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नगर निगम में फिर से सक्रिय है साजिशकर्ताओं का गिरोह

  • पूर्व सरकार में ही सक्रिय थे यही धंधेबाज

  • बिल्डिंग नक्शा पास करने में खूब माल कमाया

  • टाउन प्लानर अपने अपराध मिटाने की कोशिश में

  • सीबीआई और निगरानी में रखे हुए हैं दस्तावेज

  • ऐसे कई मामलों पर चल रही अदालत में सुनवाई

संवाददाता

रांचीः नगर निगम में फिर से उनलोगों की चांदी हो गयी है जो पूर्व की रघुवर दास

सरकार में भी मजे काट रहे थे। दो बहुचर्चित मामलों में आज तक सही फैसला नहीं होने

की वजह से यह मामले अदालत में काफी समय से लंबित हैं। चूंकि यह दोनों मामले

रघुवर दास सरकार के चहेते लोगों के हैं, इसलिए उन्हें फायदा दिलाने के लिए लगातार

साजिशें होती रही है। इनमें से कई मामले सीबीआई और निगरानी के पास पहले से ही

लंबित हैं। जिन गड़बड़ियों का पता आम आदमी को अपनी समझदारी से चल रहा है,

उन्हें नगर निगम के अधिकारी समझने के लिए तैयार नहीं है। सूत्रों की मानें तो

निगरानी और सीआईडी में जांच को रोकने में अनुराग गुप्ता ने महत्वपूर्ण भूमिका

निभायी थी। दूसरी तरफ खुद वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी पिछली सरकार के

कार्यकाल में मॉनसून सत्र के दौरान इन मामलों को उठा चुके हैं। उन्होंने भी सीबीआई

जांच की मांग की थी। सीबीआई पंद्रह साल की गड़बड़ियों की जांच कर रही है।

इनमें से एक मामला गोपाल कॉंप्लेक्स के पड़ोस का है। जिसमें हरि नारायण

लाखोटिया ने अपनी बिल्डिंग के पार्किंग पर कब्जा किये जाने की शिकायत की थी।

खुली आंखों से यह अतिक्रमण नजर आने के बाद भी पिछले दस वर्षों से नगर निगम के

लोग इस अवैध कब्जे को नहीं हटा रहे हैं। नहीं हटाने के पीछे पूर्व की रघुवर दास सरकार

का ही प्रभाव है।

नगर निगम में अब भी रघुवर दास का प्रभाव असरदार

दूसरा मामला डोरंडा के गौरीशंकर नगर का है। यहां श्री दास के कार्यकाल में प्रेस

सलाहकार रहे अजय कुमार और उनके पड़ोसी के विवाद का है। खुली आंखों से देखने पर

भी यह नजर आ जाता है कि पड़ोसी के घर के इलाके में अजय कुमार के परिवार ने

छज्जा और पाइप निकाल लिया है। यह विवाद बार बार सिर्फ इस वजह से उलझाया जा

रहा है क्योंकि नियमतः छज्जा और पाइप तोड़ने का आदेश कोई देना नहीं चाहता।

हाल के दिनों में इन दोनों ही मामलों में फिर से पुरानी गलतियों को सही ठहराने की

साजिशें वे लोग ही कर रहे हैं, जो सीबीआई और निगरानी की जांच में पहले ही दोषी

पाये जा चुके हैं। नये सिरे से गलत फैसला को सही ठहराये जाने की साजिशों की वजह

से वहां फाइलों को चोरी भी हो चुकी है। दूसरी तरफ अन्य अदालतों और जांच एजेंसियों

के पास मौजूद दस्तावेजों से यह प्रमाणित हो जाता है कि दोनों ही मामलों में नगर

निगम के अधिकारियों की मिलीभगत रही है।

गोपाल कॉंप्लैक्स के पास बने चंद्रलोक अपार्टमेंट के मामले में नीचे की पार्किंग का

स्थल अतिक्रमण करने का मामला ही बड़ा रोचक है। इसमें नक्शा पास करने वाले कई

अधिकारी फंसते नजर आ रहे हैं। जिस पार्किंग का सौदा बिल्डर के साथ जमीन मालिक

का हुआ है, उस पार्किंग के आधे हिस्से को गोल करने के बाद चौथे तल्ले के निर्माण को

जायज ठहराने की साजिश हुई है।

खुली आंखों से गलत दिखता है पर अधिकारियों को नहीं

डोरंडा के मामले में नये टाउन प्लानर ने अपनी पुरानी गलतियों को छिपाने के लिए नये

तथ्य गढ़ने शुरु कर दिये हैं। पता चला है कि अपनी गलती को छिपाने के लिए टाउन

प्लानर ने किसी दूसरे जूनियर इंजीनियर से ही मामले की जांच कराने की तैयारी कर

ली है। टाउन प्लानर गजानन राम ने जिस जूनियर इंजीनियर को इस मामले की नये

सिरे से जांच की जिम्मेदारी सौंपी है, वह उस इलाके के प्रभार में भी नहीं है।

दूसरी तरफ इस बात की भी चर्चा है कि शहर में भवनों के निर्माण में हाईकोर्ट द्वारा की

गयी टिप्पणी की वजह से निगम की कुछ लोग अपनी पुरानी गलतियों को छिपाने के

लिए भी नये नये तथ्य गढ़ रहे हैं। उल्लेखनीय है कि जाली नक्शा के आधार पर की

गयी हेराफेरी के सबूत भी मौजूद हैं। इसके साथ ही शहर के कई अन्य आलीशान भवनों

का नक्शा पास करने में की गयी गड़बड़ी को भी छिपाने का भरसक प्रयास चल रहा है।

इनसे अलग हटकर बात करें तो लालपुर चौक पर बने बुटाला के मॉल की कहानी कुछ

ऐसी है कि जमीन मालकिन ने इसे बेचा नहीं है। इसके बाद भी वहां मॉल बनकर तैयार

हो गया है। चर्चा है कि यह बिल्डर अमित शाह का करीबी है।

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