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सरकारों की जेब खाली होने की सार्वजनिक घोषणा तो जनता की सुध आयी

सरकारों की जेब खाली होने की सार्वजनिक घोषणा का दौर प्रारंभ हो चुका है। सरकारों ने

अपनी तरफ से छूट का एलान करना प्रारंभ कर दिया है। यह उचित भी है लेकिन संक्रमण

वाले इलाकों को छोटा कर उनकी सही घेराबंदी और जांच की गति को तेज कर इसे पहले

भी किया जा सकता था। दरअसल सभी राज्यों ने केंद्र से पैकेज की उम्मीद लगा रखी है।

केंद्र के पास अपने संसाधनों से होने वाली कमाई शून्य के लगभग है। ऐसे में जिन राज्यों

को केंद्र की मदद का भरोसा नहीं था, उन्होंने सबसे पहले शराब की बिक्री की छूट देकर

नकद कमाई का रास्ता खोल लिया। शराब ऐसा कारोबार है, जिसने कोरोना लॉक डाउन में

सरकारी राजस्व के ढांचे की शराब कारोबार पर निर्भरता की पोल खोल दी है। ऊपर से जो

लोग इस बारे में शराबबंदी की बातें करते रहे हैं, उन्हें भी यह बात अच्छी तरह समझ में आ

चुकी है कि नकदी का यह कारोबार ही संकट की घड़ी में सरकार को जिंदा रखने भर

ऑक्सीजन प्रदान कर सकता है। अब लॉक डाउन चार को 31 मई तक बढ़ाने के बीच ही

अनेक राज्यो में नये किस्म की छूटों का एलान कर दिया गया है। सभी अपनी अपनी तरफ

से जनजीवन को सामान्य करने के साथ साथ यह कहने से हिचक नहीं रहे हैं कि अब लोगों

को कोरोना के साथ ही जीने का आदत डाल लेनी चाहिए। यहां से जो सवाल खड़ा हो रहा है,

वह भारत जैसे देश के लिए स्वास्थ्य संसाधन के ढांचों के विकास का है।

दिल्ली को छोड़ शेष भारत में स्वास्थ्य उपेक्षित रहा है

दिल्ली को छोड़ दें तो शेष भारत में पिछले कुछ वर्षों में इस स्वास्थ्य संबंधी आधारभूत

ढांचा के निर्माण के नाम पर सिर्फ ठेकेदारी हुई है। बड़े बड़े भवनों के निर्माण के बाद भी

उनका सही तरीके से चालू नहीं होना, झारखंड में बड़ा उदाहरण है। सिर्फ ठेकेदारों से

कमीशन खाने की लालच में जिन स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य उपकेंद्रों का दूरस्थ इलाकों

में निर्माण कराया गया था, उनके चौखट और दरवाजे भी चोर उखाड़ कर ले गये। बाद में

लोगों ने भवन की ईंटों को भी अपने घर के काम में इस्तेमाल कर लिया। यही हाल प्रखंड

कार्यालयों में हुए निर्माण कार्यों का रहा, जहां भवन बन जाने के बाद भी वहां बैठने के लिए

अधिकारी और कर्मचारी तैनात नहीं किये गये। इसी तरह प्रोजेक्ट भवन औऱ नेपाल हाउस

को छोड़ दें तो अन्य सरकारी इमारतों में भी स्थान होने के बाद भी मानव संसाधन की

व्यापक कमी नजर आती है। इससे स्पष्ट है कि सरकार ने आम जनता का काम काज

त्वरित गति से करने की सोच को लेकर ठेकेदारों को टेंडर नहीं दिये थे। ठेकेदारों को यह

टेंडर सिर्फ सरकारी धन की लूट के लिए दिये गये थे। नतीजा है कि पैसा खर्च होने के बाद

भी उनसे आम जनता को कोई फायदा नहीं मिल पाया है। सरकारों की जेब खाली हुई तो

सरकार की यह असलियत भी जनता के सामने आ चुकी है। इसलिए तय है कि आने वाले

दिनों में सत्ता की सीढ़ी में गति बनाये रखने में शराब की बिक्री भी अहम है, इससे कोई

अब इंकार नहीं करेगा।

सरकारों की जेब खाली में मजदूरों के लौटने की चुनौती

लेकिन सरकारों की जेब खाली होने के साथ साथ नयी चुनौती अन्य राज्यों से खाली हाथ

लौटते मजदूर भी है। उनके लिए मनरेगा की योजनाओं का एलान किया गया है। झारखंड

जैसे पठारी राज्य की बात करें तो यहां मनरेगा में बनी बनायी सड़कों को फिर से बनाकर

माल कमाने की आदत को कठोरता के साथ रोकना होगा। कोरोना लॉक डाउन की वजह से

जो परिस्थितियां बदली हैं, उसमें अब सिंचाई के संसाधन बेहतर बनाने की आवश्यकता

है। झारखंड ही नहीं अनेक ऐसे राज्य हैं जहां खेती के जरिए ही रोजगार के सबसे अधिक

संसाधन विकसित किये जा सकते हैं। इसलिए सरकारों को जेब खाली होने के बाद भी

आने वाले धन का प्रवाह सीधे मनरेगा और मनरेगा के माध्यम से जल संचयन के ढांचों के

विकास पर लगाना चाहिए। अगर यह काम एक साल भी होता रहा तो अगले वर्ष स हम

सिंचाई बेहतर होने की वजह से कृषि के माध्यम से तेजी से उस घाटे को पूरा कर पायेंगे,

जो इस कोरोना लॉक डाउन की वजह से पूरी दुनिया ने झेला है। इसी संकट की वजह से ही

सरकारों की जेब खाली हो चुकी है। वैसे यह एक वैश्विक संकट सभी सरकारों, चाहें वह देश

की हो अथवा राज्यों की, यह सबक देने के लिए पर्याप्त है कि उन्हें सिर्फ वोट के लिए ही

आम जनता का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। बड़े पूंजीपतियों की कर्जमाफी और हाल

के दिनों में 68 हजार करोड़ के बट्टा खाता के बदले यह धन अगर आम आदमी के काम

लाया गया होता तो शायद सरकारों को सड़क पर पैदल चलते मजदूरों की इतनी आह नहीं

लगती।


 

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