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अंतरिक्ष का कचड़ा साफ करने के लिए रूस ने तैयार की तकनीक







  • संकेत पाते ही खुद को भाप बना लेगा उपग्रह

  • रूसी सैटेलाइट खुद ही अंतरिक्ष को साफ रखेगा

  • बीस हजार कचड़े चक्कर काट रहे हैं पृथ्वी के ठीक ऊपर

  • नये अंतरिक्ष अभियानों के लिए यह कचड़ा बन गया है खतरा


प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः अंतरिक्ष का कचड़ा अब अंतरिक्ष अभियानों के लिए खतरा बन गया  है।

महाकाश में इस किस्म के कचड़़े का अंबार लगा हुआ है। यह सिर्फ इंसानों द्वारा फैलाया गया कचड़ा ही है।

अंतरिक्ष अनुसंधान के क्रम में जितने भी सैटेलाइट वहां भेजे गये थे। वे सभी इसी कचड़े को बढ़ा रहे हैं।


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जिन सैटेलाइटों का उपयोग बंद हो गया है, वे भी कचड़ा बनकर चक्कर लगा रहे हैं।

इसके अलावा किन्हीं कारणों से ध्वस्त हुए सैटेलाइट के टुकड़े भी इसी तरह से मंडराते फिर रहे हैं।

इन तमाम कचड़ों से बचकर निकलना भी अब अंतरिक्ष अभियानों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

रूस ने इसी परेशानी से मुक्ति पाने का नया तकनीक आजमाने का काम प्रारंभ किया है।

रूस ने ऐसे सैटेलाइट तैयार किये हैं, जो अपना काम पूरा होने के बाद खुद को ध्वस्त कर लेंगे।


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इस क्रम में वह कुछ इस तरीके से नष्ट होंगे ताकि अंतरिक्ष में और कचड़ा एकत्रित नहीं हो।

इस तकनीक से पहले से मंडराने मृत सैटेलाइटों को भी समाप्त किया जा सकेगा।

इससे धीरे धीरे अंतरिक्ष में कचड़े का यह खतरा कम किया जा सकेगा।

खुद रूस और पूर्व के सोवियत संघ के अंतरिक्ष अभियान के दौरान भी इस श्रेणी के अनेक बेकार उपकरण अंतरिक्ष में मंडरा रहे हैं।

सुनने में बहुत आसान लगने के बाद भी हमें यह समझ लेना चाहिए कि इन कचड़ों के अंतरिक्ष में घूमने की गति करीब साढ़े सत्रह हजार माइल प्रति घंटे की है।

यानी इस तेज गति से टकराने वाला कोई भी टुकड़ा किसी भी अंतरिक्ष यान को ध्वस्त कर सकता है अथवा भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

इस तकनीक को आगे बढ़ाने वाले वैज्ञानिकों ने खुद माना है कि अंतरिक्ष में रूस और पूर्व सोवियत संघ के

अभियानों के दौरान छूटे ईंधन के टैंक, परमाणु ऊर्जा चालित सैटेलाइट अथवा काम के दौरान

वहां छूट गये अन्य उपकरण भी हैं।

अंतरिक्ष का कचड़ा भावी अनुसंधान यानों के लिए खतरा है




इनमें से कुछ तो अंतरिक्ष में प्रयोग करते वक्त अंतरिक्ष यात्रियों के हाथों से छूट गये थे।

जिस वजह से उन्हें वापस लाना संभव नहीं हो सका है।

यह सारा कुछ महाकाश में जहां-तहां मंडरा रहा है। इनमें से अधिकांश ठीक पृथ्वी के वायुमंडल के ऊपर ही चक्कर काट रहे हैं।

यह कचड़ा भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए लगातार खतरा बढ़ाता जा रहा है।


अजूबा खबर लेकिन है पूरा सच


अब रूस के वैज्ञानिक वैसे सामान इस्तेमा करने जा रहे हैं जो अंतरिक्ष में एक खास अवस्था में पहुंचने के बाद पहले तरल और बाद में वाष्प बन जाएंगे।

इसके भाप बन जाने की वजह से उनसे इस किस्म का ठोस कचड़ा इकट्ठा ही नहीं होगा। वैज्ञानिक इस श्रेणी के अंतरिक्ष यानों की डिजाइन कुछ इस तरीके से बना रहे हैं ताकि यह खुद को नष्ट करने के पहले वहां मौजूद कचड़ों का कुछ हिस्सा अपने साथ ही नष्ट करता चले।

इससे धीरे धीरे अंतरिक्ष में मंडराते कचड़ों का ढेर कम होने लगेगा।

इस तकनीक में यह उपाय किया गया है कि सुदूर महाकाश में चक्कर काटते सैटेलाइट को पृथ्वी से संकेत भेजकर नष्ट होने की प्रक्रिया को प्रारंभ किया जा सकेगा।

यानी जब पृथ्वी से संकेत दिया जाएगा, तभी यह सैटेलाइट खुद को नष्ट करेगा।

बीस हजार ऐसी चीजों हैं तो तेज गति से घूम रही हैं




वर्तमान में खगोल वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि पृथ्वी के ठीक बाहर इस किस्म के करीब बीस हजार ऐसे वस्तु चक्कर काट रहे हैं, जिनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है।

रूस के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक ऐसे कचड़ों की संख्या करीब सोलह हजार है।

इसमें से 87 प्रतिशत तो पहले के अंतरिक्ष अभियान के कचड़े ही हैं।

इनकी संख्या अत्यधिक हो जाने की वजह से अब नये महाकाश यान भेजने में दिक्कत जा रही है

और उन कचड़ों से नये यान की टक्कर ना हो, इसका खास ख्याल रखना पड़ रहा है।

इस बीच रूस ने एक नया सैटेलाइट भी अंतरिक्ष में भेज दिया है।

इस सैटेलाइट के बारे में पता है कि यह रूस की सैन्य और सामान्य सेवाओं के लिए एक साथ काम करेगा।

इसे ग्लोनास एम नाम दिया गया है। सुबह 9.23 मिनट पर छोड़े गये इस उपग्रह को नियंत्रण कक्ष से नियंत्रित किया जा सकेगा।

लेकिन इसके साथ ही सिर्फ सैन्य उपयोग के लिए रूस ने एक और सैटेलाइट भी छोड़ा है।

उस सैन्य उपग्रह के बारे में विस्तार से कोई जानकारी नहीं दी गयी है।


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