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तीन संस्कृत विश्वविद्यालयों पर केंद्रीय स्वीकृति की लगी मुहर

  • संस्कृत के क्षेत्र में उन्नति के रास्ते बढ़ रहा देश
  • राज्यसभा में तीन को दर्जा मिलने का रास्ता हुआ साफ़
  • लोकसभा से पास होते ही यह विधेयक देश के लिए गौरव बनेगा
  • देश से बाहर के छात्रों भी आ सकेंगे पढ़ाई व शोध के लिए इनमें

नई दिल्ली : तीन संस्कृत विश्वविद्यालय जो देश की पौराणिकता को बनाये रखे है,

सोमवार को राज्यसभा में केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने का रास्ता साफ़ हो गया.

राज्यसभा में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक-2019 पर अपनी मुहर लगा दी गयी

है. बता दें कि राज्यसभा ने सोमवार को देश में संस्कृत के तीन मानद विश्वविद्यालयों को

केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने के प्रावधान वाले विधेयक को मंजूरी दे दी है. इस

विधेयक के कानून बनने के बाद राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, दिल्ली व लाल बहादुर शास्त्री

विद्यापीठ और तिरुपति स्थित राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ को केंद्रीय संस्कृत

विश्वविद्यालय का दर्जा मिल जाएगा. ज्ञात हो कि अभी तीनों संस्थान संस्कृत अनुसंधान

के क्षेत्र में अलग-अलग कार्य कर रहे हैं. हालांकि अभी यह विधेयक लोकसभा से भी पास

होना बाकी है. पर राज्यसभा में पारित इस विधेयक के संदर्भ में मानव संसाधन विकास

मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने काफी कुछ जानकारी देते हुए बताया. मंत्री ने संस्कृत के

गुणों व अहमियत की काफी चर्चा भी की. जहां इस विधेयक पर चर्चा के दौरान भाजपा

और द्रमुक के सदस्यों में संस्कृत तथा तमिल भाषा को लेकर नोकझोंक भी हुई. पर मंत्री

निंशक ने जब संस्कृत के साथ-साथ देश के गौरव को जोड़ कर देश को विश्वगुरू बनने का

रास्ता दिखाया तो सभी शांत होकर उनकी बातों को सुनते रहे. सभी बातों को गहराइयों से

सुनने के बाद सबने अपनी सहमति जताई.

मानव संसाधन विकास मंत्री बोले तो सदन हुआ शांत

मंत्री ने बताया कि सरकार संस्कृत के साथ ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल

सभी 22 भारतीय भाषाओं को सशक्त करने की पक्षधर है. साथ ही इसे मजबूत बनाने में

सभी संभव कोशिशे करने को तैयार है. इस मामले में चर्चा के दौरान मंत्री ने बताया कि

केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने से विज्ञान के साथ संस्कृत का ज्ञान जुड़ेगा. साथ ही

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एक-भारत, श्रेष्ठ-भारत और देश को विश्वगुरु बनाने का

रास्ता इसी से निकलेगा. मंत्री ने संस्कृत पर जोर देते हुए कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय

का केन्द्रीयकृत होना अपने आप में देशवासियों के लिए गर्व की बात होनी चाहिए. जो इस

भारत देश की मूल भाषा रही है जिससे हिंदी, अंग्रेजी आदि भाषाओं का निर्माण हुआ है.

यह विधेयक केवल किसी भाषा से जुड़ा नहीं है बल्कि शोध एवं अनुसंधान को भी इससे

प्रोत्साहन मिलेगा. तीन केन्द्रीयकृत विश्वविद्यालय बनने के बाद बाहर के छात्र शोध करने

भारत आयेंगे. जो देश के लिए गौरव की बात होगी, चूंकि अबतक यहां के छात्र बाहर जा

कर शिक्षा ग्रहण करने को तत्पर रहते है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस विधेयक को

भाषाओं के विवाद में नहीं खड़ा करना चाहिए. उन्होंने कहा कि आज जिस योग का पूरे

विश्व में अनुसरण किया जा रहा है, उसके प्रसिद्ध ग्रंथ योग सूत्र को पंतजलि ने लिखा था.

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार प्राचीन ज्ञान-विज्ञान पर आधारित ग्रंथ चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट,

नागार्जुन आदि ने संस्कृत में लिखे थे.

तीन वि.वि. के प्रस्ताव का कई नेताओं का समर्थन

भाजपा के सुब्रमण्यम स्वामी ने इस विधेयक का पूर्ण समर्थन किया और कहा कि संस्कृत

को मृतप्राय भाषा बताने वाले लोग खुद बौद्धिक ठहराव की स्थिति झेल रहे हैं. जबकि

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ ने ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (आर्टिफिशयल इंटेलिजेन्स) के

क्षेत्र में आगे बढ़ने के इच्छुक लोगों के लिए संस्कृत को जानना अनिवार्य बनाया है. वहीं

बीजद के प्रशांत नंदा और तृणमूल कांग्रेस के सुखेन्दु शेखर राय ने भी संस्कृत को

वैज्ञानिक भाषा और सांस्कृतिक विरासत बताते हुए विधेयक का समर्थन किया. उन्होंने

बाकायदा अपना भाषण भी संस्कृत में दिया, जिसपर जयराम रमेश ने संस्कृत में कुछ

टिप्पणी भी की. उन्होंने कहा कि तमिल, मलयालम, ओड़िया भाषा लाखों लोगों के द्वारा

बोली जाती है, जबकि संस्कृत भाषा बोलने वालों की संख्या देश में महज 15,000 के

लगभग है. उन्होंने कहा कि संस्कृत पर कुछ लोगों का एकाधिकार रहा और आम जनों की

पहुंच इस भाषा तक नहीं हो पायी, जो अफसोसजनक है.

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