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प्राचीन उल्कापिंड के अवशेष के इलाके की पहली बार पहचान की वैज्ञानिकों ने







  • आठ लाख वर्ष पहले पृथ्वी में धंस गया था विशाल उल्कापिंड

  • शीशानूमा पत्थरों के पाये जाने से इसका सुराग मिला

  • पूरी दुनिया में आयी थी भीषण तबाही और बदलाव

  • लाओस के इलाके में दबा पड़ा है यह विशाल खंड

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः प्राचीन उल्कापिंड इस पृथ्वी पर बदलाव के बहुत बड़े

कारण रहे हैं। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति से लेकर डायनासोर युग की

समाप्ति तथा इंसानों के क्रमिक विकास के पीछे भी इन्हीं उल्कापिंडों

का योगदान रहा है। देखने में तो यह माना जा सकता है कि जब बड़े

उल्कापिंड पृथ्वी पर आ गिरते हैं तो बहुत बड़ी तबाही आती है। लेकिन

इस तबाही और उथल पुथल के शांत हो जाने के बाद पृथ्वी चाल

बदलती है। इसी कड़ी में पृथ्वी के क्रमिक विकास में उल्कापिंडों का

बड़ा योगदान रहा है। अब वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि पृथ्वी पर एक

विशाल उल्कापिंड काफी पहले आकर गिरा था। आकार में काफी बड़ा

होने की वजह से यह काफी अंदर तक धंस गया था। घटना करीब आठ

लाख वर्ष पहले की है। इसलिए यह उल्कापिंड जहां धंसा था, उसके

ऊपर जीवन के नये चिह्न बनते चले गये। अब वैज्ञानिकों ने उस

इलाके की पहचान कर ली है, जहां यह उल्कापिंड आकर धंस गया था।

वैज्ञानिक शोध यह कहता है कि  ज्वालामुखी की लावा के नीचे इस

उल्कापिंड के टुकड़े करीब 910 घन किलोमीटर के इलाक में फैले हुए

हैं। यह दक्षिण पूर्व एशिया में लाओस के क्षेत्र में है। वहां से बोलावियन

प्लेटो के नीचे उल्कापिंड का यह विशाल टुकड़ा है।

 प्राचीन उल्कापिंड के गिरने की जानकारी पत्रिका में 

इस बार में नेशनल एकाडेमी ऑफ साइंस की पत्रिका में विस्तार से

जानकारी दी गयी है। जिस विशाल भूभाग पर यह उल्कापिंड होने का

अनुमान लगाया गया है, उसी से पता चल जाता है कि आकार में यह

उल्कापिंड कितना विशाल रहा होगा। इतने बड़े आकार का उल्कापिंड

जब पूरे वेग से पृथ्वी से टकाराया होगा तो निश्चित तौर पर प्रलय

जैसी स्थिति उत्पन्न हुई होगी। इतने लाख वर्ष बाद उसके जमीन के

अंदर धंसने के बाद ऊपर की पर्त पर बहुत कुछ बदलाव हुआ है। अब

उसके आकार प्रकार का पता आधुनिक उपकरणों से चल रहा है।

अनुमान के मुताबिक यह उल्कापिंड करीब 2 किलोमीटर चौड़ा है।

इसकी वजह से पूरे एशिया, ऑस्टेलिया और अंटार्कटिका के इलाके पर

असर पड़ा होगा, ऐसा वैज्ञानिक मान रहे हैं। साथ ही यह भी माना जा

रहा है कि आसमान से गिरते वक्त इसके छोटे बड़े टुकड़े दुनिया के

अन्य हिस्सों में भी फैल गये होंगे। जो कहीं न कहीं अब भी दबे हुए हैं।

दरअसल इस विशाल उल्कापिंड के बारे में पहला सुराग उस स्थान से

मिला। वहां पर शीशा के जैसा टेकटाइट्स पाये गये थे। आसमान से

उल्कापिंड के गिरते वक्त शीशा का यह स्वरुप वा युमंडल के घर्षण के

दौरान रासायनिक प्रतिक्रिया से पैदा होता है। इसके टुकड़े पाये जाने के

बाद वहां ऐसे प्राचीन टुकड़े क्यों है, इसी बात पर शोध प्रारंभ किया गया

था।

आसमान में पैदा होने वाले शीशा के टुकड़ों से हुई पहचान

वैज्ञानिकों ने जब इसकी गहन छानबीन की तो जमीन की गहराई में

दबे हुए इस उल्कापिंड के होने की पुष्टि हो गयी। इस शोध से जुड़े

सिंगापुर के अर्थ ऑबजरवेटरी के मुख्य शोधकर्ता प्रोफसर केरी साय ने

कहा कि इस उल्कापिंड का आकार और गति की वजह से यह आस-

पास के पत्थरों को भी पिघला गया था। इसी वजह से आसमान से गिरे

शीशा के टुकड़ों के अलावा आस-पास के पत्थरों में भी यही गुण पैदा हो

गया था। इन्हीं शीशानूमा पत्थरों की जांच से उल्कापिंड के गिरने के

समय का अनुमान लगाया गया है। लाओस के पास इसके मुख्य हिस्से

के होने के अलावा आस पास के तमाम देशों में इसके बड़े बड़े खंड भी

मौजूद होने की पुष्टि हो चुकी है। अनुमान है कि पृथ्वी के 90 प्रतिशत

इलाकों में इसके टुकड़े गिरे हैं। ऑस्ट्रेलिया में 13 किलोमीटर चौड़े उस

खाई का पता चला ह जो 17 किलोमीटर लंबा है। लेकिन सभी

वैज्ञानिक तथ्यों को एक एक कर जोड़ते हुए उनकी वैज्ञानिक पुष्टि का

काम अभी जारी है। कई इलाकों में जमीन के अंदर खुदाई कर

उल्कापिंड के नमूनों को एकत्रित करने का काम भी चल रहा है। इस

क्रम में ज्वालामुखी के विस्फोट के प्रमाण भी मिल रहे हैं जो शायद

इसी प्राचीन उल्कापिंड के गिरने का भीषण परिणामों में से एक था।



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