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दुर्लभ प्रजाति के गिद्ध को लगाये कृत्रिम पैर, देखें वीडियो

चिकित्सकों पक्षी को चलने व उड़ने लायक बनाया

पहली बार तैयार हुआ बॉयोनिक पक्षी

उसके पैर में खास हिस्सा जोड़ा गया

अब उड़ने का अभ्यास कर रहा है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दुर्लभ प्रजाति का गिद्ध गंभीर रुप से घायल हो गया था। किसी वजह से उसका

दाहिना पैर बुरी तरह जख्मी हो गया था। चूंकि यह अत्यंत दुर्लभ प्रजाति का पक्षी है,

इसलिए उसे बचाने की हर संभव कोशिश की गयी। चिकित्सकों ने जान बचाने के लिए

सबसे पहले उसके दाहिने पैर के नीचे का हिस्सा काट दिया ताकि जहर शेष शरीर में नही

फैले। इस अवस्था के बाद उसे फिर से सक्रिय बनाने के लिए काफी परिश्रम और शोध के

बाद उसे कृत्रिम पैर प्रदान किये गये हैं। अपने कृत्रिम पैरों से वह चलना सीख गया है।

वीडियो में देखिये कृत्रिम पैर का पहला गिद्ध

धीरे धीरे वह छोटी उड़ाने भी भर रहा है। लेकिन पूरी तरह निश्तिंत होने के लिए उसे अभी

निगरानी में ही रखा गया है। सब कुछ सही होने के बाद उसे फिर से आजाद कर दिया

जाएगा। जिस गिद्ध के साथ यह चिकित्सीय कमाल हुआ है, वह मिया नाम का बियर्ड

प्रजाति का गिद्ध है। अब सारी शल्यक्रिया सफल होने के बाद वह दुनिया का पहला ऐसा

पक्षी बन गया है, जिसके पास कृत्रिम पैर हैं। वह अपने इस नये पैर का उपयोग करना

सीख गया है। इसे बनाने के लिए भी वैज्ञानिकों को काफी शोध करना पड़ा है। उसके शरीर

के सारे आंकड़ों के आधार पर ही यह नकली पैर कैसा होगा, उसकी डिजाइन तैयार की गयी

है। दरअसल एक जाल में फंस जाने के बाद उसकी टांग में बड़ा घाव हो गया था। इस घाव

की वजह से उसका पैर जहर से प्रभावित भी हो चुका था। ऐसी हालत में उसे जीव

चिकित्सकों के पास लाया गया था। अत्यंत दुर्लभ प्रजाति का गिद्ध होने की वजह से उनकी

जान बचाने की पूरी कोशिश की गयी। जहर को फैलने से रोकने के लिए सबसे पहले उसके

दाहिने पैर का निचला हिस्सा काट दिया गया।

दुर्लभ प्रजाति के गिद्ध को पैर देने के लिए पूरा शोध किया गया

पैर का निचला हिस्सा काट देने के बाद वह पूरी तरह मदद पर आश्रित हो गया था। इसी

वजह से उसे फिर से पूरी तरह सक्रिय बनाने के लिए उसे नकली पैर देने की कवायद प्रारंभ

हुई। उसकी टांगों की संरचना को देख लेने के बाद ही उस नकली टांग की डिजाइन बनायी

गयी। इसमें ध्यान रखा गया कि यह नकली टांग उसकी सारी जरूरतों को पूरा कर सके

और बिल्कुल उसकी असली टांग के बराबर वजन का हो। दरअसल पक्षी अपनी टांगों पर

बहुत निर्भर होते हैं। शिकारी प्रजाति का होने की वजह से ऐसे गिद्ध आसमान पर काफी

ऊंचाई पर उड़ते हुए जमीन पर शिकार की तलाश कर सकते हैं। ऑस्ट्रिया के संरक्षण केंद्र

में डॉ ऑस्कर एस्जमान के नेतृत्व में दल ने इस पूरी प्रक्रिया को अंतिम लक्ष्य तक पहुंचाने

में कामयाबी हासिल की। डॉ एस्जमान मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ वियेना के सर्जन हैं।

उनके लिए भी यह चुनौती वाला काम था क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं किया गया था। वह

बताते हैं कि उसकी नकली टांग के लिए हड्डियों का नया स्वरुप तैयार किया गया। पैर के

निचले हिस्से को सक्रिय रखने के लिए कई हड्डियों का एक साथ योगदान होता है। सभी

के आकार प्रकार को समझ लेने के बाद उसी की नकल बनायी गयी। एक अत्यंत नाजुक

शल्यक्रिया की मदद से यह टांग गिद्ध के दाहिने पैर के नीचे जोड़ गयी। बाद में उसे असली

जैसा अनुभव और कार्यकुशलता देने के लिए इस नकली टांग के नीचे एक मजबूत रबर का

आधार भी प्रदान किया गया। पैर के सक्रिय हिस्से की हड्डियों से इस नकली हिस्से को

जोड़ने का काम कोई आसान नहीं था। ऑपरेशन सफल होने के कुछ देर के बाद गिद्ध को

होश आ गया और धीरे धीरे वह स्वाभाविक स्थिति में लौटा।

आल्प्स पर्वत पर इस प्रजाति का ठिकाना होता था

आम तौर पर इस प्रजाति के गिद्ध आल्प्स पर्वत के ऊपर उड़ते हुए शिकार की तलाश करते

रहते हैं। वैसे पहले इनकी तादाद यूरोप के अन्य स्थानों पर भी थी। लेकिन इंसानों द्वारा

जहर देने और प्लास्टिक के निरंतर उपयोग की वजह से उनकी संख्या लगातार घटी है।

अब वे संरक्षित प्रजाति के पक्षी हैं, जिनकी संख्या बहुत कम रह गयी है। बियर्ड वल्चर

यानी इस प्रजाति के गिद्ध के पंखों का फैसला तीस फीट तक हो सकता है और वह सात

किलो वजन तक का होता है। आम तौर पर वे पहाड़ों पर ही रहते हैं और वहीं अपना शिकार

भी करते हैं। अब मिया नाम का यह गिद्ध फिलहाल डाक्टरों की देखरेख में थोड़ा थोड़ा

उड़ना सीख गया है। पूरी तरह अपने ऊपर निर्भर हो जाने के बाद उसे फिर से आजाद कर

दिया जाएगा। संरक्षित अवस्था में यह पक्षी 50 साल और प्रकृति में तीस वर्षों तक जीवित

पाया गया है।

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