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राजेंद्र सिंहः देश के एक समर्पित श्रमिक नेता

राजेंद्र सिंह का निधन देश के उन लाखों मजदूरों के लिए एक बड़ा आघात है,

जो खास तौर पर कोयला उद्योग से जुड़े रहे हैं।

आम तौर पर मृदुभाषी और अपने सहज स्वभाव के लिए परिचित राजेंद्र सिंह की दूसरी विशेषता यह रही कि वह मजदूर हितों के मुद्दे पर एक हार्ड बारगेनर थे।

यानी किसी भी प्रबंधन के लिए श्रमिकों के हितों के खिलाफ उन्हें कुछ समझा लेना आसान नहीं था।

नवादा और गया से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद घटनाक्रम ने उन्हें श्रमिक राजनीति से जोड़ दिया।

मृदुभाषी होने की वजह से किसी भी प्रबंधन के लिए उनसे बात करना सहज था।

दूसरी तरफ मृदुभाषी होने के बाद भी मजदूर हितों की अनदेखी हो, ऐसा उनके आचरण में

नहीं था। इसलिए प्रारंभिक दिनों के बाद से ही एक श्रमिक नेता के तौर पर उन्हें हर स्तर

पर गंभीरता से लिया जाने लगा था। सामान्य राजनीति के साथ साथ खुद को कोयला

की राजनीति से जोड़े रखने के बाद भी उन्होंने देश के अनेक उद्योगों में श्रमिक हित के

लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष भागीदारी निभायी। राजनीति में धीरे धीरे एक के बाद एक

पायदान पर चढ़ते हुए वह चुनावी राजनीति में आये। इसके तहत वर्ष 1985 में वह पहली

बार बेरमो से विधायक चुने गये। वर्ष 1989 में अविभाजित बिहार में सत्येंद्र नारायण सिंह

की सरकार में पीएचइडी मंत्री बनाये गये। उसके बाद लालू- राबड़ी की सरकार में उन्हें ऊर्जा

मंत्री जैसी गंभीर जिम्मेदारी भी सौंपी गयी।

राजेंद्र सिंह ने खुद को कुशल प्रशासक भी साबित किया

एक तपे तपाये श्रमिक नेता के तौर पर पूरे देश में अपनी पहचान कायम कर चुके श्री सिंह

ने मंत्री पद की जिम्मेदारी संभालते हुए खुद को एक कुशल प्रशासक के तौर पर भी

स्थापित किया। झारखंड में भी हेमंत सोरेन की पूर्व सरकार में ऊर्जा, स्वास्थ्य, वित्त और

सांसदीय कार्य मंत्री रह चुके हैं। कोयला मजदूरों के हितों की लड़ाई उनकी प्राथमिकता रही

जबकि चुनावी राजनीति में विपक्ष में होते हुए भी सरकार में हमेशा से उनकी बातों को

गंभीरता से सुना गया। आज के दौर में खास तौर पर कोयला श्रमिकों को वेतन समझौते

का जो लाभ मिला है, उसमें भी उनकी प्रमुख भूमिका रही। लिहाजा उनके चले जाने के बाद

निश्चित तौर पर पूरे देश के श्रमिक आंदोलन में एक बड़ा राजनीतिक शून्य उपजा है, जो

शायद आने वाले दिनों में उनकी याद हमेशा दिलाता रहेगा।


 

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