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रुसी वैक्सिन अब 12 अगस्त को सामने आने की चर्चा

  • काफी देर से दुनिया को दी वैक्सिन की जानकारी

  • दूसरे चरण के ट्रायल के बाद फिर चुप्पी साध ली

  • सोशल मीडिया में इसके खिलाफ बनाया माहौल

  • अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों में माहौल

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः रुसी वैक्सिन अब तक बाजार में नहीं आया है। लेकिन उसके आने के पहले ही

अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों में सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ प्रचार प्रारंभ हो

गया है। इससे समझा जा सकता है कि अब कोरोना संकट में भी चिकित्सा जगत अपने

अपने व्यापारिक हितों को ही प्राथमिकता देने का काम कर रहा है। इसमें नुकसान सिर्फ

आम आदमी का है, जिसे सच का पता नहीं चल पा रहा है। दूसरी तरफ वैश्विक आपदा के

नाम पर चिकित्सा जगत से प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर जुड़े लोग इस संकट में भी पैसा

बनाने का धंधा चला रहे हैं।

रुसी वैक्सिन के बारे में चर्चा है कि यह इसी सप्ताह यानी 12 अगस्त को औपचारिक तौर

पर सबके सामने आ सकता है। इसके दूसरे चरण का  क्लीनिकल ट्रायल संपन्न होने तक

की जानकारी दी गयी थी। उसके बाद रुसी वैज्ञानिकों ने फिर से चुप्पी साध ली थी। सिर्फ

वहां के स्वास्थ्य मंत्री ने इतना भर कहा था कि सारी मेडिकल और कानूनी औपचारिकताएं

पूरी करने का काम चल रहा है। यह काम पूरा होने के बाद ही इस वैक्सिन को औपचारिक

तौर पर सबके सामने लाया जाएगा। वैसे उन्होंने इसी क्रम में यह भी साफ कर दिया था

कि रुसी वैक्सिन के इस सप्ताह सबके सामने आने के बाद भी उसके व्यापारिक उत्पादन

में अभी समय लगेगा और सब कुछ ठीक रहा तो अगले माह यह वैक्सिन दुनिया को

व्यापारिक तौर पर उपलब्ध हो सकती है।

रुसी वैक्सिन भारत कैसे आयेगा इस पर जानकारी नहीं

वैसे अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि रुसी वैक्सिन के भारत में उत्पादन अथवा

आपूर्ति पर दोनों सरकारों के बीच कोई बात चीत हुई भी है अथवा नहीं। दूसरी तरफ अन्य

बड़ी कंपनियों और संस्थानों ने अपने यहां परीक्षण जारी रखने के दौरान ही भारत में इसके

व्यापक उत्पादन के लिए पहले से ही तैयारियां कर ली है।

रुसी वैक्सिन को गामालेई रिसर्च इंस्टिट्यूट और रुस के रक्षा मंत्रालय के संयुक्त प्रयास से

तैयार किया जा रहा है। इसकी सूचना भी दुनिया को काफी देर से मिली थी क्योंकि

परीक्षण प्रारंभ करने के काफी दिनों बाद रुस की तरफ से यह एलान किया गया था कि वह

भी कोरोना वैक्सिन बनाने की दिशा में काम कर रहा है। रुस ने इसकी घोषणा प्रथम चरण

के क्लीनिकल ट्रायल के सफल होने के एलान के साथ की थी।

अब अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों में अभी से ही इसके खिलाफ माहौल बनाने का

काम सोशळ मीडिया में प्रारंभ हो चुका है।  जाहिर है कि यह बताता है कि पश्चिमी देशों में

एक लॉबी ऐसी भी है, जिसे रुसी वैक्सिन के पहले आने से आपत्ति है। बिना जांच के

अथवा वैक्सिन के बाजार में आने के पहले ही उसके खिलाफ माहौल बनाना ही इसे साबित

कर देता है। गामालई संस्थान के निदेशक एलेकजेंडर जिंट्सवर्ग ने कहा कि उनकी

वैक्सिन के काम करने की संरचना एडिनोवायरस की पद्धति पर है। यह मूल वायरस के

ऊपरी आवरण की नकल तैयार कर असली वायरस को आगे बढ़ने से रोक देता है। उनके

मुताबिक इस रुसी वैक्सिन से किसी को कोई नुकसान अथवा साइड एफेक्ट भी नहीं होना

है क्योंकि इन सारे विषयों की जांच परख पहले ही कर ली गयी है।

डॉ एंथोनी फॉसो ने कहा क्या वाकई वैक्सिन बना रहे हैं चीन और रुस

दूसरी तरफ अमेरिका के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ एंथोनी फॉसी का मत है कि क्या वाकई चीन

और रूस के वैज्ञानिक वैक्सिन बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि वहां के वैज्ञानिकों ने इस बारे

में बहुत अधिक जानकारी नहीं दी है इसलिए ज्यादा कुछ पता नहीं है। लेकिन इन

वैक्सिनों को किसी को लगाने से पहले इसकी पूरी जांच हो जानी चाहिए। ताकि वैश्विक

स्तर पर वैक्सिन के धड़ल्ले से इस्तेमाल की वजह से कोई दूसरा संकट नहीं आये। रुस ने

अपने यहां वैक्सिन के इस्तेमाल की प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर दिया है। वहां के उप

स्वास्थ्य मंत्री ओलेग ग्रीडनेव ने कहा कि वैक्सिन की हर तरीके से जांच करने के बाद ही

उसे किसी को लगाया जाएगा। लेकिन यह पहले से तय है कि इसका लाभ मेडिकल

चिकित्सा से जुड़े लोगों और अधिक उम्र के लोगों को सबसे पहले दिया जाएगा क्योंकि

उन्हें इस बचाव पद्धति की अधिक आवश्यकता है। इनलोगों को वैक्सिन दे लेने के बाद ही

दूसरों तक यह वैक्सिन पहुंचायी जाएगी


 

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