राम मंदिर का मुद्दा विहिप के हाथ से फिसलता हुआ

राम मंदिर का मुद्दा विहिप के हाथ से फिसलता हुआ
Spread the love
  • 4
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    4
    Shares
  • पीछे हटने से स्वरुपानंद का प्रभाव हुआ अधिक

  • विहिप को नहीं मिलता सरकार का समर्थन

  • तोगड़िया के नहीं होने से भी घटा है प्रभाव

  • अब वोट भी नहीं खींच पा रहा है यह मुद्दा

रासबिहारी

नईदिल्लीः राम मंदिर का मुद्दा अब विहिप के हाथों से फिसलता हुआ नजर आ रहा है।

सरकार की परेशानियों को समझते हुए विश्व हिंदू परिषद ने चुनाव तक इस मुद्दे पर आंदोलन स्थगित कर दिया है।

दूसरी तरफ शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती ने इसी माह अयोध्या अभियान कर

मंदिर की पहली ईंट रखने का एलान कर कुंभ में अपनी अलग छाप छोड़ी है।

मजेदार बात यह है कि स्वामी स्वरुपानंद को पहले से ही कांग्रेसी संत कहा जाता रहा है।

यह पहली बार हो रहा है कि कुंभ में उनके एलान के बाद उसके पक्ष में अधिक लोग खड़े दिखाई दे रहे हैं।

लेकिन इस बात के राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं कि शंकराचार्य के बयान की वजह से ही विहिप को पीछे हटना पड़ा है।

अब तक राम मंदिर का मुद्दा हमेशा से ही विश्व हिंदू परिषद के नियंत्रण में रहा है।

यह पहला अवसर है जब वह इस मुद्दे से पीछे हट रही है और दूसरे उसका स्थान ले रहे हैं।

शंकराचार्य ने कुंभ से इस बात की घोषणा कर दी है कि

वह 10 फरवरी से अयोध्या के लिए प्रस्थान करेंगे

और 21 फरवरी को वहां मंदिर की पहली ईंट रखेंगे।

इसी आह्वान से विहिप का आभामंडल कम हो गया है।

यहां तक कि अपने धर्म संसद में भी विहिप कोई स्पष्ट फैसला नहीं ले पायी है।

राम मंदिर के नारे से ही मजबूत हुई थी विहिप

मंदिर वहीं बनायेंगे, के नारे के साथ पूरे देश में सक्रिय हुई

विहिप के लिए यह एक बड़ा झटका है।

वैसे भी प्रवीण तोगड़िया विवाद के बाद विहिप की सांगठनिक ताकत

पहले के मुकाबले कम हुई है क्योंकि अनेक हिंदूवादी संगठन

विहिप के सरकार समर्थक तेवर को अच्छी नजरों से नहीं देख रहे हैं।

विहिप के अंदरखाने से इस बात की सूचना बाहर आयी कि दरअसल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार द्वारा उनके किसी मंदिर निर्माण की

पहल को समर्थन नहीं दिये जाने का स्पष्ट संकेत आने के बाद ही

विहिप को पीछे हटने का यह फैसला लेना पड़ा है।

सरकार इस मुद्दे को अदालत के जरिए ही सुलझाना चाहती है।

दूसरी तरफ राजनीतिक तौर पर यह समझा गया है कि अब राम मंदिर का मुद्दा भी वोट को प्रभावित नहीं कर पा रहा है।

इसलिए उत्तरप्रदेश के चुनावी रणक्षेत्र में अभी राममंदिर के मुद्दे पर ताकत लगाने की कोई जरूरत भी नहीं हैं।

जानकार यह मानते हैं कि वर्ष 1992 से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है।

इस वजह से स्वामी स्वरुपानंद के आक्रामक तेवर को भांपते हुए विहिप ने अपने पैर पीछे खींच लिये है ।

ताकि उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक सीटों वाले राज्य में भाजपा को वोट दिलाने वाले मुद्दों पर चुनावी लड़ाई लड़ने का अवसर मिल सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.