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शोधकर्ता अब चिकित्सीय उपकरणों को विषाणु मुक्त रखना चाहते हैं

  • गंभीर किस्म के रोगियों के संक्रमण का बड़ा कारण
  • चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ा खतरा है यह संक्रमण
  • अनेक बार इसका पता काफी देर से चल पाता है
  • पहले पता चले तो अनेक मरीजों की जान बचेगी
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः शोधकर्ता अब चिकित्सा के काम में आने वाले उपकरणों को विषाणु मुक्त करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह परेशानी काफी समय से डाक्टरों और वैज्ञानिकों को परेशान करती आयी है।

डाक्टरी उपकरणों और मरीजों के निरंतर इस्तेमाल में आने वाले सामानों में इस किस्म का संक्रमण आम बात है।

पहले तो काफी समय तक इस संक्रमण से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को पता नहीं चल पा रहा था।

डाक्टरों को भी इस बात की समझ ही नहीं आयी थी कि दरअसल रोगी को नुकसान उसके पास मौजूद उपकरणों

में मौजूद विषाणुओं की वजह से हो रहा था। इसका पता चलने के बाद अब यह राज भी खुल चुका है कि कई बार

ऑपरेशन थियेटरों में भी इस किस्म का संक्रमण अचानक ही फैल जाता है। इसकी समझ आने के बाद खतरे से बचाने

के लिए ऐसे ऑपरेशन थियेटरों को अविलंब बंद कर दिया जाता है। नये सिरे से उसे विषाणुमुक्त कर लेने के बाद ही

उन्हें फिर से चालू किया जाता है। इस मामले की शोध से जुड़े शोधकर्ता वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे है कि इस श्रेणी

के विषाणुओं में  कैंनडीडा अलबिकांस सबस अधिक नुकसान पहुंचाता है। इस विषाणु से सबसे अधिक खतरा यह होता

है कि जब इसे नहीं पकड़ा जाता तो यह अपनी आबादी तेजी से बढ़ा लेता है। वैसी स्थिति में इस पर नियंत्रण पाना

कठिन हो जाता है। इसका हमला सामान्य तौर पर मरीजों को पेशाब करने के लिए लगाये जाने वाले कैथेटरों में सबसे

अधिक होता है। कई किस्म की बीमारियों में मरीजों को यह कैथेटर लगाये जाते हैं।

शोधकर्ता मरीजों की जान बचाने के लिए इसे खोज रहे हैं

मोनाश विश्वविद्यालय की केमिकल इंजिनियरिंग विभाग की डॉ सिमोन कोरी ने इस शोध को अपनी टीम के साथ

आगे बढ़ाया है। दूसरी तरफ इसी विश्वविद्यालय की प्रो. एना ट्रैवेन ने भी इस पर काम किया है अब तक की शोध में

खास तौर पर कैंनडीडा अलबिकांस पर ध्यान केंद्रित रखा गया था। ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि इस किस्म के

संक्रमण में सबसे अधिक इसकी भूमिका पायी जाती है। गंभीर बीमारी से पीड़ित अथवा प्रतिरोधक क्षमता में कमजोर

मरीजों को कैथेटर लगाये जाते हैं। पेशाब के रास्ते को इसके माध्यम से खोले रखा जाता है ताकि मरीज के शरीर के

अंदर पेशाब जमा नहीं हो। इस किस्म का विषाणु वहां कैथेटर पर एकत्रित होने के बाद उचित रखरखाव नहीं होने की

स्थिति में वहां इनकी आबादी बढ़ने लगती है। आबादी बढ़ने के बाद वे इसी पेशाब के रास्ते से शरीर के अंदर पहुंचकर

आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचा देते हैं। दूसरी तरफ इस संक्रमण का पता नहीं होने की वजह से मरीज का हाल सारा

कुछ ठीक रहने के बाद भी बिगड़ता ही चला जाता है।

शोध के क्रम में यह पाया गया है कि इस प्रजाति के विषाणु जहां रहते हैं, वहां एक पतली सी पर्त बना लेते हैं। इस पर्त की

वजह से वे बाहरी प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं एक बार बाहरी प्रभाव से मुक्त होने के बाद वे तेजी से अपनी आबादी बढ़ा

लेते हैं। शोध प्रारंभ होने के बाद इस किस्म के प्रभाव से मरीजों की मौत का प्रतिशत चालीस प्रतिशत तक पहुंचने का

आंकड़ा सामने आया है। शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि एक बार संक्रमण फैल जाने के बाद दवाइयों का

असर भी इनपर नहीं होता। दवाई का असर नहीं होने की वजह वह पतली पर्त ही है, जिसके नीचे इनकी आबादी तेजी से

बढ़ती चली जाती है।

संक्रमण होते ही संकेत मिल जाए तो बहुत काम आसान होगा

प्रो. ट्रावेन ने कहा कि अगर प्रारंभिक स्तर पर इसका पता चल जाए तो मरीज को संक्रमण मुक्त करने में अधिक

परेशानी नहीं होती। लेकिन संक्रमण का असर अधिक होने की स्थिति में मरीज को दवा देने के बाद भी खतरा बना

रहता है क्योंकि इस किस्म के संक्रमण को दूर करने वाली दवाइयों का असर जब तक हो पाता है तब तक मरीज के

आंतरिक अंग खराब होना प्रारंभ हो जाता है।

इन्हीं आंकड़ों के आधार पर अब शोधकर्ता वैज्ञानिक वह पद्धति विकसित करना चाहते हैं जो संक्रमण होने के तुरंत बाद

इसका संकेत दे सकें। शुरु में ही संक्रमण होने का पता चलने की वजह से उसका तुरंत ईलाज भी किया जाना संभव

होगा। इससे मरीजों को जान बचायी जा सकेगी। साथ ही चिकित्सीय उपकरणों में संक्रमण की चेतावनी मिलते ही

बचाव और संक्रमण मुक्त करने की कार्रवाई प्रारंभ की जा सकेगी।

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