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नये शोध में वैज्ञानिकों ने माइक्रो प्लास्टिक के खतरे का पता लगाया




  • माइक्रो प्लास्टिक अब इंसानों के शरीर में जहर

  •  इंसानी आंखों से नजर नहीं आते इसके सुक्ष्म कण

  •  औसत भारतीय साल में 11 किलो जहर लेता है

  •  विदेशों की तुलना में कम लेकिन खतरनाक


प्रतिनिधि

नईदिल्लीः नये शोध के तहत माइक्रो प्लास्टिक अब इंसानी शरीर के लिए एक अदृश्य जहर बन गया है।

नये शोध के तहत वैज्ञानिकों ने इस नहीं दिखने वाले खतरे का पता लगाया है।

अत्यंत सुक्ष्म आकार के प्लास्टिक इंसानी शरीर के अंदर भोजन के बहाने प्रवेश कर रहे हैं।

इनकी तादाद अधिक होने के बाद वे आंतरिक अंगों पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डालते पाये गये हैं।

इस दिशा में होने वाले शोध के तहत भारत को भी शामिल किया गया था।

भारत में यह निष्कर्ष निकला है कि इस किस्म के भोजन श्रृंखला से जुड़े भारतीय साल में

औसतन 11 किलो माइक्रो प्लास्टिक के अपने शरीर के अंदर पहुंचा रहे हैं।

इनमें से कुछ तो शरीर के बाहर निकल जाता है लेकिन जो कण अंदर फंसे रहते हैं,

वे परेशानी पैदा कर रहे हैं।

मालूम रहे कि दुनिया के प्रदूषण का एक बहुत बड़ा कारण प्लास्टिक ही बन चुका है।

यहां तक की समुद्री जीवन भी इससे प्रभावित होने लगा है। प्लास्टिक की वजह से

खेतों के बंजर होने तथा अनेक तरीके की बीमारी फैलना आम बात है।

माइक्रो प्लास्टिक का इस्तेमाल होने के बाद उसे लोग कचड़ा के तौर पर फेंक देते हैं।

इस वजह से मुफ्त में हासिल होने वाले इसी प्लास्टिक को फिर से इस्तेमाल

लायक बनाने में कबाड़ी का कारोबार भी जहरीला धुआं पैदा करता है।

लेकिन इंसानी शरीर में यह सामान्य भोजन, सौंदर्य रसायन और प्लास्टिक के

बरतनों के जरिए पहुंच रहा है।

अत्यंत सुक्ष्म कण होने की वजह से सामान्य स्थिति में इनका पता भी नहीं चल पाया है।

वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक के इस चक्र को भी परिभाषित किया है। यानी प्लास्टिक का उत्पादन इंसान करता है।

उसे बाजार में कई कामों में लाये जाने के बाद अंततः वह कचड़ा बनकर फेंक दिया जाता है।

वहां से चलकर वह जल के स्रोतों तक पहुंचता है।

फिर समुद्र में प्लास्टिक के पहुंचने की वजह से समुद्री जीवन इसकी चपेट में आता है।

समुद्री जीवन भी मानव भोजन की श्रृंखला में शामिल होने की वजह से

इसी माध्यम से यह फिर से इंसानों तक लौट आता है।

इससे यह चक्र पूरा हो जाता है।

सामान्य आकार के प्लास्टिक इंसानी नजर में आते हैं

लेकिन अत्यंत सुक्ष्म यानी माइक्रो और नैनो प्लास्टिक को इंसानी आंख नहीं देख पाता है।

इस वजह से इस अदृश्य शत्रु से इंसान को ज्यादा आंतरिक खतरा हो रहा है।

शोध के तहत पाया गया है कि लिपस्टिक, मसकरा, शैम्पू के अलावा समुद्री भोजन की वजह से

भी इस सुक्ष्म आकार के प्लास्टिक इंसानी शरीर के अंदर पहुंचते हैं।

इसके अलावा बोतल बंद पानी से भी प्लास्टिक का अदृश्य कण शरीर के अंदर आसानी से पहुंच रहा है।

सर्वेक्षण के दौरान यह पाया गया है कि टेक्सटाइल और पीवीसी उद्योग में काम करने वाले लोग

भी अनजाने ही नैनो प्लास्टिक निगलते और सांस लेते रहते हैं।

माइक्रो प्लास्टिक कचड़ा इंसानी शरीर के अंदर ही एकत्रित होता रहता है

इसकी तादाद शरीर में काफी बढ़ जाने के बाद अंदर से परेशानी प्रारंभ होती है।

इस शोध से जुड़े वेल्लौर इंस्टिटियूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफसर नटराजन चंद्रशेखरन ने कहा कि

अनेक अवसरों पर इंसान को पता भी नहीं होता कि वह इस किस्म के

जहर को अपने शरीर के अंदर जाने का रास्ता दे रहा है।

जो बाद में उसके लिए खतरा बनने वाला है।

नये शोध सर्वेक्षण के तहत यह पाया गया है कि इस किस्म के माहौल में रहने वाला हर भारतीय

साल में करीब 11 किलो माइक्रो प्लास्टिक अपने शरीर के अंदर भोजन, सांस

अथवा रसायनों के इस्तेमाल की वजह से पहुंचा रहा है।

वैसे भारतीय वैज्ञानिक यह संतोष व्यक्त करते हैं कि आम अमेरिकी अथवा चीन के

नागरिक की तुलना में भारतीयों का यह नुकसान तुलनात्मक तौर पर काफी कम है।

लेकिन इसके बाद भी यह निश्चित तौर पर एक अदृश्य पर बड़ा खतरा है।

शरीर के अंदर पहुंचने के बाद ऐसे छोटे कण रक्त कोशिकाओं के अंदर भी भ्रमण करते हैं।

इस रास्ते वे शरीर के अनेक जटिल क्रियाओं वाले अंगों के अंदर तक

प्रवेश कर परेशानी पैदा करते हैं।

जिनके बारे में जल्दी पता भी नहीं चल पाया है।

इसी विषय पर आस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने पाया है कि लोगों के मलों के परीक्षण में

भी माइक्रो प्लास्टिक पाये गये हैं।

इसी तरह लोगों के पेशाब में बिस्फेनोल ए की काफी अधिक मात्रा पायी गयी है।

यह एक ऐसा रसायन है, जिसका इस्तेमाल प्लास्टिक बनाने में किया जाता है।

कम उम्र के बच्चों तक के पेशाब में यह रसायन पाये जाने को भविष्य के लिए

काफी खतरनाक माना गया है

क्योंकि यह समय के साथ शरीर के अंदर कई प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं करता है।

कुछ इसी तरह का निष्कर्ष ब्रिटेन के एक्सटर विश्वविद्यालय के शोध दल का भी है।


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Rashtriya Khabar


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