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रामसेतु कैसे बना इस पर वैज्ञानिक शोध होगा

  • समुद्र की गहराई में होगा शोध व अनुसंधान

  • ए एस आई ने गोवा के संस्थान को दी अनुमति

  • आधुनिक नौकाओँ से गहराई तक होगा परीक्षण

  • गुजरात में द्वारका शहर की खोज पहले जारी

एस उन्नीथन

रामेश्वरमः रामसेतु कैसे बना है, इस पर अनुसंधान की अनुमति दी गयी है। बताते चले

कि हिंदू पौराणिक और धार्मिक कथा रामायण में इस रामसेतु का उल्लेख है। इसी वजह से

धर्मप्रेमी बड़े आदर के साथ इसे याद करते हैं। कथा के मुताबिक इसी रामसेतु के तैयार

होने के बाद भगवान श्रीराम की सेना श्रीलंका तक गयी थी। इस रामसेतु का इलाका कुछ

ऐसा है कि सैटेलाइट से भी यह साफ नजर आता है। अब नईदिल्ली में आर्कियोलॉजिकल

सोसायटी ऑफ इंडिया ने इस पर शोध करने की अनुमति प्रदान कर दी है। यह शोध कई

चरणों मे पूरा किया जाएगा। शोध का पहला चरण यह जांचना होगा कि इस रामसेतु की

वास्तविक आयु क्या है। यानी इसके माध्यम से शोधकर्ता यह समझना चाहेंगे कि क्या

रामसेतु और श्रीराम के काल के बारे में जो पौरणिक तथ्य मौजूद हैं, उनमें कोई समानता

है। गोवा की संस्था सीएसआईआर नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी को इसकी

अनुमति प्रदान की गयी है। शोध दल आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक के सहारे इस इलाके के

आंकड़े एकत्रित कर उनका विश्लेषण करेगा। इसके लिए खास तौर पर रेडियोमैट्रिक पद्धति

का इस्तेमाल भी होगा, जिसका खास मकसद वहां बना ढांचों की आयु का निर्धारण करना

है। गोवा की इस संस्था के वैज्ञानिक प्रो. सुनील कुमार सिंह का मत है कि वहां जो कोरल

समूह और प्यूमिक पत्थर मौजूद हैं, सबसे पहले उनकी जांच की जाएगी। यह वैज्ञानिक

सत्य है कि कोरल में कैलशियम कार्बोनेट होता है। लिहाजा उससे पत्थरों और अन्य ढांचों

की उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है। उसके निर्माण काल का पता चलने के बाद यह

समझना आसान होगा कि क्या वाकई यह रामसेतु रामायण के काल खंड का है अथवा

नहीं।

रामसेतु का हिंदू धार्मिक ग्रंथ रामायण में उल्लेख है

हिंदू धार्मिक ग्रंथ रामायण के मुताबिक इस रामसेतु का निर्माण श्रीराम के साथ चलने

वाली वानर सेना के द्वारा किया गया था। इसी सेतु के रास्ते श्रीराम की सेना लंका जा

पहुंची थी और माता सीता को रावण के वध के बाद रिहा कराया गया था। इधर कथाओं

अथवा इतिहास में इस रामसेतु का निर्माण किसी और के द्वारा अथवा किसी इंसान के

द्वारा कराये जाने का कोई दूसरा उल्लेख भी नहीं मिलता है। गोवा की संस्था अपने इस

काम के लिए अपने शोध नौका सिंधु साधना या सिंधु संकल्प का इस्तेमाल करने वाली है।

ये नाव समुद्र की चालीस मीटर गहराई तक से नमूने एकत्रित कर सकते हैं। इसलिए जब

यह काम होगा तो यह भी पता चल जाएगा कि समुद्र की गहराई में कुछ और भी अवशेष है

अथवा नहीं। रामसेतु के पहले से ही पौराणिक शहर द्वारका पर शोध भी पिछले दो वर्षों से

चल रहा है। किंवदंति है कि भगवान श्रीकृष्ण का यह शहर समुद्र में डूब गया था।शोध

वैज्ञानिकों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उनका शोध वैज्ञानिक कारणों से है और

इसका लोगों की धार्मिक मान्यताओं से कुछ लेना देना नहीं है।

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