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बालू में छिपकर हमला किया करता था विशाल समुद्री कीड़ा

  • समुद्री तल में छिपा रहता था यह प्राणी

  • सुरक्षित फॉसिल्स से आकार का पता चला

  • जबड़ा और दांत बहुत मजबूत हुआ करता था

  • एशिया के इस विलुप्त जीव के फॉसिल्स पर शोध हुआ है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः बालू में छिपकर रहता था, वह भी समुद्र के तल पर। जब कभी कोई मछली या दूसरा

शिकार उसके करीब आता था तो छिपा हुआ यह विशाल कीड़ा हमला करता था। कई

तरीके से शोध करने के बाद वैज्ञानिक इस जीव के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुंच पाये हैं।

जो अवशेष मिले हैं, उसके मुताबिक यह कीड़ा आकार में दस फीट तक लंबा हो जाता था।

जाहिर है कि समुद्री तल पर बालू के अंदर छिपे होने की वजह से शिकार उसके होने का

पता भी नहीं लगा पाते थे। जब कोई मछली इसके इलाके में तैरती हुई आती थी तो उसपर

हमला होता था। कीड़े के फॉसिल्स के अध्ययन से यह भी स्पष्ट हो गया है कि उसके जबड़े

मजबूत और दांत बहुत नुकीले थे। इस वजह से एक बार पकड़ में आने के बाद किसी

शिकार का बच पाना मुमकिन नहीं था। लेकिन किन्हीं कारणों से यह प्रजाति अब विलुप्त

हो चुकी है। वैज्ञानिकों पर द्वारा किये जाने वाले शोध संबंधी खनन के दौरान उनके

अवशेष मिले थे। पहली बार बेहतर अवस्था में संरक्षित अवशेष मिलने की वजह से उसके

बारे में अधिक जानकारी मिल पायी है। इसी आधार पर यह भी पता चल पाया है कि बालू

में छिपकर हमला करने वाला यह जीव आकार में दस फीट लंबा हुआ करता था।

आकार में दस फीट तक लंबा होता था

इसी आदत की वजह से वैज्ञानिकों ने इस विलुप्त जीव का नाम सैंड स्ट्राइकर्स यानी बालू

में छिपकर रहने के बाद अंदर से हमला करने वाला रखा है। इन जीवों के होने तथा उनकी

जीवन पद्धति के बारे में एक विस्तारित शोध प्रबंध जर्नल साइंटिफिक रिपोर्टस में

प्रकाशित की गयी है।

अनुमान लगाया गया है कि यह विलुप्त प्राणी करीब बीस लाख वर्ष पूर्व पृथ्वी में मौजूद

था। जो बाद मेंकिन्हीं कारणों से गायब हो गया लेकिन उसकी प्रजाति के दूसरे जीव मौजूद

हैं।

बालू में छिपकर हमला करने वाले के अवशेष ताइवान से मिले हैं

उत्तरी ताइवान के इलाके में पाये गये अवशेषों के आधार पर उनके बार में अधिक

जानकारी मिली है। फॉसिल्स के आधार पर वैज्ञानिकों ने उनके थ्री डी मॉडल भी तैयार

किये हैं। तब जाकर यह बात समझ में आयी है कि वे आकार में इतने बड़े थे और किस

तरीके से अपना शिकार किया करते थे। इसके पहले भी जो अवशेष पाये गये थे वे भी

आकार में छह फीट लंबे और एक ईंच चौड़े थे। अब माना जा रहा है कि यह कीड़ा उस काल

में पृथ्वी पर मौजूद था जब पृथ्वी का यह भाग पानी में डूबा हुआ था।

उस वक्त अधिकांश धरती पर पानी ही पानी था

वर्तमान में भी इस सैंड स्ट्राइकर्स की प्रजाति मौजूद हैं। इसका पता जो इंग्लैंड के ब्लू रीफ

एक्वेरियम में वर्ष 2009 में चला था। वहां रखी मछलियों के अचानक गायब हो जने की

वजह से वहां के लोग हैरान था। बाद में बहुत गहराई से अध्ययन करने के बाद पता चला

कि वहां एक सैंड स्ट्राईकर भी है जो मौका देखकर मछलियो को अपना शिकार बना रहा है।

वर्ष 2013 में वैज्ञानिक मासाकाजू नारा जब ताइवान के इलाके में शोध कर रहे थे तो

उन्होंने ऐसे आकार के फॉसिल्स दिखे थे। वह सभी अंग्रेजी शब्द एल के आकार में सुरक्षित

थे। फॉसिल्स मिलने के बाद पहले यह समझा गया था कि यह शायद बहुत बड़े आकार की

झिंगा मछली (श्रींप) के अवशेष हैं। लेकिन गहराई के अध्ययन में यह धारणा गलत

साबित हुई। नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक एक कर उसके गुणों का

पता चलाया। जब जाकर यह पता चल पाया कि यह शिकार के लिए समुद्र के तल में

मौजूद बालू के अंदर खुद को छिपा लेता था। अभी भी समुद्री तल पर इसी तरीके से कई

अन्य प्राणी शिकार किया करते हैं, जो खुद को बालू में छिपकर रहने के बाद शिकार के

करीब आने का इंतजार करते हैं।

अवशेष पहले भी मिले थे लेकिन पुष्टि अब जाकर हुई है

इस प्रजाति के प्राणियों फॉसिल्स मौजूद होने के बाद भी उनके बारे में प्रामाणिक तौर पर

वर्ष 2017 में पुष्टि हो पायी थी और यह माना गया था कि यह कोई और ही प्रजाति के

प्राणी के अवशेष हैं। ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक जैकब विंथेर कहते हैं कि सैंड

स्ट्राइकर्स की यह प्रजाति किसी रेंगने वाले कीड़े की संरचना वाली है। लेकिन आकार में

काफी बड़ा होने की वजह से उनके शिकार की क्षमता अत्यधिक होती थी क्योंकि उनके

पास मजबूत जबड़े और नुकीले दांतों की श्रृंखला थी। शोध से पता चला है कि शरीर से

काफी नर्म होने के बाद भी उनके दांत इतने पैने और मजबूत थे कि वे किसी मजबूत

शिकार को भी छिन्न भिन्न करने की क्षमता रखते थे।

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