसी

वजह से उनको ठंड भी लग जाती है। कई बार बच्चों के अभिभावक भी

बच्चों के रोने और चिढ़े होने की वजह से परेशान हो जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने परेशानी से मुक्ति का रास्ता निकाला

अब वैज्ञानिकों ने इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए एक स्मार्ट

किस्म का डायपर बनाया है। इसके इस्तेमाल से बच्चे के अभिभावकों

को खुद ही यह पता चल जाएगा कि बच्चे का डायपर बदलना कब है।

स्मार्ट डायपर उनके मोबाइल पर संदेश भेजकर डायपर बदलने का

संकेत देता। इसके लिए खास तौर पर कुछ हल्के ऐसे उपकरण इसमें

लगाये गये हैं, जो इसकी निरंतर निगरानी करते हैं।

स्मार्ट डायपर में आम डायपर के साथ कुछ ऐसे उपकरण जोड़े गये हैं

जो इसके गीलेपन का पता लगा लेते हैं। इसके लिए यंत्र में काफी हल्के

किस्म के सेंसर लगाये गये हैं। साथ ही इसमें सेंसर के साथ एक एंटेना

भी जोड़ा गया है। सेंसर अपने आप ही कपड़े के गीला होने का पता लगा

सकता है। इसमे गीलापन होने का संकेत एंटेना के माध्यम से बच्चों

के अभिभावकों तक खुद ही प्रेषित हो जाता है। इससे बार बार डायपर

को देखने की जरूरत नहीं पड़ती।

बच्चों की देखभाल की जरूरत है का संकेत देता है

दूसरी तरफ ध्यान नहीं रहने की वजह से बच्चे अधिक देर तक गीली

अवस्था में भी नहीं रहते हैं। इसमें यह विशेषता भी जोड़ी गयी है कि

इस एंटेना के माध्यम से किसी स्मार्टफोन के अलावा कंप्यूटर तक में

संदेश प्रेषित किये जा सकते हैं। विकसित देशों में जहां माता-पिता

दोनों ही नौकरीपेशा होते हैं, वहां इस किस्म की व्यवस्था का बेहतर

लाभ मिलना तय है क्योंकि इससे घर लौटने के बाद बच्चे की परवरिश

में भी उन्हें सुविधा होती है।

इस स्मार्ट डायपर में लगे सेंसर के बारे में बताया गया है कि इसमें एक

आरएफआइडी टैग लगाया गया है। यह सेंसर बच्चे के डायपर का

गीलापन सोखने वाले हिस्से के नीचे लगा होता है। इससे यह यंत्र बच्चे

के शरीर के सीधे संपर्क में कभी नहीं होती। आम तौर पर आज के

डायपर में ऐसे जेल लगे होते हैं, जो नमी को सोख लेते हैं। इसी जेल की

पर्त के नीचे यह सेंसर अपना काम करता रहता है। इसके साथ लगा

एंटेना भी बच्चे के शरीर के सीधे संपर्क में नहीं होता। वह अपने पास के

एक रेडियो सिग्नल जेनरेटर तक यह संकेत पहुंचा देता है। वहां से यह

संदेश बच्चे के अभिभावकों तक विभिन्न माध्यमों से भेजने की

व्यवस्था की गयी है।

स्मार्ट डायपर की डिजाइन में भी लगातार सुधार

मजे की बात तो यह है कि इसी क्रम में स्मार्ट डायपर की डिजाइन में

अब सुधार भी किया गया है। इसके तहत डायपर में नमी सोखने के

लिए लगे जेल का इस्तेमाल ही एंटेना के तौर पर किया जाता है। इससे

उसे तैयार करने की लागत भी कम हो गयी है। सामान्य अनुमान के

मुताबिक एक ऐसा डायपर बनाने में दो सेंट से भी कम की लागत

आती है। इसी वजह से यह न सिर्फ किफायती है बल्कि अभिभावकों

को राहत पहुंचाने वाला भी साबित होने जा रहा है।

इसे विकसित करने के बाद अब वैज्ञानिक इसकी आगे की कड़ी पर भी

काम कर रहे हैं। उसके तहत बच्चों की सेहत पर निरंतर निगरानी

रखने का काम भी इन्हीं स्मार्ट डायपरों पर छोड़ने की तैयारी हो रही है।

उसके लिए भी अलग से सेंसर विकसित किये जा रहे हैं। समझा जाता

है कि यह अनुसंधान पूरा होने के बाद एक साथ अनेक बच्चों की

निगरानी इन्हीं स्मार्ट डायपरों की मदद से हो सकेगी। ऐसा काम कम

आयु के बच्चों की देखभाल करने वाले अस्पतालों में बहुत ज्यादा

कारगर होगा।

अनुसंधान से जुड़े अधिकांश वैज्ञानिक भारतवंशी

इस किस्म के शोध से जुड़ी एमआइटी के ऑटोआइडी लैब की पंखुरी

सेन ने कहा कि अब इसके तैयार हो जाने के बाद अधिक उम्र के लोगों

के लिए बने डायपरों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

अधिक आयु के लोगों को भी यह सुविधा मिलने पर नमी की वजह से

उनकी बदल पर होने वाले संक्रमण को भी रोका जा सकेगा। कई बार

इसी नमी और समय पर डायपर नहीं बदल पाने की वजह से अधिक

आयु के लोगों को खास तौर पर यूरिनरी ट्रेक इंफेक्शन हो जाता है।

अच्छी बात यह भी है कि इस पूरी शोध प्रक्रिया से जुड़े अधिकांश लोग

भारतवंशी ही हैं। पंखुरी सेन के अलावा साई नीतिन कांत रेड्डी, राहुल

भट्टाचार्य और संजय शर्मा जैसे शोधकर्ता इसे तैयार करने में जुड़े हैं

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