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कोविड वैक्सिन का पहला प्रयोग सफलता का संकेत दे रहे हैं वैज्ञानिक

  • 108 लोगों पर वुहान में का गया था प्रयोग
  •  वायरस के प्रोटिन कवच को तोड़ गया वैक्सिन
  •  कवच टूटने से वायरस आगे फैल ही नहीं पाया
  •  अब दूसरे दौर के क्लीनिकल ट्रायल का एलान
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कोविड वैक्सिन का पहला प्रयोग सफल होने की प्रारंभिक जानकारी मिली है।

कोरोना वायरस के प्रसार के बीच ही इस पर वुहान में शोध प्रारंभ किया गया था। वैज्ञानिक

तथ्यों के मुताबिक चीन के वैज्ञानिकों ने 18 वर्ष से 60 वर्ष तक के मरीजो पर यह प्रयोग

किया था। इसके तहत वे वायरस के प्रसार को आगे रोकने में सफल रहे हैं। इस परीक्षण

वैक्सिन का पहले ही जानवरों पर प्रयोग सफल होने के बाद इंसानों पर इसका क्लीनिकल

ट्रायल प्रारंभ किया गया था। चीन की तरफ से इसकी जानकारी पहले ही दे दी गयी थी।

कोविड 19 के कवच के तौर पर हर दवा को रोकने वाले स्पाइक प्रोटिन ग्लाईकोप्रोटिन के

आवरण को इससे तोड़ने में मदद मिली। इस दवा के एक डोज से ही कोरोना का यह कवच

टूट गया। इससे वायरस आगे कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाया। इस वैक्सिन को तैयार

करने में एडेनोवायरस का इस्तेमाल किया गया था। इस वायरस की शक्ति को कमजोर

किया गया था। लेकिन जिस काम के लिए यह काम किया गया था, वह अब क्लीनिकल

ट्रायल में सफल साबित हो रहा है।

कोविड वैक्सिन के शोध के सफल होने के बाद

                         

 

वैज्ञानिकों ने इसके बारे में जो जानकारी दी है उसके मुताबिक इस वैक्सिन ने पांच अलग

अलग आयामों में काम करते हुए कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटिन आवरण को तोड़ने में

महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। 108 लोगों को तीन समूहों में बांटा गया था। हर समूह में

36 लोग थे। अलग अलग आयु वर्ग के लोगों को अलग अलग डोज दिये गये। शोध सफल

होने के दावे से संबंधित लेख प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिका लांसेट में प्रकाशित किया गया है।

इस बारे में बताया गया है कि इसके इस्तेमाल में जो प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं मिली हैं, उनमें

से 58 लोगों को इंजेक्शन का दर्द, 50 लोगों को बुखार, 47 लोगों को नींद जैसी स्थिति, 42

लोगों को सरदर्द और 18 लोगों को मांसपेशियों में दर्द महसूस हुआ है। क्लीनिकल ट्रायल

के 28 दिनों बाद तक इन मरीजों में कोई और परेशानी नजर नहीं आयी है। शोध प्रबंध में

बताया गया है कि जब इस कोविड  वैक्सिन का पशुओं पर प्रयोग किया जा रहा था तो

आठ में से सात को पूर्ण सुरक्षा मिली थी। अब शोध के दैनिक निष्कर्षों के बारे में बताया

गया है कि  कोविड वैक्सिन का इंजेक्शन दिये जाने के 14 दिन बाद प्रतिरोधक शक्तियां

अपने चरम पर पहुंची। इसके तरह अगले 28 दिनों में शरीर के अंदर तैयार होने वाली

एंटीबॉडी में काफी तेजी से इजाफा हुआ है।

आंकड़ों के मुताबिक

जिन लोगों को कम डोज दिये गये थे, उनमें 97 प्रतिशत, जिन्हें मध्यम डोज दिये गये थे

उनमें 94 प्रतिशत और जिन्हें हाई डोज दिये गये थे उनमें सौ फीसद एंटीबॉडी की बढ़ोत्तरी

दर्ज की गयी है। कुल मिलाकर 28 दिनों की अवधि के बाद वैक्सिन पाने वाले हर रोगी की

प्रतिरोधक क्षमता लगभग एक जैसी तैयार हो चुकी थी।

यह विधि सार्स कोव 2 के वायरस  को पूरी तरह निष्क्रिय करने में कामयाब रही है

                          कोविड वैक्सिन का पहला प्रयोग सफलता का संकेत दे रहे हैं वैज्ञानिक

ऐसा चीनी वैज्ञानिकों ने दावा किया है। वैसे इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने यह भी पाया

है कि इस वैक्सिन के इस्तेमाल से शरीर में प्राकृतिक तौर पर मौजूद एंटीबॉडी की क्षमता

भी कमजोर हो जाती है, जो एक गंभीर परेशानी है। प्राकृतिक और आंतरिक प्रतिरोधक की

क्षमता कम होने का असर भी अलग अलग आयु वर्ग में अलग अलग देखा गया है। लेकिन

28 दिन के भीतर कोरोना को परास्त करने में सक्षम एंटीबॉडी के पूरी तरह विकसित होने

के बाद सभी आयु वर्गों की प्रतिरोधक क्षमता एक जैसी पायी गयी है।

पहले चरण का परीक्षण सफल होने के बाद चीन के वैज्ञानिकों ने जानकारी दी है कि वे अब

इस वायरस के खिलाफ कोविड वैक्सिन तैयार करने के दूसरे चरण में हैं। इसमें अब सिर्फ

कम और मध्यम डोज का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए मरीजों पर सात और 14

दिन का परीक्षण किया जा रहा है। चीन ने यह भी साफ कर दिया है इसके परीक्षण के लिए

करीब पांच सौ स्वस्थ स्वयंसेवकों को भी तैयार किया गया है। इनमें से 250 को कम डोज

और 250 को मध्यम डोज दिया जाएगा। उसके बाद इस बात की जांच की जाएगी कि

कोरोना वायरस का इन स्वस्थ शरीरों पर क्या असर होता है। इस परीक्षण में साठ साल

की उम्र के लोग भी खुद से शामिल हुए हैं। इस परीक्षण के आधार पर वैक्सिन परीक्षण के

तीसरे दौर के क्लीनिकल ट्रायल का स्वरुप तय किया जाएगा।


 

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