प्लास्टिक का विकल्प तलाशने में आगे बढ़ रहे हैं वैज्ञानिक

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  • दुनिया और खास तौर पर समुद्र के प्रदूषण को रोकने की कवायद

  • ऐसा विकल्प को प्रदूषित ना करे

  • जरूरत पर भोजन के लायक भी बने

  • खुद ही मिट्टी बन सकने लायक

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः प्लास्टिक ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को चिंतित कर रखा है।

इसलिए इसके विकल्प की जोर शोर से तलाश हो रही है।

अब तो इस दिशा में वैज्ञानिक ऐसा कुछ करना चाहते हैं

तो प्लास्टिक का विकल्प होने के साथ साथ भोजन के भी काम आ सके।

वर्ष 1907 में जब बेल्जियन के वैज्ञानिक लिओ बैकलैंड ने बैकेलाइट का

आविष्कार किया था, जब इसके परिष्कृत स्वरूप से दुनिया को होने वाले नुकसान का

अंदाजा भी किसी को नहीं था।

सभी ने इस नये आविष्कार को काफी सराहा था।

बैकेलाइट से सुधरते सुधरते यह प्लास्टिक तक आ गया।

प्रारंभिक अवस्था में इसके खतरों को लोग सही तरह आंक नहीं पाये थे।

जैसे जैसे इसका उपयोग बढ़ता गया, लोगों को इसके खतरों का एहसास होता गया।

अब तो हालत इतने बिगड़े हुए हैं कि इस कचड़े का निष्पादन कैसे किया जाए, यह चिंता का बड़ा प्रश्न है।

खास तौर पर समुद्र के अंदर पहुंच रहे लाखों टन कचड़ा समुद्री जीवन खतरे में पड़ गया है।

कई स्थानों पर समुद्र से प्लास्टिक निकालने का काम निरंतर चल रहा है।

प्लास्टिक से समुद्र में हो रहा है सबसे ज्यादा नुकसान

अपने भारत में भी समुद्र से निकाले गये प्लास्टिक का इस्तेमाल अब सड़क निर्माण में भी होने लगा है।

प्लास्टिक की वजह से पर्यावरण को हुए नुकसान से पता चला है कि प्लास्टिक के फायदे के मुकाबले नुकसान अधिक हुए हैं।

इसी वजह से अब इसके विकल्प की तलाश हो रही है।

दूसरी तरफ ऐसे प्लास्टिक और बैक्टेरिया पर भी शोध हो रहे हैं जो पहले से एकत्रित प्लास्टिक को समाप्त कर सकें।

पृथ्वी पर प्लास्टिक का इस्तेमाल सिर्फ इसके सस्ता होने तथा काफी समय तक टिकने की वजह से अधिक हुआ है।

इसलिए अब बॉयो प्लास्टिक बनाने पर काम चल रहा है।

यह बॉयो प्लास्टिक दोबारा काम में लाने जाने वाले तमाम पदार्थों से तैयार किया जा सकता है।

खास तौर पर कृषि के गैर जरूरी उत्पाद, पशु आहार के बचे हुए हिस्से,

वनस्पति तेल और चर्बी  सहित अन्य कृषि पदार्थों से इसे बनाने का काम चल रहा है।

इसका मकसद भोजन के लायक प्लास्टिक का विकल्प तैयार करना है।

अब तो वैज्ञानिकों ने चीनी उत्पादन के क्रम में निकलने वाले पॉलिएक्टिक

एसिड का इस्तेमाल भी इसमें करने की तैयारी की है।

इस पर शोध चल रहा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक इस श्रेणी के बॉयोप्लास्टिक का बाजार भी तेजी से

विकसित हो रहा है और वर्ष 2022 तक इसके तीन सौ करोड़ डॉलर का आंकड़ा

पार कर जाने की उम्मीद है।

इनमें से कुछ शोध ऐसे भी हैं, जिनमें बॉयोप्लास्टिक को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में अतिरिक्त औद्योगिक प्रक्रियाओं की जरूरत भी पड़ती है।

दूसरी तरफ चिंता इस बात की भी है कि इस विधि से बॉयो प्लास्टिक बनाने की तकनीक आकर्षक होने पर कहीं खेती पर इसका प्रतिकूल प्रभाव ना पड़े।

कुछ के निर्माण में  मिथेन गैस का उत्सर्जन भी होता है, जो जमीन की उर्बरता को भी नुकसान पहुंचाने वाला है।

प्लास्टिक के कुछ विकल्प बन चुके हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल हैं

इस दिशा में पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय की एक टीम ने नैनो इंजीनियरिंग तकनीक की मदद से एक ऐसा पदार्थ तैयार करने में सफलता पायी है, जिसे दोबारा काम में लाया जा सकता है।

इससे प्लास्टिक के एक बड़े इस्तेमाल से दुनिया को मुक्ति मिल सकती है।

क्योंकि प्लास्टिक के बैग और छोटे रैपर ही पृथ्वी के सतह पर अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं।

जल मार्गों से होते हुए समुद्र तक पहुंचने की वजह से इन्ही से समुद्री जीवन भी खतरे में पड़ गया है।

इसी तर्ज पर ब्लास्टा कुबुसोवा और मिरोस्लाव कार्ल ने भुट्टा, चीनी और रसोई के तेल के मिश्रण से एक विकल्प तैयार किया है।

यह करीब पंद्रह साल तक टिकता है और अपने आप ही समाप्त हो जाता है।

चीन में एक ऐसे पॉलियेस्टर का विकास हुआ है जो पानी के साथ संपर्क में आते ही खुद ब खुद गलने लगता है और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

स्वीडन में आलू और पानी से थर्मोप्लास्टिक बनाये गये हैं।

जो दो महीने के भीतर नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाते हैं।

फ्लोरिडा में बीयर के उत्पादन में निकले अवशेष से ऐसा बॉयोप्लास्टिक बनाया गया है

जिसे अगर समुद्री जीव खा ले तो भी उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचता।

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