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सौर जगत के सबसे पुराने खगोलीय पिंड की पहचान की वैज्ञानिकों ने

  • करीब दस बिलियन वर्ष पुराना यह पिंड कई राज खोलेगा

  • सूर्य के बनने के पहले से मौजूद है यह सौर इलाका भी

  • हमारे दिन के हिसाब से रोज दो चक्कर लगाता है

  • टीओआई-561बी नाम दिया गया है इस ग्रह का

राष्ट्रीय खबर

रांचीः सौर जगत के सबसे पुराने मृत ग्रह से हो सकता है कि इस सौर जगत की सृष्टि के

कुछ और राज खुल सकें। वैज्ञानिकों ने अपने खगोलीय शोध के तहत इसकी पहचान की

है। प्रारंभिक अनुमान है कि यह पत्थर हो चुका विशाल हिस्सा करीब दस बिलियन वर्ष

पुराना है। इस लिहाज से यह भी कहा जा रहा है कि अब तक के अनुसंधान में यह अब तक

का सबसे पुराना है, जिसकी पहचान की जा सकती है। वर्तमान में यह एक तारा का चक्कर

लगा रहा है। जिस पथरीले ग्रह की पहचान हुई है उसे टीओआई-561बी के नाम से जाना

जाता है। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यह आकार में पृथ्वी से काफी बड़ा है। वह जिस तारा के

चारों तरफ चक्कर काट रहा है, वह भी आकार में हमारे सूर्य से करीब दो गुणा ज्यादा

पुराना है। लिहाजा इससे सौर जगत कैसे बना, इस सबसे बड़े सवाल के संबंध में नये उत्तर

भी मिलने की उम्मीद है। वैज्ञानिकों के लिए यह सवाल अब तक महत्वपूर्ण इसलिए बना

हुआ है क्योंकि हमेशा ही सौर जगत की सृष्टि के बारे में नई नई जानकारियां सामने आती

रहती हैं। इस खगोलीय पिंड का आकार पृथ्वी से डेढ़ गुणा अधिक होने के अलावा भी इसके

बारे में कुछ और रोचक जानकारियां मिली हैं। यह देखा गया है कि यह बहुत तेज गति से

अपनी धुरी पर घूम रहा है। वैज्ञानिक निष्कर्ष के मुताबिक यह पृथ्वी के एक दिन के

बराबर समय में दो बार चक्कर लगा लेते हैं। खगोलीय दूरबीन से देखने पर यह अपने मूल

तारा से काफी करीब भी होने का अनुमान लगाया गया है। शायद उसके तेजी से घूमने की

एक मुख्य वजह यह भी हो सकती है।

सौर जगत का यह इलाका अत्यंत प्राचीन भी है

हो सकता है कि यह इलाका भी पूरे ब्रह्मांड की सृष्टि के समय से ही मौजूद हो। लेकिन

अभी उसकी जांच बाकी है। टीओआई-561बी नाम के इस ग्रह को वैज्ञानिक सुपर अर्थ की

भी संज्ञा दे रहे हैं। लेकिन वहां का तापमान पृथ्व के जैसा तो कतई नहीं है। ऐसा लगता है

कि वहां का तापमान 17 सौ डिग्री सेल्सियस है। लिहाजा यह तय है कि वह इलाका पृथ्वी

के जैसा जीवन के बसने अथवा रहने के लायक तो कतई नहीं है। इस पर नजर जाने के

बाद अब तक तो वैज्ञानिक आंकड़े सामने आये हैं, वे भी काफी चौंकाने वाले साबित हो रहे

हैं। आकार में पृथ्वी से डेढ़ गुणा अधिक बड़ा होने के बाद भी इसका घनत्व बहुत कम है

और समझा जा रहा है कि वह पृथ्वी के बराबर ही है। इसकी एक वजह इन ग्रहों पर भारी

खनिजों का बहुत कम होना है। वैज्ञानिक आकलन है कि काफी पुराने ग्रहों और तारों में

मौजूद भारी किस्म के खनिज लगातार विकिरण और अन्य कारणों से एक खास समय के

बाद विस्फोट कर सौर मंडल में विलीन हो जाते हैं। वहां हुए विस्फोट की वजह से सौर

मंडल में फैले भारी खनिजों के कण अन्य ग्रहों तक पहुंच जाते हैं। नये खनिज पहुंचने की

वजह से इन ग्रहों की संरचना में भी बदलाव होने लगता है। इसी वजह से पुराने तारों और

ग्रहों का घनत्व धीरे धीरे कम होता चला जाता है। नासा के टेस मिशन से इस ग्रह का पता

चलने के बाद हवाई में स्थित वेधशाला से इसकी पुष्टि की गयी है। पहली बार इतने पुराने

ग्रह का पता चलने के बाद निरंतर निगरानी से उसके बारे में नये नये तथ्य जुटाने का काम

चल रहा है।

यह जिस समय का है उस वक्त सूर्य भी नहीं बना था

इस शोध से जुड़े हवाई के शोधकर्ता लॉरेन वेइस ने कहा है कि अब तक के अनुमान के

मुताबिक पूरे ब्रह्मांड की सृष्टि करीब 14 बिलियन वर्ष पूर्व हुई थी। अंतरिक्ष के मिल्की वे

की रचना भी करीब 12 बिलियन वर्ष पूर्व होने का अनुमान है। इसलिए यह माना जा

सकता है कि यह इलाका भी उस कालखंड का है, जब सौर जगत में तारों और ग्रहों का

निर्माण हो रहा है। यह सृष्टि के हिसाब से काफी पुराना होने की वजह से ही यह अपने

अंदर उस काल के साक्ष्य रख सकता है, जो सौर मंडल की रचना के बारे में नई रोशनी डाल

सकते हैं। इनके मुकाबले हमारा सूर्य बहुत कम उम्र का है क्योंकि उससे बनने की समय

सीमा सिर्फ 4.5 बिलियन वर्ष आंकी गयी है। उधर जिस इलाके में यह नया ग्रह पाया गया

है वह करीब दस बिलियन वर्ष के पूर्व ही बन चुका था।

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