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ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सरकार को और ध्यान देना होगा




ग्रामीण अर्थव्यवस्था में समान रुप से बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है। दरअसल कोरोना संकट के दौरान रुकी पड़ी अर्थव्यवस्था की गाड़ी अब धीरे धीरे गति पकड़ रही है। इसके बीच ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में असमान बढ़ोत्तरी के संकेत मिलने लगे हैं, जो शुभ संकेत नहीं है।




इस पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि देश को आर्थिक संकट से उबारने में औद्योगिक गतिविधियों के मुकाबले ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अधिक योगदान है।

सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि ग्रामीण उपभोक्ता मांग में ठहराव आ गया है। रोजमर्रा के सामान (एफएमसीजी) की ग्रामीण बिक्री में वृद्धि अगस्त और सितंबर में 5 फीसदी से नीचे रही है।

दोपहिया की बिक्री अपने वर्ष 2019 के स्तरों से दूर है। छोटे शहरों में टेलीविजन की बिक्री भी घटी है। पिछले ढाई साल के दौरान कृषि ऋण में महज 19 फीसदी इजाफा हुआ है।

इसके अलावा श्रम की अतिरिक्त आपूर्ति करीब एक करोड़ है, जिसे इस समय रोजाना 210 रुपये में काम करना पड़ रहा है। सितंबर 2021 में दोपहिया की खुदरा बिक्री सुधरकर जनवरी 2019 के स्तरों के केवल 75 फीसदी पर पहुंची है।

दोपहिया, विशेष रूप से गियर वाली मोटरसाइकलों की करीब आधी बिक्री ग्रामीण क्षेत्रों में होती है। इस साल जनवरी से जुलाई के बीच एफएमसीजी उत्पादों की बिक्री में वृद्धि 12 फीसदी से ज्यादा घटी है।

अग्रणी ई-कॉमर्स कंपनियां ज्यादातर ग्रामीण पिन कोड पर सामान पहुंचा रही हैं। इसलिए ई-कॉमर्स के जरिये खपत में अच्छी वृद्धि हो सकती है, लेकिन इसे साबित करने के लिए फिलहाल कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

उपभोक्ता सामान की बिक्री महामारी से पहले के स्तरों के 92 फीसदी पर पहुंच गई है। ग्रामीण निवेश मांग हमेशा की तरह मजबूत अगर खपत कमजोर पड़ रही है तो ग्रामीण निवेश 2021 में बढ़ रहा है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था से ही संभलती है भारतीय अर्थव्यवस्था

महामारी के बावजूद वर्ष 2019 से दो साल में ट्रैक्टरों, खाद्य ढोने वाले ट्रेलरों और हार्वेस्टरों की बिक्री 30 फीसदी से अधिक बढ़ी है।

वर्ष 2019 में हर महीने औसतन 370 हार्वेस्टरों की बिक्री होती थी, जो 2020 में बढ़कर 580 प्रति महीना और 2021 में 820 प्रति महीना हो गई है।

वाहन आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2019 में हर महीने 30,000 से 45,000 नए ट्रैक्टर पंजीकृत हो रहे थे। यह आंकड़ा 2020 में बढ़कर 40,000 से 60,000 हो गया।




वर्ष 2021 में नए ट्रैक्टरों का पंजीकरण हर महीने 45,000 से ऊपर रहा है। इस साल जुलाई में पंजीकरण 74,000 और अगस्त मेें 65,000 रहे। इससे महामारी से पहले के मुकाबले अच्छी वृद्धि का पता चलता है।

वर्ष 2019 में खाद्यान्न ढोने वाले ट्रेलरों की मासिक बिक्री 3,000 से कम थी। यह आंकड़ा महामारी के बाद 4,000 से ऊपर बना हुआ है। गैर-कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी निवेश बढ़ रहा है।

वाहन आंकड़ों के मुताबिक निर्माण उपकरणों की खुदरा बिक्री जनवरी 2019 से 61 फीसदी बढ़ी है। कृषि इनपुट का अहम हिस्सा माने जाने वाले उर्वरकों की बिक्री खरीफ बुआई की जून से अगस्त अवधि में 1.73 करोड़ टन के स्तर पर सपाट रही है।

लेकिन मनरेगा के तहत काम की मांग से बेहतर संकेत क्या हो सकता है। मनरेगा के तहत काम की मांग औसत से अधिक रही है।

2020 में जब अन्य क्षेत्रों से रोजगार छिन रहा था तब सरकार ने सहारे के रूप में मनरेगा को बढ़ावा दिया था। लेकिन 2021 में इसके तहत काम की मांग और भी बढ़ गई है।

महामारी से पहले की अवधि की तुलना में 2021 में एक करोड़ ज्यादा परिवार हर महीने काम की मांग कर रहे हैं।

पिछली बार भी वैश्विक मंदी की मार को संभाला था इसने

आम तौर पर सितंबर में मनरेगा के तहत परिवारों की काम की मांग कम रहती है। वर्ष 2016 और 2017 के सितंबर महीने में मांग 1 से 1.1 करोड़ थी, जो वर्ष 2018 और 2019 में बढ़कर 1.4 से 1.5 करोड़ पर पहुंच गई।

वर्ष 2020 में 2.4 करोड़ परिवारों ने काम की मांग की। यह आंकड़ा सितंबर 2021 में 2.3 करोड़ के औसत सामान्य से ऊपर रहा।

इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। यह प्रमाणित सत्य है कि अमेरिकी में लोगों द्वारा जब समय पर मकान का कर्ज समय पर नहीं चुकाया गया था तो पूरे विश्व में मंदी छा गयी थी।

भारत अपनी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वजह से ही इस मंदी को आसानी से झेल गया था। अब कोरोना में सब कुछ तबाह हो जाने के बाद फिर से जब देश उठ खड़ा हो रहा है तो देश की अर्थव्यवस्था की इस रीढ़ को फिर से ताकत देने की जरूरत है।

ऐसा इसलिए है कि भविष्य में जब कभी भी फिर से कोई संकट आयेगा तो यह देश को डूबने से बचाने का काम करेगी।



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