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निजता के अधिकार पर बेहतर और सार्थक बहस जरूरी

निजता के अधिकार पर हाल के दिनों में इसलिए अधिक बहस हो रही है क्योंकि व्हाट्सएप

ने अपनी नीतियों में सुधार की घोषणा की थी। इस पर जो बवाल मचा उसकी वजह से

फिलहाल कंपनी ने अपनी नीतियों में बदलाव को फिलहाल स्थगित करने का एलान किया

है। लेकिन निजता का उल्लंघन होने की जानकारी के बाद अनेक उपभोक्ताओं ने नीति

स्थगित होने के पहले ही खुद को सिग्नल और टेलीग्राम में बदल लिया है। लोगों की

नाराजगी की वजह से समझने की जरूरत है क्योंकि व्हाट्सएप ने परोक्ष तौर पर

उपभोक्ता की जानकारी को अपनी मूल स्वामित्व वाली कंपनी फेसबुक के जरिए अपने

काम में इस्तेमाल करने की बात कही थी। यूं तो व्हाट्सएप ने यह स्पष्ट कर दिया था कि

वह सिर्फ व्यापारिक उपभोक्ताओं के लिए यह बदलाव करने जा रही है। लेकिन कंपनी के

इस एलान के बाद भी गूगल सर्च पर व्हाट्सएप का इस्तेमाल करने वालों का नंबर नजर

आना, यह साबित कर देता है कि कंपनी पहले से ही निजता के अधिकारों की सुरक्षा नहीं

कर पायी है। नई सेवा शर्तों ने इसका इस्तेमाल करने वाले तमाम लोगों के बीच डेटा की

निजता पर बहस दोबारा शुरू कर दी है। व्हाट्सएप दुनिया की सबसे लोकप्रिय इंस्टैंट

मैसेज (आईएम) सेवा है और दो अरब से अधिक लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन

पिछले एक सप्ताह में वह इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की होड़ में सिग्नल और टेलीग्राम

से तेजी से पिछड़ती हुई नजर आ रही है। फेसबुक की इस अनुषंगी कंपनी ने गत वर्ष

कारोबारी उपभोक्ताओं के लिए एक एपीआई जारी किया था और वह इस समय फिनटेक

भुगतान के काम को गति प्रदान कर रही है। नई शर्तें भारत के 40 करोड़ उपभोक्ताओं के

लिए खासी प्रासंगिक हैं क्योंकि देश में डेटा की निजता को लेकर कोई कानून नहीं है।

निजता का सवाल सिर्फ भारतवर्ष का नहीं है

ऐसे में यहां नई सेवा शर्तों को लागू करना आसान है। बहरहाल कारोबारी संगठन

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने इस पर स्थगन के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना

प्रौद्योगिकी मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुति दी है। नई सेवा शर्तें यूरोपीय संघ में लागू नहीं की

जा सकती हैं क्योंकि ये वहां के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेग्युलेशन (जीडीपीआर) का

उल्लंघन करती हैं। अमेरिका में भी इसे लागू करने में दिक्कत हो सकती है क्योंकि फेडरल

ट्रेड कमीशन तथा कई राज्यों ने फेसबुक के खिलाफ ऐंटी ट्रस्ट केस दायर करने के साथ

कहा है कि व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक की अन्य अनुषंगी कंपनियों को सोशल

नेटवर्क से अलग किया जाए। नई सेवा शर्तें आगामी 8 फरवरी से लागू होनी हैं। इसमें

इस्तेमाल करने वालों के पास यह विकल्प भी नहीं होगा कि वे डेटा साझा करने से इनकार

कर सकें। सन 2016 में व्हाट्सएप ने उन उपयोगकर्ताओं को बाहर रहने का विकल्प दिया

था जो डेटा साझा करने से इनकार कर सकते थे। अपने बचाव में व्हाट्सएप ने कहा है कि

एंड-टु-एंड एन्क्रिप्शन बरकरार रहेगा। यह विभिन्न व्यक्तियों और समूहों के बीच

बातचीत की निजता सुनिश्चित करता है। यानी कारोबारी खाताधारकों द्वारा बातचीत में

उल्लिखित संवेदनशील सामग्री बाहर जा सकती है। व्हाट्सएप डेटा और मेटाडेटा का बड़ा

हिस्सा जिसमें लोकेशन, हैंडसेट की जानकारी, कनेक्शन, सभी संपर्क आदि पहले ही

फेसबुक के साथ साझा किए जाते हैं। जब ये तमाम डेटा फेसबुक के मेटाडेटा से उसके

अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से जुड़ते हैं तो यह उपयोगकर्ता की पूरी तस्वीर

उसके सामने साफ कर देता है। भारत में व्हाट्सएप का इस्तेमाल कई विद्यालयीन

गतिविधियों के लिए किया जाता है। ऐसे में बच्चों की जानकारी भी इसके पास होगी।

सोशल नेटवर्क की आमदनी का जरिया ही विज्ञापन होता है

सोशल नेटवर्क की 99 फीसदी आय विज्ञापनों से होती है। व्हाट्सएप की आय का स्रोत

बिजनेस एपीआई और विज्ञापन हैं। यह निजी डेटा की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता

है क्योंकि सेवा शर्तें जीडीपीआर के प्रतिकूल हैं। जीडीपीआर को दुनिया का सबसे व्यापक

निजता संरक्षण कानून माना जाता है। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क और

ट्विटर के सीईओ जैक डोरसी समेत कई प्रमुख लोगों ने व्हाट्सएप से दूरी बनाने की

सलाह दी है। दूसरी बात यह कि अन्य आईएम नेटवर्क में इतने लोग नहीं हैं यानी संपर्क

सीमित होता है। तीसरा मसला कॉर्पोरेट के दबाव के रूप में सामने आ सकता है। यदि सेवा

प्रदाता व्हाट्सएप बिजनेस अकाउंट का इस्तेमाल कर रहे हैं तो वे अपने क्लाइंट पर दबाव

बना सकते हैं कि वे भी यहां रहें। ऐसे में कुछ लोग जहां निजता की सुरक्षा चुनेंगे, वहीं कुछ

अन्य इसके आसान होने को प्राथमिकता देंगे। लेकिन यह सारा विवाद यह संकेत देता है

कि अब सरकारी फैसले के पहले ही निजता के अधिकार और सूचना तकनीक पर देश में

व्यापक चर्चा होनी चाहिए।

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