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असली हीरा से ज्यादा मजबूत है प्रयोगशाला में तैयार हीरा




  • ग्रेफाइट के डिस्क से तैयार किया गया है इसे

  • प्रयोगशाला में हीरा बनने का माहौल पैदा किया

  • उसे स्थायी बनाने की दिशा में जारी है अनुसंधान

  • कृत्रिम तरीके से तैयार पर स्थायी नहीं हो पा रहा है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः असली हीरा निश्चित तौर पर बहुत मजबूत होता है। यह कार्बन का सबसे शुद्ध रुप




माना गया है। उसकी मजबूती की वजह से ही उसे कई वैज्ञानिक कार्यों में भी इस्तेमाल

किया जाता है। उसकी कठोरता की वजह से हीरा का इस्तेमाल शीशा काटने में भी किया

जाता है लेकिन उसमें जो हीरा काम आता है वह कृत्रिम हीरा होता है। पहली बार वैज्ञानिकों

ने प्रयोगशाला में तैयार किये गये कृत्रिम हीरों को असली हीरा से ज्यादा मजबूती देने में

सफलता पायी है। इसकी जांच के लिए वैज्ञानिकों ने ध्वनि संकेत और लेजर बीम का

इस्तेमाल किया था। इसके जरिए कार्बन के सबसे कठोर स्वरुप के टूटकर बिखर जाने तक

की प्रक्रिया की जांच की गयी थी। इस प्रयोग में पाया गया कि खास तरीके से प्रयोगशाला

में तैयार हीरा असली खदान से मिले हीरों के मुकाबले अधिक कठोर बन चुका है। इस

प्रयोग के सफल होने के बाद ऐसा भी माना जा रहा है कि कृत्रिम विधि से तैयार नकली हीरे

भी अब आभूषणों के मामले में असली हीरों को पीछे छोड़ देंगे। उसकी वजह से शायद हीरों

से बने आभूषण भी अब सस्ते होने लगेंगे। ऐसा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि खदानों से

हीरा निकालने की लागत बहुत अधिक होती है और जबकि प्रयोगशाला में तैयार हीरा

अपेक्षाकृत कम लागत पर तैयार किया जा सकता है। जब इसका व्यापारिक उत्पादन होने

लगेगा तो जाहिर तौर पर उसकी लागत और कम हो जाएगी। प्राकृतिक और नकली हीरा

की कठोरता की जांच इस तरीके से इससे पहले कभी नहीं की गयी थी। अब कठोरता में भी

असली हीरा से आगे निकलने की वजह से यह प्रयोगशाला में तैयार हीरा कीमती हीरा

जड़ित आभूषणों का विकल्प बनकर सामने आने जा रहा है।

असली हीरा धरती की गहराई में काफी समय में तैयार होता है

जान लें कि षटभूजाकार हीरा तैयार करने के लिए एक खास विधि आजमायी गयी है।

किसी भी ग्रेफाइट के डिस्क को रखकर उस पर 24 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार

से वार करने से उस ग्रेफाइट पर जो दबाव पैदा होता है वही हीरा बनाने की असली विधि है।

इस विधि से हीरा तैयार करने में पहले ही सफलता मिल चुकी थी। जमीन की गहराई में

भी हीरा प्राकृतिक तौर पर इसी विधि से तैयार होता है। पृथ्वी की गहराई में अत्यधिक

दबाव की वजह से कार्बन के टुकड़े धीरे धीरे कठोर होते चले जाते हैं और अत्यधिक

तापमान की स्थिति में वे हीरा बन जाते हैं। ऐसा देखा गया है कि जब कभी समुद्र के भीतर

ज्वालामुखी विस्फोट होता है तो उसके साथ भी हीरा के छोटे छोटे टुकड़े बाहर चले आते हैं।




जमीन पर होने वाले ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान अत्यधिक तापमान की वजह से

शायद वे जलकर नष्ट हो जाते हैं। कृत्रिम तरीके से तैयार इन हीरों को वैज्ञानिक परिभाषा

में लॉंसडेलाइट डायमंड भी कहा जाता है। इसकी विशेषता यह होती है कि इसमें कार्बन के

सारे अणु षटभूजाकार स्थिति में सज जाते हैं। प्रयोगशाला में अत्यधिक ताप और दबाव

की स्थिति में ग्रेफाइट का टुकड़ा ही पहले सिकुड़ता चला जाता है। बाद में वही चमकीले

हीरा में तब्दील हो जाता है। वैसे वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि जैसे षटकोणाकार

हीरा प्रयोगशाला में तैयार किये गये हैं, वैसे हीरे कई बार जमीन के अंदर भी होते हैं। इस

विधि की खास उपलब्धि यह भी रही है कि हीरा तैयार करते वक्त वैज्ञानिकों ने उसके

आकार को बदलने में भी सफलता पायी है। आम तौर पर हीरा इतना कठोर होता है कि वह

अपना आकार नहीं बदलता। सिर्फ आभूषणों में उसके इस्तेमाल के दौरान उसे काट कर

अपेक्षित आकार का बनाया जाता है।

इस कृत्रिम हीरे की आणविक संरचना षटकोण का है

वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के निदेशक योगेंद्र गुप्ता कहते हं कि हीरा अपने आप में

अद्भूत पदार्थ है। न सिर्फ यह सबसे मजबूत है बल्कि देखने में भी यह सबसे सुंदर है।

वैज्ञानिक तौर पर कहें तो उसकी ऑप्टिकल स्थिति और थर्मल कनडक्टिविटी भी अजीब

है। अब प्रयोगशाला में तैयार षटकोणाकार हीरे प्राकृतिक हीरों से अधिक कड़े और मजबूत

भी हैं। यह जान लें कि आम तौर पर घनाकार हीरे जमीन के अंदर 90 मील की गहराई में

पाये जाते हैं। वहां पर हीरा बनने के तापमान और दबाव दोनों मौजूद होते हैं। वहां का

तापमान पंद्रह डिग्री सेल्सियस से अधिक और दबाब भी अत्यधिक होने की वजह से कोई

भी कार्बन कड़ा होता हुए सबसे शुद्ध स्वरुप में तब्दील होता चला जाता है। प्रयोगशाला में

जब किसी ग्रेफाइट की चकरी (डिस्क) पर लगातार दबाव डाला जाता है और उसमें बारूद

की मदद से अत्यधिक ताप पैदा किया जाता है तो वह तेजी से घूमती हुए तेज हवा के

दबाव में हीरा में तब्दील होता चला जाता है। लेकिन यह भी जान लें कि प्रयोगशाला में

तैयार यह नकली हीरे अधिक समय तक स्वाभाविक माहौल में टिक नहीं पाये है। इसलिए

अब वैज्ञानिक ऐसे हीरों को स्वाभाविक माहौल में भी यथावत रखने की विधि विकसित

करने पर काम कर रहे हैं। यह विधि सफल होने के बाद निश्चित तौर पर उनका व्यापारिक

उत्पादन एक नया कारोबार बन जाएगा।



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