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सरयू राय पर भाजपा के फैसले से बदलेगी पूरे झारखंड की राजनीति

  • टर्निंग प्वाइंट साबित होगा सरयू राय पर फैसला
  • दोनों खेमा वेट एंड वाच की मुद्रा में
  • खनन घोटालों पर जांच की मांग पहले ही
  • लड़ाई खुलकर हुई तो सामने आयेंगे कई राज
संवाददाता

रांचीः सरयू राय पर भाजपा क्या कुछ फैसला लेती है, इस पर झारखंड में

भाजपा का भविष्य टिक गया प्रतीत होता है। वैसे ही टिकट के वितरण से

नाराज लोगों का पार्टी के इस्तीफा देने का सिलसिला दिनोंदिन तेज होता जा

रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि सरयू राय जैसे कद्दावर नेता के साथ अगर

पार्टी ने सम्मानजनक फैसला नहीं किया तो उसके दूरगामी और प्रतिकूल

परिणाम हो सकते हैं।

जमशेदपुर के कद्दावर नेता सरयू राय को अब तक टिकट नहीं दिया गया है।

साफ है कि दरअसल यह मुख्यमंत्री रघुवर दास और सरयू राय के बीच के

विवाद की वजह से हैं। लेकिन जिस तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम बदल रहे

हैं, उससे यह तय हो चला है कि इस मुद्दे पर फैसला ही झारखंड की राजनीति

का एक टर्निंग प्वाइंट साबित होने जा रहा है।

वहां से सरयू राय को टिकट नहीं दिये जाने पर जमशेदपुर में चर्चा का बाजार

न सिर्फ गर्म है बल्कि इस मुद्दे पर जोरदार तरीके से गोलबंदी भी हो रही है।

यह गोलबंदी रघुवर दास की अपनी सीट के लिए भी बड़ी चुनौती बनता जा

रहा है। लेकिन अंततः इस टिकट पर फैसला क्या होगा, इस पर अब बहुत कुछ

निर्भर है। अंदरखाने से जो संकेत मिल रहे हैं, उसके मुताबिक राज्य के अनेक

बड़े भाजपा नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व के इस रवैये को भांपते हुए अपनी तरफ

से राय देना बंद कर दिया है। सूत्रों की मानें तो सरयू राय को टिकट नहीं देने

का मुद्दा दिल्ली में बैठक के दौरान लाया गया था।

वहां रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के विरोध की वजह से इस पर कोई निर्णय नहीं

हो पाया है। लेकिन सरयू राय खेमा के लोग भी इसे श्री राय का अपमान

मानकर अंदर ही अंदर तैयारियों में जुट गये हैं।

सरयू राय को चेहरा बनाकर भाजपा ने अपने नंबर बढ़ाये हैं

जातिगत समीकरणों की वजह से भी यह भाजपा के लिए परेशानी का सबब

बनता जा रहा है। जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं, वैसे वैसे यह मोर्चाबंदी और

मजबूत होती चली जा रही है। जानकार मानते हैं कि दरअसल राजनाथ सिंह

के विरोध की वजह से टिकट काटने का फैसला नहीं लिया जा सका है। लेकिन

रघुवर दास और उनके खेमा के लोग इस मामले को इतना लटकाकर रखना

चाहते हैं कि धैर्य खोकर खुद सरयू राय ही कोई कड़ा फैसला लें। दूसरी तरफ

सरयू राय का खेमा हर विकल्प पर सोच विचार कर लेने के बाद पार्टी नेतृत्व

के फैसले की प्रतीक्षा कर रहा है।

यह बात भाजपा के अंदर भी सर्वविदित है कि सरयू राय को भ्रष्टाचार के

खिलाफ एक ऑइकन की तरह माना जाता है। खुद भाजपा ने भी समय समय

पर उनके नाम का खूब प्रचार किया है। खास तौर पर लालू यादव और चारा

घोटाला एवं मधु कोड़ा एवं खनन घोटाला में सरयू राय के कंधे पर बैठकर ही

भाजपा ने चुनावी गाड़ी को आगे बढ़ाया है।

इस बार सरकार गठन के कुछ दिनों बाद से ही सरयू राय वर्तमान रघुवर दास

सरकार के कुछ फैसलों से असहमत हो गये थे। सूत्रों की मानें तो प्रारंभ में श्री

राय ने पार्टी और सरकारी स्तर पर पत्र भेजकर इन गड़बड़ियों को सुधारने की

मांग की थी। इन मांगों को नजरअंदाज किये जाने के बाद धीरे धीरे सरयू राय

मुखर होते चले गये। उनके दो बयान पर रघुवर दास और उनके बीच के संबंध

का पुल पूरी तरह ध्वस्त हो गया।

रघुवर दास के साथ उनका रिश्ता पूरी तरह बिगाड़ दिया अफसरों ने

श्री राय ने एक मौके पर कहा था कि इस सरकार में शामिल होने की वजह से

वह परेशानी महसूस करते हैं। दूसरे मौके पर उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते

हैं कि झारखंड का कोई और मुख्यमंत्री भी जेल जाए। इसलिए जिन गड़बड़ियों

की तरफ उनका इशारा रहा है, उन्हें सुधार जाना चाहिए। लेकिन सरकारी

अफसरों की निजी राजनीति ने इन मुद्दों को सुलझान के बदले उलझाने का

ज्यादा काम किया। इसमें पूर्व मुख्य सचिव राजबाला वर्मा सहित वर्तमान के

कई प्रमुख अधिकारियों की प्रमुख भूमिका रही। दूसरी तरफ अपनी कार्यशैली

के अनुरुप ही श्री राय ने सवाल उठाने के बाद उससे संबंधित दस्तावेज हासिल

करने में कोई कसर नहीं छोड़ी होगी, ऐसी उम्मीद है।

इसलिए स्पष्ट है कि अगर वाकई सरयू राय को भाजपा टिकट नहीं देती है तो

सरयू राय के पिटारे से घोटालों के वे सारे दस्तावेज बाहर आयेंगे, जो इस

चुनाव में भाजपा और खास तौर पर रघुवर दास के लिए परेशानी का कारण

बनेंगे। दूसरी तरफ यह भी संभावना है कि श्री राय को भाजपा का टिकट नहीं

मिलने की स्थिति में वह अपने समर्थकों के दबाव में रघुवर दास के खिलाफ

ही चुनाव लड़ेंगे। वैसी स्थिति में इस सीट का जातिगत समीकरण भी सरयू

राय के लिए महत्वपूर्ण बन जाएगा।

अर्जुन मुंडा से समर्थन की उम्मीद तो रघुवर खेमा को भी नहीं

इन तमाम समीकरणों की वजह से यह लगभग तय हो चुका है कि भाजपा के

अंदर भी रघुवर दास वनाम सरयू राय की मोर्चाबंदी हो चुकी है। वहां के तीसरे

कद्दावर नेता अर्जुन मुंडा फिलहाल ऐसे विवादास्पद मुद्दों पर बयान देने से

बचने के बाद भी अंततः रघुवर दास के समर्थन में नहीं होंगे, इसका एहसास

खुद रघुवर दास खेमा के लोगों को भी अच्छी तरह है। जाहिर है कि अर्जुन मुंडा

का समर्थन नहीं होने की स्थिति में सिंहभूम सहित पूरे झारखंड में भाजपा का

एक बड़ा वर्ग खुलकर रघुवर दास के समर्थन में कतई नहीं आगे आयेगा।

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