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सुदूर अंतरिक्ष से हर 16 दिन बाद आ रहा है संकेत

  • पृथ्वी के बाहर जीवन की तलाश कर रहे हैं विज्ञानी

  • हाइड्रोजन मैपिंग के जरिए पुष्टि हुई है संदेशों की

  • कई अन्य संस्थानों ने भी कनाडा की बात को सही कहा

  • रेडियो टेलीस्कोप में दर्ज खगोल जगत की ऐसी सूचनाएं

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सुदूर अंतरिक्ष से मिलने वाले रेडियो संकेतों को वैज्ञानिक ध्यान

से सुन रहे हैं। सौरमंडल के किसी अन्य हिस्से से पृथ्वी तक पहुंचने वाला

यह रेडियो संदेश हर 16 दिन के अंतराल पर आ रहा है। इसी वजह से

वैज्ञानिक यह भी कल्पना कर रहे हैं कि किसी अन्य दुनिया के प्राणी पृथ्वी

से संपर्क करने का प्रयास तो हीं कर रहे हैं। इस मुद्दे पर काफी पहले से ही

अजीब सी स्थिति बनी हुई है। यह आकर्षण इस वजह से भी है क्योंकि इस

पूरे सौर जगत में पृथ्वी के अलावा कहीं और जीवन है अथवा नहीं, इस विषय

को जानना भी वैज्ञानिकों की अन्यतम प्राथमिकताओं में से एक है। इस बार

जिस रेडियो संदेश को पकड़ा जा रहा है वह एक बौछार के तौर पर आती है।

इसी वजह से इसमें छिपे संकेतों का विश्लेषण करने का काम युद्ध स्तर पर

चल रहा है।

सुदूर अंतरिक्ष के जिन रेडियो संकेतों को नियमित तौर पर पकड़ा जा रहा है,

वे बौछार की अवस्था में होते हैं। संचार विज्ञान की भाषा में इन्हें फास्ट रेडियो

ब्रस्ट (एफआरबी) कहा जाता है। पहली बार वर्ष 2001 में इन संकेतों को पकड़ा

गया था। उसके बाद से लगातार इनकी खोज हो रही है। प्रारंभ में यह संकेत

नियमित नहीं थे। लेकिन जैसे जैसे समय बीत गया यह संकेत नियमित और

स्पष्ट होते चले गये हैं। दूसरी तरफ कनाडा की हाईड्रोजन इंटेंसिटी मैपिंग

प्रयोग के तहत इन संकेतों को और साफ तरीके से सुनने की विधि विकसित

कर ली गयी है। इस विधि से जिन रेडियो संकेतों की बौछारों को लगातार सुना

जा रहा है उन्हे समझने की कोशिश की जा रही है।

कनाडा के एस्ट्रोफिजिक्स इंस्टिटियूट के वैज्ञानिक इस काम में लगे हुए हैं।

सुदूर अंतरिक्ष के इन संदेशों को एक शोध छात्र ने पकड़ा

इसी क्रम में एक स्नातक शोधछात्र ने यह पता लगाया है कि हर 16 दिन के

अंतराल में यह रेडियो संदेश आते हैं। यह काम इतने नियमित तरीके से हो

रहा है कि अब इसे वैज्ञानिक संयोग नहीं मानते हैं। यूरोप के ईवीएन टेलीस्कोप के आंकड़ों ने भी कनाडा के वैज्ञानिकों की खोज की पुष्टि कर दी है। पिछले 19 जून 2019 को इन्हें सुने जाने के बाद हाईड्रोजन

परमाणुओं के बीच होने वाले कंपनों की मदद से इन्हें दर्ज किया जा रहा है।

अब वैज्ञानिक इन रेडियो संदेशों में कोई सूचना भी है या नहीं, इसे समझने की

कोशिश कर रहे हैं। यह विधि अपने तौर पर रेडियो संदेश प्राप्त होने की

स्थिति में एक मैप तैयार कर देती है। ब्रिटिश कोलंबिया में इस काम के लिए

स्थापित रेडियो टेलीस्कोप में सौर मंडल के अनेक प्रकार के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक

संदेशों को दर्ज करने की सुविधा है। इन अत्याधुनिक संचार विधियों की

बदौलत सौर जगत के 1024 स्थानों से आने वाले संकेतों को पकड़ने की

सुविधा है। इसके तहत 16 हजार से अधिक फ्रीक्वैंसी के संदेश अपने आप ही

दर्ज होते हैं। इनमें से कुछ अत्यधिक तेज गति के होते हैं। इनकी गति एक

सेकंड में एक हजार बार तक की होती है। जिसे आम इंसानी कान सुन भी नहीं

सकता।

रेडियो संदेश बौछार के तौर पर आ रहे हैं

जिस रेडियो संदेश बौछार की चर्चा हो रही है, वह नियमित तौर पर आ रहा है।

वैज्ञानिक इसके आने के स्रोत का पता लगाना चाहते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का

मानना है कि यह संकेत दो तारों के बीच छिपे किसी तीसरे स्थान से भेजे जा

रहा है। लेकिन इसकी पुष्टि अब तक नहीं हो पायी है। हर 16 दिन के बाद मात्र

12 सेकंड का यह रेडियो संदेश फिलहाल वैज्ञानिकों के लिए नई पहेली जैसा

बना हुआ है। सभी की रुचि इसके स्रोत और कारणों को समझने में इसलिए भी

अधिक है क्योंकि इस पूरे ब्रहमांड में पृथ्वी के अलावा भी कहीं जीवन है अथवा

नहीं इस सवाल का संतोषजनक उत्तर आज तक नहीं मिल पाया है। सिर्फ

वैज्ञानिक परीक्षण में इस बात की पुष्टि हुई है कि कुछ किस्म के सुक्ष्म जीवन

निश्चित तौर पर अंतरिक्ष में भी मौजूद हैं। इनकी पुष्टि अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन

में भी हो चुकी है

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