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टीबी की बीमारी ठीक करने की नई तकनीक विकसित







  • दो विश्वविद्यालयों के शोध ने कर दिखाया कमाल

  • टीबी के कई जीवाणुओं पर अब दवा का असर नहीं

  • ऐसे रोगियों को भी स्वस्थ करने में मदद मिली

  • विषाणुओं का रक्षा कवच तोड़ देता है यह यौगिक

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः टीबी की बीमारी पूरी दुनिया के लिए एक कठिन चुनौती है।

अब इस चुनौती में नई नई परेशानियां जुड़ने की वजह से वैज्ञानिकों का ध्यान इसकी तरफ गया था।

टीबी के अनेक मरीजों का रोग ठीक नहीं होने का मुख्य कारण टीबी के विषाणुओं का दवा के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता का विकास कर लेना है।

इस वजह से कोई भी दवा रोगियों पर असर ही नहीं करती थी।

अब इसका भी निदान न सिर्फ खोज लिया गया है बल्कि सफलतापूर्वक इसका प्रयोग भी किया जा चुका है।

वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक यौगिक तैयार किया है जो न सिर्फ टीबी ठीक करती है

बल्कि विषाणुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी समाप्त कर देती है।

शोध के तहत यह बताया गया है कि वर्ष 2017 में टीबी से पूरी दुनिया में 15 लाख लोगों की मौत हुई थी।

वह पूरी दुनिया में सबसे तेजी से फैलता हुआ संक्रामक रोग के तौर पर देखा जा रहा है।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय और स्वीडन के उमिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने

टीबी की इस परेशानी से निजात दिलाने का तरीका खोजा है।

टीबी के विषाणु जिस सबसे ताकतवर एंटीबॉयोटिक दवा आयोनियाजिट पर विजय पा चुके हैं,

उसे भी वैज्ञानिकों ने बदल डाला है।

इस बारे में प्रकाशित शोध प्रबंध में बताया गया है कि इस अनुसंधान को

आगे बढ़ाने के लिए एक बैक्टेरिया का भी विकास प्रयोगशाला में किया गया है।

इस बैक्टेरिया के माध्यम से भविष्य के तमाम शोधों का असर जांचा जाएगा।

टीबी को फैलाने वाले विषाणुओं पर होगा नियंत्रण

अभी इसी दवा के जो यौगिक तैयार किया गया है वह रोगियों के अंदर पल रहे विषाणुओं की दवा प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त कर देता है।

इससे दवाई का असर रोगी के शरीर के अंदर होने लगता है और वह ठीक हो जाता है।

इसका दूसरा फायदा यह आंका जा रहा है कि इस यौगिक के इस्तेमाल से

अब रोगियों को ठीक करने में डाक्टर जिस छह महीने के ईलाज की सलाह देते हैं,

वह समय सीमा भी उल्लेखनीय तरीके से कम हो जाएगी।

शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि निरंतर छह महीने तक लगातार दवा खाने और एक सीमित जीवन जीने की दिनचर्या का अधिकांश लोग सही तरीके से पालन नही कर पाते हैं।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के एसोसियेट प्रोफसर क्रिस्टीना स्टालिंग्स कहती हैं कि रोगी को चार अलग अलग दवा लेनी पड़ती है। हर दवा का साइड एफेक्ट भी होता है।

इसलिए लोग जितने अधिक दिनों तक इन दवाओं का सेवन करेंगे, उनकी आतंरिक संरचना पर दवाइयों का कुप्रभाव भी उतना अधिक होगा।

इसी वजह से अनेक बार रोगी के अंदर मौजूद विषाणुओं पर दवाई का असर होना भी बंद हो जाता है।

यानी विषाणु खुद इन दवाइयों पर विजय पा लेते हैं।

अब नया यौगिक विषाणुओं को ऐसा नहीं करने देगा।

विषाणुओं का रक्षा कवच समाप्त  होगा इस यौगिक से




इस ईलाज की विधि के बारे में बताया गया है कि इसके इस्तेमाल से विषाणु के अंदर दवा का असर समाप्त करने का जो गुण विकसित हो चुका है, वह समाप्त हो जाता है।

इससे दवा सही तरीके से काम करने लगती है। जिसका नतीजा होता है कि रोगी जल्दी ठीक हो जाता है।

वैज्ञानिकों ने दवाई पर शोध करने के बदले टीबी के विषाणुओं की गतिविधियों का अध्ययन करने के बाद इस यौगिक को तैयार किया।

इसके इस्तेमाल से विषाणु खुद ही दवाई पर प्रतिरोध की क्षमता खो देता है।

अनुसंधान में यह पाया गया कि दरअसल ऐसे विषाणु अपने ईर्द गिर्द एक आवरण तैयार कर लेते हैं, जिसकी वजह से दवाइयों का असर उन तक पहुंच ही नहीं पाता।

फिर सी-10 नामक इस यौगिक की जांच से यह बात सामने आयी कि यह यौगिक विषाणुओं पर कोई असर तो नहीं डालता लेकिन वह उन्हें आवरण बनाने से रोक देता है।

इस आवरण के समाप्त होने से दवाइयों का असर होने लगता है।

इस यौगिक को जांचने के लिए वैज्ञानिकों ने कुल 91 यौगिकों की अलग अलग जांच की।

उसके बाद इसे अंतिम स्वरुप प्रदान किया गया है।

प्रयोगशाला में वैसे टीबी विषाणु पैदा किये गये जिनपर दवाइयों का असर नहीं होता था।

उसके बाद इस यौगिक के इस्तेमाल के बाद यह पाया गया कि विषाणु अपना रक्षा कवच खो चुके हैं।

इसी वजह से इसे टीबी के ईलाज की दिशा में क्रांतिकारी कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

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