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रियल एस्टेट में जान फूंकने की कवायद अच्छी पहल







रियल एस्टेट की गतिविधियों में फिर से तेजी आ सकती है।

लेकिन केंद्र सरकार ने इसमें नई जान फूंकने में यह ध्यान रखा है कि इस बार भी इसका लाभ बड़े लोग नहीं उठा ले जाएं।

दरअसल भारतीय बैंकिंग का हाल का इतिहास तो यही बताता है कि इस उद्योग में सरकार की तरफ से

जो पूंजीनिवेश की कोशिशें हुई हैं, वे अंततः बड़े पूंजीपतियों के काम आयी है।

अब आर्थिक मंदी के दौर में इसमें मकान का क्षेत्रफल तय कर सरकार ने कमसे कम एक बंदिश लगाने की कोशिश

की है।

इसका फायदा यह होगा कि बैंक वाले अपनी मर्जी से गड़बड़ी नहीं कर पायेंगे और गड़बड़ी करने की स्थिति में

उनकी गरदन आसानी से फंसने की पूरी गुंजाइश भी रहेगी।

ऐसा किया  जाना जरूरी भी था।

इस उद्योग में सरकार की कड़ाई की आवश्यकता भी थी

बैंकिंग उद्योग में पैसे डूबने की जो घटनाएं घटित हुई हैं, उस बारे में कोई बैंक मुंह खोलने को तैयार नहीं है।

यह शायद भारत में ही संभव है कि जनता का पैसा कहां खर्च हुआ, इसका हिसाब देने के लिए वे बैंक तैयार नहीं हैं,

जिनका कारोबार ही जनता के पैसों से चलता है।

दरअसल इसके पीछे की कहानी बड़े बकायेदारों के पास फंसा बैंकों का लाखों करोड़ रुपया है।

इस बकाये के बारे में सार्वजनिक तौर पर चर्चा तो होती है लेकिन औपचारिक तौर पर कोई कुछ नहीं कहता है।

जिन्हें इस बारे में बयान देना चाहिए, वे चुप्पी साधे हुए हैं।

दरअसल सामर्थ्य़ से अधिक  पैसे का कर्ज लेने वालों ने कर्ज लेते वक्त अपनी आर्थिक हैसियत के मामले में

दस्तावेजों की हेराफेरी की है, यह स्पष्ट है।

जो स्पष्ट नहीं है वह यह है कि इस गड़बड़ी को बैंकों के अधिकारियों ने भी प्रोत्साहित किया है।

भले ही इसके एवज में उन्हें निजी लाभ हुआ हो अथवा नहीं। अब रियल एस्टेट के माध्यम से आर्थिक

गतिविधियों में तेजी लाने का केंद्र सरकार का प्रयास सराहनीय है।

इसके जरिए प्रत्यक्ष रोजगार के नये साधन उपलब्ध होंगे, यह सर्वविदित सत्य है।

रियल एस्टेट में मजदूरी सबसे अधिक सृजित होती है, इसे हम सभी जानते हैं।

दिहाड़ी मजदूरों को यहां काम चालू रहने से रोजगार उपलब्ध होता रहता है।

वर्तमान में इस उद्योग में छायी मंदी की वजह से इन मजदूरों के रोजगार पर कुठाराघात हुआ था।

अब रियल एस्टेट के लिए केंद्र सरकार द्वारा नये कोष की स्थापना से निश्चित तौर पर वह स्थिति बदलेगी।

भारतीय आर्थिक परिवेश के लिहाज से यह वाकई आर्थिक गतिविधियों को तेज करने वाला कदम होगा।

रियल एस्टेट में पूंजी निवेश से बढ़ेंगे रोजगार के अवसर 

लेकिन यह भी स्पष्ट है कि आर्थिक मंदी नहीं है का दावा ठोंकने में व्यस्त सरकार को पहले ही ऐसा कदम उठाना

चाहिए था।

इससे पहले सरकार से जुड़े लोग आर्थिक मंदी के तथ्य को ही नकारने में जुटे रहे।

रियल एस्टेट में अधिक पूंजी निवेश का सीधा लाभ दैनिक मजदूरों तक पहुंचेगा,

इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता।

साथ ही जब दैनिक मजदूरों के हाथों में मजदूरी का पैसा होगा तो वह घर के लिए जो कुछ भी खरीदेंगे,

वह ग्रामीण परिवेश के दुकानदारों के हाथों से घूमता हुआ फिर से देश की अर्थ व्यवस्था में गति लायेगा, यह भी तय है।

इसलिए रियल एस्टेट के बारे में केंद्र सरकार के इस फैसले की सराहना की जानी चाहिए।

केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र में 25 हजार करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा के साथ जो प्रावधान किये हैं,

उनकी भी सराहना की जानी चाहिए क्योंकि इसके जरिए सरकार ने बड़ी ईमानदारी

से बड़े लोगों को इस योजना का भी लाभ लूट लेने से रोकने की पूरी कोशिश की है।

सरकार ने साफ कर दिया है कि जिन प्रोजेक्टों को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है,

उसमें इस फंड का पैसा खर्च नहीं होगा।

मकान खरीदने के लिए भी मकान का क्षेत्रफल तय कर दिया गया है, जो 2150 वर्गफीट से अधिक नहीं हो सकता है।

सरकार की नीति जरूरतमंदों को फायदा पहुंचाने की है

इससे स्पष्ट है कि सरकार की मंशा गरीब और मध्यम वर्ग को मकान उपलब्ध कराने के माध्यम से देश की

अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकना है।

इससे अब मकान खऱीदने अथवा अपनी मकान की दशा सुधारने के लिए भी लोग बैंक से संपर्क कर सकते हैं।

इससे देश के एकदम निचले स्तर पर आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी।

वहां से पैसे का प्रवाह नये सिरे से प्रारंभ होने के बाद यह क्रम आगे बढ़ता चला जाएगा।

वर्तमान में नोटबंदी के बाद से ही बाजार में जिस किस्म की सुस्ती छायी हुई है, उसे दूर करने के लिए

केंद्र सरकार का यह फैसला एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

इसके तेज होने के साथ साथ जब अनाज मंडियों में इस बार की फसल पहुंचेगी

तो फिर से भारतीय अर्थव्यवस्था थोड़ी बहुत पटरी पर आती हुई नजर आयेगी।



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