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लाइलाज बीमारी अब नहीं रहेगा कैंसर भी वैज्ञानिकों का दावा

  • काफी अरसे से जारी है अनसंधान और प्रयोग
  • चौथे स्टेज के मरीज को भी बच जाएगा
  • कैंसर से लड़ने में कारगर होगा वायरस
  • किसी भी स्टेज में इलाज संभव होगा
प्रतिनिधि

नई दिल्ली: लाइलाज बीमारी कैंसर का इलाज लगातार वैज्ञानिक ढूंढ

रहे हैं। वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक शोध में पाया है कि कैंसर किसी भी

स्टेज में हो उसका इलाज करना संभव होगा। उन्होंने एक ऐसे वायरस

की खोज की है जो कैंसर से लड़ने में कारगर साबित होगा। वैज्ञानिकों

का दावा है कि ये वायरस ऐसा है कि कैंसर की लास्ट स्टेज पर भी वह

कैंसर का खात्मा कर सकता है।

उनका कहना है कि अभी कुछ परीक्षण बाकी हैं और सब कुछ ठीक रहा

तो अगले साल तक स्तन कैंसर के मरीजों पर इसका प्रयोग किया

जाएगा। वैज्ञानिकों ने इस वायरस को वैक्सीनिया सीएफ-33 नाम

दिया है। यह वायरस आमतौर पर सर्दी-जुकाम से बनते हैं। जब इस

वायरस को कैंसर से मिलाया गया तो परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे।

फिलहाल इस प्रयोग को चूहों पर किया गया है। इस वायरस ने चूहों में

बने ट्यूमर को सिकोड़ कर काफी छोटा कर दिया। गौरतलब है कि,

शुरूआती समय में इस वायरस का प्रयोग ब्रेन कैंसर के लिए किया

गया था। कैंसर के फैलने के कारणों का खुलासा होने और उसमें शरीर

के अंदर होने वाले जेनेटिक और कोशिकाओं के बदलावों को समझा

गया है। इसके आधार पर जिन प्रोटिनों पर कैंसर के विषाणु हमले

करते हैं, उनकी भी पहचान हो चुकी है। इसी वजह से प्रोटिन के साथ

कोशिकाओं में जेनेटिक सुधार की बदौलत कैंसर की कोशिकाओं को

आगे बढ़ने से रोकने और उन्हें समाप्त करने की विधि आजमायी जा

रही है। इसके लिए दुनिया भर में अलग अलग स्थानों पर अनुसंधान

काफी समय से चल रहे हैं। इन्हीं अनुसंधानों की बदौलत अब प्रारंभिक

स्तर की लाइलाज बीमारी कैंसर का निदान संभव हो पाया है।

लाइलाज कैंसर का प्रयोग सबसे पहले अमेरिका में

सबसे पहले अमरीका में हुए इस प्रयोग में वैज्ञानिकों को कुछ ही हद

तक सफलता मिली थी। उन्होंने पाया कि कुछ मरीजों के ट्यूमर

एकदम ही खत्म हो गया जबकि कुछ मरीजों का ट्यूमर छोटा हो गया

था।

अमरीका के बाद ऑस्ट्रेलिया ने इसका प्रयोग दवा के रूप में किया।

ऑस्ट्रेलिया की बायोटेक कंपनी इम्यूजीन नाम की इस दवा को तैयार

किया है। बता दें कि इस दवा को बनाने के पीछे अमेरिकी वैज्ञानिक

और कैंसर विशेषज्ञ प्रोफेसर यूमान फॉन्ग का हाथ है।

कैंसर कोशिकाओं पर सीधे असर डालने की विधि पर काम

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक कैंसर के मुख्य कारणों की पहचान कर चुके

हैं। अब सबसे पहले चूहों पर उन्हें आजमाने के लिए शरीर के अंदर नई

दवा के असर को क्रमवार तरीके से देखा गया है। इसके तहत दवा की

वजह से शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की भी गहन जांच की

गयी है। इसी वजह से अब वैसी विधि पर काम हो पाया है जो सिर्फ

शरीर के अंदर मौजूद लाइलाज  कैंसर की कोशिकाओं को भी अपना

निशाना बनाता है।

पहले इस विधि में जब कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने की कोशिशें

होती थी तो उसके साथ शरीर की स्वस्थ्य कोशिकाएं भी ईलाज के

असर से नष्ट हो जाया करती थी। अब शोध के लिए पहले से

अधिकाधिक तथ्य मौजूद होने के बाद नई चिकित्सा पद्धति में

वैज्ञानिक जहर से जहर को मारने की विधि को आजमा रहे हैं। इस

दिशा में पहले भी कई ऐसे विषाणुओं की पहचान हो चुकी है जो शरीर

के अंदर मौजूद सिर्फ कैंसर के सेलों पर ही हमला कर उन्हें नष्ट कर

सकते हैं। वैज्ञानिक शोध में यह पाया गया है कि दरअसल कैंसर के

सेल शरीर के अंदर मौजूद स्वस्थ्य सेलों पर आवरण की तरह फैलने

लगते हैं। इससे शरीर के स्वस्थ्य सेलों की सारी पुष्टि इन्हीं कैंसर सेलों

को मिलने लगती है। इससे कैंसर के सेल पनपते हैं और स्वस्थ्य सेल

पोषण के अभाव में मरने लगते हैं। इसी वजह से कैंसर की कोशिकाओं

को छेड़ने की स्थिति में वे तेजी से शरीर के अन्य भागों में फैल जाया

करते थे। अब इस गड़बड़ी को दूर करने के काफी उपाय हो चुके हैं।

भारत में भी कैंसर के ईलाज पर काफी कुछ प्रगति

अपने देश भारत में भी कैंसर के ईलाज के लिए कई उत्साहवर्धक

अनुसंधान हो चुके हैं। कैंसर कोशिकाओं को समाप्त करने और स्वस्थ

कोशिकाओं को जीवित रखने की विधि का वैज्ञानिक परीक्षण हो चुका

है। इसके अलावा सिल्वर नैनो पार्टिकल्स के माध्यम से सिर्फ कैंसर

की कोशिकाओं को फैलने से रोकने और उन्हें मार डालने की विधि में

भी भारत ने काफी सफलता पायी है। जेनेटिक पद्धति पर हो रहे इन

तमाम अनुसंधानों का परीक्षण का दौर जारी है। परीक्षण में सफलता

मिलने के बाद उन्हे क्लीनिकल ट्रायल के बाद ही आम आदमी के

उपयोग ले लिए काम में लाया जाएगा।

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