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कोविड 19 के मृत्यु दर को समझने में जुटे हैं दुनिया भर के वैज्ञानिक

  • विटामिन डी का कोरोना से रिश्ता पर शोध जारी

  • यूरोप के बीस देशों के मरीजों पर शोध

  • अधिक उम्र के लोगों पर ज्यादा घातक

  • बच्चे अपनी स्वाभाविक संरचना से मजबूत

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कोविड 19 के मृत्यु दर को समझते हुए अब इसके साथ विटामिन डी के रिश्ते

की तलाश हो रही है। नया शोध यह संकेत दे रहा है कि शरीर में इस विटामिन डी की कमी

भी कोरोना संक्रमित रोगी की मौत का कारण बन सकती है। खास कर वैज्ञानिकों ने इसके

लिए यूरोप के उन बीस देशों के आंकड़ों का गहन अध्ययन किया है, जहां मौत का आंकड़ा

काफी ऊपर रहा है। ब्रिटेन के एंजिलिया रस्किन विश्वविद्यालय (एआरयू) और क्वीन

एलिजाबेथ हॉस्पिटल के साथ साथ एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के इस शोध के बारे में

वैज्ञानिक पत्रिका में जानकारी दी है।

यह जान लें कि विटामिन डी हमारे शरीर के आंतरिक गतिविधियों को बेहतर बनाता है।

खास कर सफेद रक्त कण के संचालन को बेहतर बनाने में इसकी प्रमुख भूमिका होती है।

इससे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बेहतर बनती रहती है। इस विटामिन डी के होने से सफेद

रक्त कण साइटोकाइन की अधिकता को भी नियंत्रित करते हैं। वर्तमान में इसी

साइटोकाइन की वजह से कोरोना का प्रकोप तब बढ़ता है जब इसकी बाढ़ आ जाती है। इसे

वैज्ञानिक परिभाषा में इसे साइकाइन साइक्लोन कहा जाता है। अब इटली और स्पेन के

आंकड़े इस विटामिन डी की कमी को दर्शा चुके हैं। इस वजह से उत्तरी यूरोपीय देशों से इस

विटामिन डी का पता चला है। दूसरी तरफ दक्षिणी यूरोप के देशों में जहां सूर्य की गरमी

अधिक हैं, वहां अधिक आयु के लोगों पर भी कोरोना का मारक असर कम नजर आ रहा है।

विटामिन डी हासिल करने का यहां का भोजन भी अन्य देशों की तुलना में अलग है। यहां

लोग कॉल लीवर ऑयल के अलावा विटामिन डी के कैप्सूल लेते हैं।

कोविड 19 के मृत्युदर यूरोप में भी अलग अलग

दूसरी तरफ स्कैनडेवियान देशों के इलाकों में कोविड 19 के सबसे कम मामले हैं और वहां

मृत्यु दर भी अपेक्षाकृत कम है। इन आंकड़ों की वजह से बीस देशों की स्थिति का

विश्लेषण किया जा रहा है। शोध दल के नेता डॉ ली स्मिथ ने इस शोध के बारे में यह

जानकारी दी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि विटामिन डी की भूमिका सांस संबंधी गड़बड़ी को

रोकता है। सर्वेक्षण मंक यह पाया गया है कि 75 फीसद बीमार और अधिक उम्र के लोगों ने

विटामिन डी की कमी पायी गयी है।

दूसरी तरफ नार्थवेस्टर्न विश्ववियालय (अमेरिका) ने भी पाया है कि जिन मरीजों में

विटामिन डी की कमी है, उस पर सामान्य कोरोना मरीज के मुकाबले दोगुणा असर हो रहा

है। इसी तरह चीन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ईरान, दक्षिण कोरिया, स्पेन, स्विटजरलैंड आदि

देशों में भी इस शोध के मिलते जुलते आंकड़े सामने आये हैं। नार्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय

के प्रोफसर वाडिम बैकमैन ने इसकी बात कही है। उनके मुताबिक विटामिन डी की कमी

और औसत मात्रा में मौत का आंकड़ा इसे स्पष्ट तौर पर साबित कर देता है। वैज्ञानिक

मानते हैं कि विटामिन डी का सही होने से कोरोना से बचाव तो नहीं होगा पर वायरस के

हमले से बचाव करना आसान हो जाएगा। इसी एक विटामिन डी की वजह से यह बात भी

धीरे धीरे समझ में आ रही है कि बच्चों पर कोरोना वायरस का असर क्यों कम मारक होता

है क्योंकि उनमें प्राकृतिक तौर पर भी विटामिन डी की अधिकता होती है। यह स्थिति तब

है जबकि बच्चों की प्रतिरोधक शक्ति आम वयस्क से कम होती है । मां के गर्भ से लेकर

आयी शक्तियों की बदौलत ही बच्चे इस हमले का बेहतर मुकाबला कर पा रहे हैं।

आंकड़ों की वजह से शोध को आगे बढ़ाने की वकालत

इन तमाम आंकड़ों की वजह से इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक अब कोरोना वायरस की संरचना

पर विटामिन डी के प्रभाव को और गहराई से जांचना चाहते हैं। इस शोध का भी मकसद

दरअसल कोरना से बचाव का स्थायी और पुख्ता इंतजाम खोजना ही है।


 

 

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