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कुरान की आयात को निकालना क्या न्यायालय का अधिकार क्षेत्र है?

  • कुरान ही नहीं किसी भी धर्मग्रंथ में बदलाव नामुमकिन है

पंडित मुस्तफा आरिफ

कुरान शरीफ की 26 आयात को आतंकवाद प्रेरक बताते हुए निकालने की बात को लेकर

शिया सेंट्रल बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी ने सर्वोच्च न्यायालय में जो याचिका लगाई

है, उसका पूरे देश में संपूर्ण मुसलमान जगत में विरोध हो रहा हैं। आक्रोशित शिया समाज

ने उन्हें शिया तो दूर की बात मुसलमान भी मानने से इंकार करते हुए उनके इस कुत्सित

प्रयास का कङे शब्दों में विरोध किया है। कलामे पाक के अवतरण के लगभग 1450 साल

हो गए हैं, इन सालों में इस प्रकार की बात न तो किसी ने की है और न कोई ऐसे प्रयास

सामने आएं हैं। सर्वविदित है कि कुरान शरीफ एक अवतरित पवित्र ग्रंथ हैं जो सृष्टि के

कल्याण के लिए परमात्मा, ईश्वर या अल्लाह ने अपने संरक्षित कोष (जिसे लोहे महफ़ूज

कहा जाता है) से जमीन पर भेजा है, अपने सबसे प्रिय बंदे हजरत मोहम्मद साहब के

जरिये, उनका अपना संदेश वाहक यानि पैग़म्बर बनाकर। किसी भी मनुष्य या संस्थान

को ये अधिकार नहीं है कि इसमें काना मात्रा का भी रद्दो बदल कर सकें।

अपनी याचिका में आयातों के लिए खलिफाओँ की जिम्मेदार ठहराया

अपनी दलील में वसीम रिजवी ने अवतरित आयात के लिखकर कुरान में संग्रहीत करने के

लिए पहले तीन खलिफाओं को जिम्मेदार ठहराया है। लेकिन इस बात पर उन्होंने चुप्पी

साधी है कि जो भी कार्य हुआ वो हजरत मोहम्मद साहब के जीवनकाल में उनकी संरक्षण

व निगरानी में हुआ। अपने अंतिम समय में हजरत मोहम्मद साहब ने अपनी उम्मत को

खिताब करते हुए कहा था कि में तुम्हारी रहनुमाई के लिए कुरान और एहले बैत छोङे जा

रहा हूँ। तब से लेकर आज तक इस्लाम का मार्गदर्शन कुरान और एहले बैत के सहयोग से

संग्रहित हदीस से हो रहा हैं। कुरान अल्लाह के दीन के मानने वालों के लिए एक आचार

संहिता, मार्गदर्शिका या संविधान हैं। जिसमें संशोधन की पात्रता सिर्फ और सिर्फ ईश्वर का

अधिकार क्षेत्र हैं। कुरान की पहली सूरत में ये स्पष्ट कहा गया है कि हम तेरी ही पूजा करते

हैं और तुझसे ही मदद मांगते हैं।

कुरान कोई राजनीतिक अभिलेख नहीं है

कुरान किसी संसद या संस्थान का अभिलेख नहीं हैं जिस पर संसार के किसी भी

न्यायालय का अधिकार क्षेत्र आता हो। ये सिर्फ उस एक ईश्वर या अल्लाह का अभिलेख हैं,

और जिसके हिफाजत की जिम्मेदारी उसने खुद लिए हैं। इसलिए मानवीय दलीलो और

तर्क वितर्क से इसे प्रभावित करना या रद्दो बदल करना नामुमकिन है।

जब बात कुरान की आती हैं तो हजरत अली अ.स. के जिक्र के बिना इस विषय पर चर्चा

करना निरर्थक है। कुरान और हजरत अली के प्रवचनों के संग्रह ग्रंथ “नेहजुल बलाग़ा” में

कुरान के महत्व की चर्चा करना जरूरी है, क्योंकि इस्लाम और विशेषकर शिया समुदाय

इन दोनों ग्रंथों से मार्गदर्शन पाता है। हजरत अली के 25 वर्ष ईश्वर के एकत्व के प्रचार,

चिंतन और मनन में व्यतीत हुए हैं। इसलिए अगर कुरान और हजरत मोहम्मद साहब की

चर्चा हो तो हजरत अली की चर्चा होना लाजिमी है, इसके बिना किसी भी दीनी विषय पर

चर्चा अधूरी है। अपने जीवनकाल और प्रवचनों में कहीं भी हजरत अली ने कुरान की किसी

भी आयत को खुद से अलग नहीं किया। जो व्यक्ति इन आयात में बुराई देखता है या

गलत ढंग से अपने लाभ के लिए परिभाषित करते हुए लोगों में भ्रम फैलाता है, वो कतई

दीन परस्त नहीं हैं। नेहजुल बलाग़ा के खुतबा नम्बर 16 और 17 में इसकी स्पष्ट व्याख्या

हजरत अली ने करते हुए ऐसे व्यक्ति को गुमराह, जाहिल, गैर जिम्मेदार, फसादी और

किसी से प्रभावित होकर षङयंत्र करने वाला बताया है, वो और उसके पीछे चलने वाले

अल्लाह या ईश्वर के प्रकोप के अधिकारी है। वो इंसान जरूर दिखते हैं लेकिन इंसान हैं

नहीं।

धार्मिक ग्रंथों को न्यायपालिका निर्देशित नहीं कर सकती

कुरान और नेहजुल बलाग़ा के बारे में मान्यता है कि जिस प्रकार सृष्टि सूर्य से रोशनी पाती

है ठीक उसी प्रकार सूर्य इनसे रोशनी पाता है। आशय यहीं है कि सृष्टि का संचालन इन

धर्म ग्रंथों की परिधि में आता है। सिर्फ ये ही इस्लामी ग्रंथ नहीं अपितु संसार के वे सभी

धार्मिक ग्रंथ जिसमें गीता, महाभारत, रामायण, वेद पुराण, उपनिषद, तौरेत, बाइबिल,

गुरूग्रंथ साहब या अन्य धर्मों के ग्रंथों में न तो आज तक कोई परिवर्तन हुआ और न ही

सुझाया गया है। अपनी अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार आलोचना

समालोचना होती रहीं हैं और होती रहेगी।समय और काल अनुसार इनकी आवश्यकता

और उपादेयता भी बनी रहेगी। हमारे पास सिर्फ एक ही अधिकार रहेगा, असहमति की

स्थिति में अपना रास्ता अलग चुनने का। उसके लिए आप स्वतंत्र है, लेकिन इन ग्रंथों में

परिवर्तन का अधिकार न तो व्यक्ति के पास है, न संस्थान के पास है, न देश के पास है, न

संविधान के पास। न ही कोई इसमें परिवर्तन के लिए किसी को बाध्य कर सकता है।

वसीम रिजवी के प्रयासो के मद्देनजर सारे देश से जो बयान आ रहें हैं और विरोध हो रहा है,

उनमें उनके इस कुत्सित कृत्य के विरुद्ध सर्वानुमति है। शिया ओलोमाओं ने उन पर किसी

के बहकावे में आकर षङयंत्र का आरोप लगाते हुए उन्हें शिया यहाँ तक की मुसलमान भी

मानने से इंकार किया है, उन पर वक्फ की संपत्ति हङपने का आरोप लगाते हुए कहा है कि

सीबीआई की कार्रवाई से बचने के लिए वो किसी के दबाव में काम कर रहैं हैं। उनकी इस

कार्रवाई पर सियासत गरम है, परंतु अभी तक शासन मौन व नरम हैं। एक टीवी चैनल ने

उनका साक्षात्कार दिया है, परंतु ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उन्हें कौन समर्थन दे रहा है।

वसीम की याचिका में वह फिलहाल अकेले ही हैं

फिलहाल एकला चलो रे की स्थिति हैं, इस्लामिक संगठन तो कोई उनके साथ नहीं हैं।

उनका मूल तथ्य आतंकवाद का कुरान में समावेश होना है, जो उनका अपना दृष्टिकोण

हैं। चतुर राजनीति अपनी सुविधानुसार आतंकवादी तत्व तो किसी भी धर्म ग्रंथ से निकाल

लेती है या जोङ देती हैं। अंत में इकबाल के शब्दों में: “की मोहम्मद से वफा तूने तो हम तेरे

हैं, ये ज़मीं क्या चीज है लोहो कलम तेरे हैं।”

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