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राष्ट्रीय खबर ने दो वर्ष पूर्व बताया था पिगासूस की जासूसी कैसे हो रही है

  • राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर विरोध के खात्मे की साजिश

  • सिर्फ सरकारों को बेचा गया है कि यह जासूसी साफ्टवेयर

  • पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या में इसका इस्तेमाल हुआ

  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई जांच में अनेक देशों के नाम आये

राष्ट्रीय खबर

रांचीः राष्ट्रीय खबर ने आज से करीब दो वर्ष पूर्व ही पिगासूस की जासूसी के भारतवर्ष में

सक्रिय होने की रिपोर्ट छापी थी। दरअसल सऊदी अरब के बागी पत्रकार जमाल खशोगी की

हत्या के बाद से ही इस पर अनेक स्वतंत्र पत्रकारों का ध्यान गया था। यह साबित भी हो गया

था कि जमाल खशोगी को तुर्की के सऊदी दूतावास में पेशेवर हत्यारों द्वारा सिर्फ इसलिए

मारा जा सका था क्योंकि उसकी हर गतिविधि की जानकारी सऊदी युवराज के नजदीकी लोगों

को हो रही थी। वह कब वहां आ रह है, उसकी पूर्व जानकारी होने की वजह से ही वहां उसे खत्म

करने के लिए एक टीम भेज दी गयी थी। वैसे मामले का खुलासा होने के बाद कुछ लोगों को

इस मामले में दंडित करने के बाद महज यह सफाई दी गयी थी कि उसे गिरफ्तार करना था

लेकिन गलती से उसकी हत्या हो गयी। उस घटना के बाद भारत में भी अनेक लोगों को अपने

अपने मोबाइल की गतिविधियों पर संदेह हुआ था। मामूली सी जांच में यह बात सामने आ

गयी थी कि इजरायल के सैन्य समर्थित एक कंपनी द्वारा निर्मित यह जासूसी साफ्टवेयर

भारतीय एजेंसियों ने भी खरीदा था। औपचारिक तौर पर यह नहीं बताया गया है कि किसके

आदेश पर यह खरीद हुई है और उसके लिए कितने पैसे का भुगतान किया गया है। अब

वैश्विक स्तर पर इस पर पत्रकारों के एक समूह द्वारा रिपोर्ट प्रकाशित करने के बाद हर बार

की तरह इस बार भी औपचारिक तौर पर इसका खंडन सरकार के द्वारा किया जाना महज

एक औपचारिकता है। वैसे आज नहीं तो कल सत्ता परिवर्तन के पूर्व या बाद में राफेल की तरह

इसकी भी परतें खुलती चली जाएंगी।

राष्ट्रीय खबर ने जमाल खशोगी की हत्या के बाद जांच की थी

दिवंगत पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के संबंध में वाशिंगटन पोस्ट ने जो रिपोर्ट प्रकाशित

की है, उसके मुताबिक उसके परिचितों में से 37 लोगों के मोबाइल में यह जासूसी साफ्टवेयर

काम कर रहा था। इसी वजह से वह क्या कर रहा है, कहां हैं और क्या करने वाला है, यह सब

कुछ सऊदी सरकार को पता चल रहा था। सवाल उस मौत का नहीं बल्कि जासूसी का है, जो

भारत में भी एक जैसा लागू होता है। आखिर सत्ता को ऐसी जासूसी की जरूरत तब पड़ती है

जब उसे अपनी ही सत्ता को चुनौती मिलने का भय सताने लगे। यूं तो अपराधियों और

आतंकवादियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए दूसरे किस्म के उपाय पहले से मौजूद

हैं। पिगासूस की खरीद पर आज भले कोई सरकारी एजेंसी जानकारी नहीं दे लेकिन आने वाले

दिनों में यह राज भी धरती का सीना फाड़कर बाहर निकल आयेगा। हमें यह नहीं भूलना

चाहिए कि राष्ट्रीय खबर ने वर्ष 2019 मे ही मामले की जानकारी हासिल कर इस बारे में

अनेक तथ्य प्रकाशित कर दिये थे, जो आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित किये जा रहे हैं।

लेकिन इससे ज्यादा गंभीर यह मामला है कि अनेक देशों की सरकारों को अपने ही नागरिकों

की जासूसी कराने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। जिनकी जासूसी हो रही है, उनकी

राष्ट्रभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। दूसरी तरफ अगर कोई व्यापारी कर चोरी में

शामिल हो तो उसका पता लगाने के लिए भी अलग जासूसी उपकरण है। याद दिला दें कि

रतन टाटा और नीरा राडिया की बात चीत भी अचानक से लीक हो गयी थी। लोगों ने इस बात

चीत को ध्यान से सुना था।

नीरा राडिया टेप को भी हमें याद रखना होगा

किसी स्तर पर इस सवाल का उत्तर नहीं मिल पाया कि आखिर इस बात चीत की रिकार्डिंग

किस सरकारी एजेंसी ने की थी। दरअसल इस किस्म की गतिविधियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के

नाम पर निजी एजेंडा साधने का हथियार बना डालने की वजह से ही ऐसी परेशानियां सामने

आती हैं। अब नई जानकारी यह आयी है कि पचास देशों के करीब एक हजार लोगों की जासूसी

अब भी हो रही है। इनमें केंद्र सरकार के वर्तमान अथवा पूर्व मंत्री भी शामिल हो सकते हैं। अब

सरकार को मंत्रियों से क्या खतरा है, इसे समझने के लिए किसी रॉकेट साइंस के ज्ञान की

जरूरत नहीं है। दरअसल सत्ता को कहीं से चुनौती मिले, उसकी पूर्व जानकारी प्राप्त करना ही

इस जासूसी का असली मकसद है। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में इस जासूसी

साफ्टवेयर की खरीद में आम जनता के कितने पैसे खर्च किये गये हैं और उसका आदेश

किसके द्वारा दिया गया था, यह सच सामने आये। इसके सामने आते ही यह भी स्पष्ट हो

जाएगा कि पारदर्शी प्रशासन का दावा करने वालों ने पर्दे के पीछे कितना कालिख छिपा रखा

है। कई प्रमुख समाचारपत्रों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक मंच बनाकर इस पूरे मामले की जांच

की है। जिसे पिगासूस प्रोजेक्ट जांच का नाम दिया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस खबर के प्रकाशित होने के बाद इस साफ्टवेयर को बनाने वाली कंपनी

एनएसओ को सफाई देनी पड़ी है। लेकिन कंपनी का सफाई वही है जो पहले थी। उसका कहना

है कि उसने अपना यह साफ्टवेयर किसी भी निजी व्यक्ति अथवा संस्थान को नहीं बेचा है।

इसे सिर्फ देश की सरकारों को ही बेचा गया है। इस सफाई के बाद यह स्पष्ट है कि भारत में भी

पिगासूस की जासूसी में सरकार की भूमिका रही है।

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