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रोहिड़ा के फूल महक बिखेरने लगे हैं राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में

जैसलमेरः रोहिड़ा के फूल प्रकृति की अनुपम देन हैं। खास बात यह भी है कि यह सिर्फ

रेगिस्तानी इलाकों में होते हैं। रेगिस्तान में प्रकृति की अनुपम देन राजकीय पुष्प रोहिड़ा

के फूल अपनी महक बिखेरने लगे हैं। रोहिड़ा के फूलों की सुन्दरता किसी से छुपी नहीं है।

इन फूलों ने इन दिनों खुशबू बिखेरनी शुरू कर दी है। सुखद अनुभूति का एहसास कराने

वाले फूलों की सुगन्ध वर्षों तक महकती रहती है। रोहिड़ा के फूल की इन दिनों बहार छाई

हुई है। राज्य पुष्प के रूप में रोहिड़ा फूल नामांकित है। रोहिड़ा के वृक्ष यद्यपि क्षेत्र में काफी

कम संख्या में हैं, लेकिन केसरिया रंग के फूलों से लदे वृक्ष देखकर लोग मंत्रमुग्ध हो उठते

हैं। जैसलमेर के नहरी इलाकों सहित देवीकोट, फतेहगढ़ और बाड़मेर जिले के चौहटन

धोरीमन्ना में रोहिड़े के पेड़ बड़ी तादाद में हैं। राणीगांव में तो हजारों बीघा जमीन पर

रोहिड़ा के हजारों पेड़ों पर खिलते पुष्प देखकर लगता है मानो वे मुस्करा रहे हों।

नक्काशीदार फर्नीचर की मांग में इसके पेड़ काटे गये हैं

टेकामेला अन्डयूलेटा के नाम से पहचाने जाने वाले इस वृक्ष की बढ़ोत्तरी काफी धीमी गति

से होती है। जानकारी के मुताबिक इसकी उम्र करीब 100 वर्ष तक होती है और अमूमन

आधी उम्र के बाद इसकी लकड़ी परिपक्व होती हैं, लेकिन मांग में बढ़ोत्तरी होने पर इसके

परिपक्व होने से पहले ही इन्हें काट लिया जाता है। नरम जमीन एवं रेतीले धोरों पर पैदा

होने वाला रोहिड़ा अंधाधुंध कटाई एवं आवश्यक संरक्षण के अभाव में विलुप्ति की ओर

अग्रसर हो रहा है। सागवान से महज कुछ ही कम कीमत पर बिकने वाली रोहिड़ा की

लकड़ी नक्काशी के लिए उम्दा किस्म की मानी जाती है।

नक्काशीदार फर्नीचर उद्योग को बढ़ावा मिलने के साथ ही रोहिड़ा की मांग में भी इजाफा

होता गया। मुलायम एवं चमकदार लकड़ी से बने उत्तम फर्नीचर एवं अन्य सामान

आलीशान बंगलों, भवनों एवं विशिष्ट लोगों के घरों की शान में चार चांद लगाते हैं।

रोहिड़ा के फूल काफी समय तक खुशबू बनाये रखते हैं

कम पानी एवं कुछ हद तक रेगिस्तानी माहौल में उत्पन्न होने वाले इस वृक्ष की लकड़ी पर

बारीक नक्काशी एवं कारीगरी हर किसी को आकर्षित कर लेती है। फर्नीचर की क्षेत्र में

मांग बढ़ने से रोहिड़ा के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। दिसम्बर एवं

जनवरी मे इस पर बहार छाने लगती है। फरवरी मार्च में बसंत ऋतु के चलते रोहिड़ा वृक्ष

केसरिया आभा के लिए फूलों से आच्छादित हो जाता है तो लगता है मानो धरा श्रृंगारित हो

गई हो। मार्च में फलियां बन जाती हैं। महीने के अंत तक फलियां पक जाती हैं। इसका

बीज हल्का होने से हवा के जरिए दूसरे स्थान पर पहुंच जाता है। बरसात के मौसम में बीज

अंकुरित हो जाते हैं। रोहिड़ा वृक्ष एक बार ऊगने के बाद काटने के बावजूद अकसर जिंदा

रहता है। रोहिड़ा के पते, फूल एवं फलियां तक भेड़-बकरी एवं ऊंट चाव से खाते हैं। चरवाहों

की नासमझी के चलते बीज से भरी फलियां जानवर उदरस्थ कर लेते हैं। इससे इस वृक्ष

की पैदावार पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर रोहिड़ा को

संरक्षण जरूर प्राप्त है, लेकिन बढ़ती मांग के चलते कारीगर खेत मालिक से मिलकर

सौदा तय कर लेते हैं। दूसरे पेड़ों की अपेक्षा रोहिड़ा के दाम भी कुछ ज्यादा ही मिलते हैं,

इस वजह से खेत मालिक आसानी से रोहिड़ा बेच देते हैं। वृक्ष को काटकर आरा मशीनों

तक पहुचाने में भी कुछ खास समय जाया नही करना पड़ता है। सरकारी रोकथाम के

चलते ये लोग रात में काफी सतर्कता बरतते हैं। रोहिड़ा के फूलों का अंदाज ही निराला है।

प्रकृति ने इनके फूलों को भी अनुपम सुन्दरता प्रदान की है, लेकिन फूलों में भी कुछ

प्रजातियां ऐसी हैं जो सुन्दरता के साथ अपनी खुशबू भी बिखेरती हैं।


 

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