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जल्दबाजी में वैक्सिन तो जेनेटिक इंजीनियरिंग से ही संभव

  • कारगर दवा के बाजार में आने में काफी समय लगेगा

  • पारंपरिक वैक्सिन की प्रतीक्षा में तबाह होगी दुनिया

  • सारी दुनिया में तेजी से फैल रहा है यह वायरस

  • प्रयोगशालाओं में रात दिन चल रहा है काम

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः जल्दबाजी में वैक्सिन चाहिए तो जेनेटिक इंजीनियरिंग का सहारा लेना होगा।

वरना प्रचलित वैज्ञानिक पद्धति में निरंतर शोध और ट्रायल के बाद किसी वैक्सिन को

सफल मानने में वर्षों लग जाएंगे। वर्तमान में इस पूरी दुनिया में कोरोना का हमला जिस

तरीक से हो रहा है, उससे बचाव के लिए हर संभव रास्तों में सबसे छोटा रास्ता जल्दबाजी

में वैक्सिन बनाना ही है। चीन के शोधकर्ता प्रारंभ से ही इसकी वकालत करते आये हैं।

दरअसल चीन के वैज्ञानिकों की हर बात को गंभीरता से इसलिए भी लिया जा रहा है

क्योंकि चीन के वैज्ञानिकों के पास इस वायरस से जूझने का सबसे लंबा अनुभव रहा है।

इसी अनुभव की वजह से अब चीन का वुहान शहर कोरोना से पूरी तरह मुक्त हो गया है।

वहां के अस्पतालों में अब कोरोना का कोई मरीज भर्ती नहीं है। वुहान में तीन महीने से

अधिक समय तक इस महामारी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के बाद रविवार को यहां के

अस्पताल कोरोना मरीजों से पूरी तरह मुक्त हो गये। इस बीच कोरोना वायरस

(कोविड-19) महामारी से विश्वभर में अब तक 2,38,096 लोगों की मौत हो चुकी है तथा

33,38,788 लोग संक्रमित हुए हैं। भारत में भी कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से फैल

रहा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से शनिवार सुबह जारी किए गए आंकड़ों के

मुताबिक देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस संक्रमण से अब तक 37336

लोग प्रभावित हुए हैं तथा 1218 लोगों की मौत हुई है।

जल्दबाजी में वैक्सिन का एकमात्र तरीका है जेनेटिक संशोधन

जल्दबाजी में वैक्सिन तैयार करने की बात बीमारी की मारक क्षमता और पूरी दुनिया पर

पड़े इसके असर की वजह से है। चीन में स्थिति में सबसे पहले सुधार हुआ तो वहां के

वैज्ञानिकों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग के सहारे इस वायरस का मुकाबला करने की बात

कही। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर ही यह कहा था प्लाज्मा पद्धति से ईलाज से भी

फायदा होने की बात कही थी। जेनेटिक इंजीनियरिंग से ईलाज खोजने के रास्ते में वायरस

की जेनेटिक संरचना को पहचानने का काम युद्धस्तर पर हो रहा है। इस काम में काफी

प्रगति भी हुई है। जैसे जैसे इस काम में प्रगति हो रही है वैसे वैसे चीन पर यह आरोप

लगाना भी तेज होता जा रहा है यह दरअसल कोई वायरस नहीं बल्कि एक जैविक हथियार

है जो वुहान के एक लैब में तैयार किया जा रहा था। इस बारे में चीन ने पूरी दुनिया को

आगाह करने में देर की, इस पर संदेह भी नहीं है। लेकिन अभी की चुनौती लगातार इसके

संक्रमण को फैलने से रोकना है। इसके लिए ही वैक्सिन की जरूरत महसूस की जा रही है।

समझा जाता है कि वैक्सिन के संपर्क में आने के बाद कोरोना वायरस अन्य लोगों तक

अपना संक्रमण फैलाने की क्षमता भी खो सकता है।

जेनेटिक संरचना सार्स जैसी लेकिन मारक क्षमता अधिक

अब तक इस बारे में जो कुछ शोध हुआ है उसके मुताबिक इस वायरस की जेनेटिक

संरचना भी पहले के सार्स वायरस के जैसी ही है। लेकिन इसकी मारक क्षमता बदल चुकी

है। इसी वजह से वैज्ञानिक मानते हैं कि इस वायरस को काबू में करने का सबसे सुरक्षित

तरीका वैक्सिन बनाना ही है। इसी वैक्सिन को सबसे कम समय में सिर्फ जेनेटिक

इंजीनियरिंग की मदद से ही तैयार किया जा सकता है। वायरस की जेनेटिक संरचना को

समझने और उसके काम करने की तरीकों को जेनेटिक इंजीनियरिंग के मदद से संशोधित

कोष ही रोक सकते हैं। शरीर के अंदर पहले से तैयार प्रतिरोधक शक्तियों की वजह से

इसका हमला विफल किया जा सकता है। किसी दूसरी विधि से अगर वैक्सिन तैयार किया

गया तो उसके सफल घोषित होने में वर्षों लगने की संभावना है क्योंकि यह निरंतर

परीक्षण और सुधार की प्रक्रिया है। लेकिन अभी पूरी दुनिया को कम समय में इसके लिए

वैक्सिन की जरूरत है।

भारत सहित 19 देशों में चल रहा है इस पर काम

दुनिया भर के जेनेटिक प्रयोगशालाओं में इस पर अभी काम चल रहा है और वायरस की

मारक क्षमता को देखते हुए वैज्ञानिक बहुत संभलकर आगे बढ़ रहे हैं। यह पहले ही देखा

जा चुका है कि यह वायरस स्वास्थ्यकर्मियों को भी अपनी चपेट में ले चुका है। अनेक

डाक्टर भी इसकी चपेट में आने की वजह से मारे गय हैं। अभी के आंकड़ों के मुताबिक

दुनिया की 80 कंपनियां और 19 देशों में यह अनुसंधान एक साथ चल रहा है। इस काम से

जुड़े वैज्ञानिक यह मानते हैं कि अगर जेनेटिक इंजीनियरिंग का यह प्रयोग सफल होता है

तो यह दुनिया में सबसे तेज विकसित होने वाला वैक्सिन होगा। इससे पहले ईबोला

वायरस की वैक्सिन को भी बनाने में पांच साल लग गये थे। इस बार कोरोना वायरस

अधिक इलाकों तक फैलने के बाद लगातार अपना दायरा भी बढ़ाता जा रहा है।

अभी इस शोध के तहत वायरस को निष्क्रिय करने पर परीक्षण जारी है। प्रयोगशालाओं में

इंसानी शरीर के कोषों में ऐसे वैक्सिन डालकर उसे आजमाया और रिपोर्ट के मुताबिक

सुधारा भी जा रहा है। दरअसल यह वायरस की इतनी तेजी से पूरी दुनिया में फैला है कि

इस तरीके से जल्दबाजी में वैक्सिन बनाने की बात हो रही है। यह तय है कि आम प्रचलित

तरीके से वैक्सिन के विकास पर अटके रहने का अर्थ यह होगा कि लॉक डाउन और

अस्पतालों पर कोरोना के बोझ से पूरी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था ही तबाह हो जाएगी।

उन्हें बचाने के लिए भी जल्दबाजी में वैक्सिन बनाने का यह काम चल रहा है।


 

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