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भाजपा और आजसू के रिश्तों में अब आ सकता है उल्लेखनीय सुधार

  • उपचुनाव में बेरमो सीट पर दावेदारी की रस्साकसी

  • रघुवर हारे तो सुदेश का गुस्सा उतरा

  • दीपक प्रकाश के साथ वार्ता आसान

  • दुमका पर भाजपा का दावा ही तय

संवाददाता

रांचीः भाजपा और आजसू के रिश्तों की कड़वाहट अब समाप्त हो सकती है। दरअसल पूर्व

मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनकी निकटस्थ लोगों ने ही आजसू प्रमुख सुदेश महतो को

इतना नाराज कर रखा था कि दोनों दलों के बीच कई बार अलग होने तक की नौबत आ

गयी थी। अब भाजपा की कमान दीपक प्रकाश के हाथों हैं। इसलिए यह माना जा सकता है

कि पहले से चला आ रहा मनमुटाव अब व्यक्तिगत मधुर रिश्तों की वजह से बेहतर होने

की तरफ अग्रसर होंगे। वैसे भी सुदेश महतो ने चुनाव जीतकर रघुवर दास समर्थकों को वह

राजनीतिक उत्तर दिया है, जिससे नाराजगी कम हुई होगी। दरअसल यह समीकरण आने

वाले दिनों में दो सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर है। स्पष्ट तौर पर दुमका सीट पर

आजसू की कोई दावेदारी नहीं होगी। लेकिन यह लाख टके की बात है कि दुमका सीट पर

भाजपा की तरफ से प्रत्याशी कौन होगा। असली पेंच बेरमो की सीट पर फंस सकता है।

यहां राजेंद्र सिंह के निधन के बाद उप चुनाव होना है जबकि दुमका सीट से खुद हेमंत

सोरेन ने इस्तीफा दिया है।

सामान्य राजनीतिक समीकरण यही बताते हैं कि दोनों ही दलों की तरफ से बेरमो सीट पर

दावेदारी की जाएगी। लेकिन अंतिम निर्णय मिल बैठकर हो सकता है। यह उम्मीद सिर्फ

इसलिए है क्योंकि अब भाजपा के प्रदेश नेतृत्व के साथ संवाद करने में सुदेश महतो नहीं

हिचकेंगे। उनके अपने चुनाव में परोक्ष रुप से रघुवर दास और उनके गुट द्वारा सुदेश को

पराजित करने की हर चाल से वाकिफ होने की वजह से भी सुदेश ने सरकार से स्पष्ट तौर

पर दूरी बना ली थी।

भाजपा और आजसू में दूरी की वजह थे रघुवर दास

पिछले विधानसभा चुनाव में भी प्रदेश स्तर पर सीटों के तालमेल पर कोई फैसला नहीं हो

पाया था। लेकिन गठबंधन को टूटने से खुद अमित शाह ने बचाया था। उनकी पहल पर ही

सुदेश महतो काफी हद तक सामान्य हुए थे। अब नये सिरे से प्रदेश भाजपा में कमान के

हाथ बदलने की वजह से संवाद कायम करने में दिक्कत नहीं आयेगी। वैसे भी लोग मानते

है कि वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश संवाद और संपर्क के मामले में धनी व्यक्ति है।

एक व्यवहार कुशल नेता होने के नाते उनसे सुदेश महतो को बात-चीत करने में कोई

परेशानी नहीं होगी। दूसरी तरफ आजसू खेमा मानता है कि मुख्य विरोधी यानी रघुवर

दास के ही सीन से गायब होने की बाद अब किसी भी समस्या को मिल बैठकर सुलझाया

जा सकेगा


 

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