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सरकती जाये है रुख से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

सरकती जाये हैं रुख से नकाब यानी प्याज का छिलका उतरना। अब तो अपने सरयू भइया

सीधे केंद्रीय कमान पर ही गोला दाग रहे हैं। एक नहीं कई बार सीधे मोटा भाई से पूछ

लिया कि इस किस्म की गड़बड़ियों को संरक्षण देने में उनका क्या योगदान है।

कुछ लोगों को यह बात भले ही नागवार गुजरे और बाकी लोगों को यह बात खांटी

राजनीति लगे लेकिन दरअसल में अपने सरयू भइया इस बात के जरिए जिस निशाने पर

निशाना साध रहे हैं, वह बहुत कम लोगों को मालूम है। लोग तो यही मानते हैं कि अमित

शाह ने सीधे रघुवर दास को संरक्षण दिया है। लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है। बीच में

राजबाला वर्मा थी, इसके बारे में शायद सरयू भइया को काफी अधिक नॉलेज हैं।

इसी वजह से उन्होंने घूमाकर जो तीर चलाया है वह पता नहीं एक साथ कितनों को घायल

कर देगा। मामला तो काफी पहले से ही चल रहा था लेकिन उस वक्त की सरकार और

अफसर सरयू राय की बातों को ध्यान से सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे। मौसम क्या

बदला सारे लोगों के तेवर बदल गये। एक बार शिकायत क्या कर दी, चीफ सेक्रेटरी से

लेकर नीचे तक घनाघना गया। इसे कहते हैं मौसम बदलने से तेवर बदलना जाना।

काफी दिनों बाद उस गीत की याद आ रही है, जो किसी फिल्म का गीत नहीं होने के बाद

भी काफी लोकप्रिय हुआ था और अब भी है। इसे यादगार बनाने वाले जगजीत सिंह जी

भले ही इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज में गाया हुआ यह गीत अमर हो गया

है। इस गीत को लिखा था प्रसिद्ध शायर अमीर मिनाई ने और इसे अपने सुरों में खुद

जगजीत सिंह जी ने ही ढाला था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

सरकती जाये है रुख से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता आहिस्ता

जवां होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा

हया यकलख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता

सवाल-ए-वसल पे उनको उदू का खौफ़ है इतना

दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क है इतना

इधर तो जल्दी-जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता

वो बेदर्दी से सर काटें अमीर और मैं कहूँ उनसे

हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता

शब-ए–फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो

कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब, आहिस्ता आहिस्ता

तो भइया हिसाब करने की बात आहिस्ता आहिस्ता कौन कर रहा है, इसे भी देख समझ

लीजिए बड़े गौर से। जो असली माल दबाकर बैठे हैं, वे सारे के सारे दिल्ली भाग जाने के

लिए बेताब हैं। मानों दिल्ली के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने से वह गंगा स्नान कर लेंगे

और जब तक वह लौटेंगे उनके सारे पाप धुल चुके होंगे। लेकिन भाई साहब अइसा नहीं

होता है। एक बार फाइल बनी तो वह फाइल जिंदा रहती है भले ही आदमी मर जाए लेकिन

उसके दस्तखत तो समाप्त नहीं होते। ऊपर से जो चिढ़े-कूढ़े लोग हैं वे सारे दस्तावेजों की

कॉपी अपने पास सुरक्षित रखते हैं। कुछ ने तो बाद में काम आने के लिए इन दस्तावेजों को

पुराने एक हजार के नोट की तरह मढ़ाकर फ्रेम में रख लिया होगा ताकि कोई शब्द हल्का

न पड़ जाए।

पिछली सरकार के प्रताड़ित लोग अब सदन में मजे ले रहे हैं

लो भइया पहले जिन मुद्दों पर पुरानी सरकार खुद को बार बार पूरा बेदाग बताती थी वह

सरकार अब डिफेंसिव नजर आने लगी है। अजीब बात यह है कि पिछली सरकार में मंत्री

और विधायक रहे लोगों में से कई लोग दोबारा भी जीतकर विधानसभा में पहुंचे हैं।

सदन के अंदर सरयू भइया का हमला हो रहा है तो इनमें से कई पुराने चेहरे मजे लेते नजर

आ रहे हैं। यानी बेचारे रघुवर दास की कुर्सी क्या गयी सारे ने मुंह फेर लिया। अब देखना है

कि इसी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पिछली सरकार के प्याज के छिलके किस तरीके से सरकती

जाए रुख से नकाब होता जाता है। मजेदार बात यह है कि भाजपा जिन नेताओं को नीचा

दिखाना चाहती थी, वह न चाहते हुए भी उभरकर ऊपर आ रहे हैं। जिन्हें पूरी ताकत से

कंधा लगाकर ऊपर चढ़ाने की कोशिश हुई थी, वे बेचारे गर्त में चले जा रहे हैं। शायद इसी

लिए कहा गया है कि इस सरकती जाए रुख से नकाब से बचना है तो अपने आस-पास

चमचा नहीं समझदार आदमी भी रखना चाहिए। रघुवर भइया इसी में चूक गये। लेकिन

यह उनकी कोई पहली गलती नहीं है। पहले भी वह पावर में आने के साथ साथ कुछ ऐसा

तेवर बना लेते थे कि उनके अपने ही उनसे दूर चले गये। अब सरकती जाए रुख से नकाब

में क्या कुछ छिलका उतरता है वह देखते रहिए। कंबल से लेकर बिजली और टेंडर से लेकर

नक्सली लेवी तक के सारे मामलों का रिश्ता कहां से कहां तक जुड़ता है। साथ ही बकोरिया

जैसे नरसंहार और फर्जी नक्सली आत्मसमर्पण का मामला तो पहले से ही जगजाहिर है।

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